कैसे-कैसे खिलाड़ी

