स्वाधीन देश की स्वाधीन नारियां

-डॉ. अनामिका प्रकाश

बहुत समय पूर्व एक जानी-मानी स्तंभ लेखिका की वेदना पढ़ने को मिली। अनेक ऐसे दृष्टांत भी जीवन में दिखाई पड़े जहां शिक्षित महिलाओं ने वह सब किया जो उनसे अपेक्षित नहीं था। पैंतीस वर्ष अध्यापन करने वाले समयचक्र में प्रायः प्रतिवर्ष एक-दो जोड़े अंतर्जातीय विवाह के बंधन में बंधते देखे तो अनेक मेधावी बालिकाओं और युवतियों को अपने जीवन का अंत करते भी देखा। अनगिनत ऐसी घटनाएं मुझे सोचने पर विवश करती रहती हैं। मेरा संवेदनशील मन उन्हें देखकर और दुःखी हो जाता है जो घर-घर दोनों समय बर्तन साफ़ करती हैं, झाड़ू-पोंछा करती हैं या कपड़े धोने आती हैं। ऐसे जोड़े भी दिखाई पड़ जाते हैं, जिनमें स्नेह सरिता तो सूख चुकी है पर दरो-दीवार ने जोड़ रखा है अथवा बच्चों के भविष्य के विचार से संग निभ रहा है। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जहां शिक्षणकाल का मुक्त जीवन व्यतीत करने के बाद जब संपन्न पति, परिवार मिल जाता है तो नारी दायित्वों को निभाने के स्थान पर उसी लापरवाह जीवन पद्धति पर चलती है। कुछ ऐसी महिलाएं मिल जाती हैं, जिन्हें पति ने तो प्रताड़ित किया ही, बच्चों ने भी कसर नहीं छोड़ी। कुछ दहेज लोभियों के चंगुल में फंसकर जान गंवा देती हैं। कहीं पर पुरुष अपने से अधिक शिक्षित और व्यवहारिक पत्नी पर रौब डालने में अक्षम रहता है तो उसे लांछित करता रहता है। यदि संक्षेप में कहा जाए तो जो महिला जहां है वहीं बेहाल है, दुःखी है। फिर भी अपनी स्थिति से उबरने का उपाय ढूंढ़ नहीं पाती। यहां मेरा लक्ष्य नारी शोषण के विविध आयाम प्रस्तुत करना नहीं है। उस पर तो यदि नाम सहित प्रमाणिक लेखन हो, तब भी अनेक पुस्तकें बन जाएंगी। यहां मेरा लक्ष्य बहुत सीमित है। मैं आज के परिदृश्य में शिक्षित महिलाओं की दशा प्रस्तुत करना चाहती हूं, जहां विसंगतियां अलग-अलग रूपों में व्याप्त हैं।

सृष्टि के रचयिता ने पुरुष और नारी की रचना की और उनमें परस्पर प्रबल आकर्षण को भी जन्म दिया। ऐसे ही आरंभ हुआ इस संसार का क्रम, जिसे सब बड़ा सार्थक मानते हैं। कुछ इसकी नश्वरता के गीत भी गाते रहे। हमारे प्राचीन पूर्वजों ने समाज को अनाचार से बचाने के लिए ‘विवाह’ नामक संस्था का सूत्रपात किया और कुछ नियम भी बनाए। सामाजिक जीवन में परिवार का महत्त्व बढ़ा और परिवार की धुरी के रूप में नारी को महत्त्व प्रदान किया गया। उत्तर भारत में पितृ-सत्तात्मक परिवार होते हुए भी नारी को पत्नी और मां के रूप में गरिमापूर्ण स्थिति प्रदान की गई। मार्क्सवादी इतिहासकार भले ही भारत के प्राचीन आदर्शों में नारी शोषण देखने की चेष्टा करें तथा हमारे पूज्य देवताओं को व्यभिचारी एवं बलात्कारी सिद्ध करने का शर्मनाक प्रयास करें, किंतु स्पष्ट रूप से मनु जैसे पुरातनपंथी ने भी नारी का सम्मान करने का आदेश दिया। बढ़ते हुए विदेशी आक्रमण, परस्पर प्रभुसत्ता के लिए युद्ध और संघर्ष तथा पुरुष विधिवेत्ताओं के विभिन्न एकपक्षीय विधानों से नारी का जीवन न केवल दुःखी रहने लगा वरन् अनेक वर्जनाओं का शिकार हो गया। आश्चर्य यह होता है कि वेदों एवं शास्त्रों में पारंगत नारियों ने भी ऐसे निषेधों का विरोध नहीं किया। ऐसा शायद इस कारण था कि नारियों के अनेक वर्ग थे। उच्च वर्ग, मध्य वर्ग, निम्न वर्ग- जो पूर्णतः आर्थिक आधार पर बने थे। नारियों ने भी अपने लिए सुरक्षित जीवन को बेहतर समझा होगा।

आधुनिक युग में नारियों को सह-शिक्षा में पढ़ने की सुविधा है। अनेक नियम-कानून उनके जीवन को कष्टों से बचाने के लिए बनाए गए हैं। उन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उद्यम करने की आज़ादी है और वे उच्च पदों पर भी आसीन है, किंतु वहां भी उन्हें मानसिक झटके तो लग ही रहे हैं। आज जिस स्वतंत्रता का उपभोग नारियां कर रही हैं, उससे बहुत से पुरुष दुःखी हैं। पुरुष क्षेत्र अथवा पुरुष संगठन उनके स्वरों को अभिव्यक्ति भी दे रहे हैं। किंतु यथार्थ क्या है? आधुनिक समाज तो अत्यंत संतुलित समाज होना चाहिए। विशेष रूप से नगरीय क्षेत्रों में जहां समानता का स्तर कम-से-कम कानून के रूप में महिलाओं को प्राप्त हो चुका है। मेरी निश्चित विचारधारा है कि अब महिला उत्थान का प्रश्न उतना तीव्र नहीं है जितना कि शिक्षित महिलाओं के स्वयं अपने आत्ममंथन का। क्या शिक्षित महिलाओं को वह सब करने का लाइसेंस मिल जाता है जो पुरुष करते हैं? क्या शिक्षित महिलाएं केवल अपने अधिकार को जानती हैं, कर्त्तव्य को नहीं?

मेरी अनेक युवतियों से बातचीत होती रहती है। मुझे यह सुनने को मिलता है कि अब छात्र ही नहीं, छात्राएं भी छेड़छाड़ करती हैं। कभी-कभी छात्राओं में से एक-दो इतनी गम्भीर हो जाती थीं कि विवाह उसी व्यक्ति से न हो तो पंखे से लटककर जान दे देती थीं। क्या इतनी भावुकता सही है? सब शिक्षा ही व्यर्थ है यदि ‘व्यक्ति’ बनकर महिला जीवन-यापन न कर सके अथवा अपना भला-बुरा न समझे।

विवाहेतर संबंधों की भी आज के पढ़े-लिखे और ग्रामीण क्षेत्रों की असुरक्षित युवतियों में बड़ी चर्चा सुनने को मिली। महानगरों में स्त्री और पुरुष की मित्रता को भी बुरा नहीं माना जाता। व्यापारी वर्ग की एक महिला की उसके पति के मित्र के साथ मित्रता हो गई। वह प्रतिदिन उनके घर आया करता था। समाचार-पत्रों से ज्ञात हुआ कि वह व्यक्ति उसी महिला की अठारह वर्षीय पुत्री को लेकर फ़रार हो गया और अपनी पहली पत्नी के रहते उससे विवाह भी कर लिया। आधुनिक सभ्यता के इस खुलेपन के और भी गंभीर परिणाम अनेक शहरों के बारे में सभी ने पढ़े-सुने होंगे।

जहां तक पुरुष और नारी के परस्पर प्रेम का संबंध है, विवाह उसी की परिणति माना जाता है। विवाह के बाद संतानोत्पत्ति और फिर संतान के लालन-पालन का उचित प्रबंध करने, उसमें शुभ संस्कार उपजाने और उसका अच्छा स्वास्थ्य बने, यही मुख्य कार्य अच्छा और उचित प्रतीत होता है। किंतु शायद यह सब कस्बाई मनोवृत्ति माना जाता है। महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों का वातावरण कुछ भी कहने योग्य नहीं है। शोध-छात्राओं के शोषण की अनेक घटनाएं प्रकाश में आई हैं। हमेशा शोषण ही हो यह सत्य नहीं होता। क्या शोध कार्य इतना ज़रूरी है कि उसके लिए नारीत्व का बलिदान कर दिया जाए? शोधकर्ता छोटी बच्ची तो नहीं होती है। बात खुलने पर वह बलात्कार हो जाता है। समाज में इस बीमार मनोवृत्ति को बढ़ा रहे हैं टी.वी. धारावाहिक जिसमें सभी के एक या दो नाजायज़ औलादें होती हैं जो युवा होकर समस्याएं उत्पन्न करते हैं। यह पौराणिक आधार पर भी उचित ठहराया जाता रहा है जो अपनी संस्कृति पर विकृत कर प्रस्तुत करने का षड्यंत्र ही है।

विचारों की आंधी और अनेक सच्ची घटनाओं को पीछे धकेलते हुए केवल यही कहना मैं श्रेयस्कर मान रही हूं कि यदि वर्तमान नारी आंदोलन की कर्णधार बनकर नारियों से कुछ सार्थक अपेक्षा की जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा। अधिकांश पुरुष भी बुरे नहीं होते और अधिकांश महिलाएं भी अच्छी नहीं होतीं। एक विवाह में पांच तारा होटल में मैंने जितनी महिलाओं के हाथों में व्हिस्की के गिलास को उनके लिपस्टिक लगे होंठों का स्पर्श करते देखा तो मेरी मान्यताएं धूल-धूसरित होती नज़र आईं। खेदजनक यह था कि उनमें नारी संगठन की सदस्याएं भी थीं। एक तो किसी नारी संगठन की अध्यक्षा अब भी है। सब लोग निश्चित ही कहेंगे कि खाना-पीना निजी बातें हैं। यह कस्बाई मानसिकता आपकी है, तो रहे कि नारी क्या आचरण करे, क्या न करे।

ठीक ही है कस्बाई मानसिकता हमें उदात्त चित्त तो देती है। मैं तो निश्चय ही इसका स्वागत करूंगी। किंतु सर्वाधिक दुखद यह है कि प्यार करने की उम्र बीत जाने के बाद भी हम शारीरिक प्यार करें और प्रत्युत्तर न मिलने पर अभिसारिका बन कर प्रणय निवेदन करते रहें। ‘और भी गम हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’, यह क्यों नहीं समझ में आता है। इस देश की महिलाओं को संदेश दिया है मीरा ने कि कंटकाकीर्ण पथ पर चलते हुए चाहे हमारे चरण लहूलुहान क्यों न हो जाएं, इस संसार की मांसल अनुरक्ति का परित्याग कर हमें सत्य के अन्वेषण में प्रवृत्त होना चाहिए। वैसे भी जो हमारी परवाह नहीं करता हम उसकी परवाह क्यों करें? इतना भी क्या भावुक होना, जो अठारह वर्षीय किशोरी के लिए तो स्वाभाविक हो सकता है परंतु अड़तीस वर्ष की महिला के लिए नहीं।

अब छोड़िए भी यह भावुकता। स्वाधीन देश की स्वाधीन नारियों का हर निर्णय वैज्ञानिक सोच-समझ के बाद पूरे विवेक से अनुप्राणित होना चाहिए।

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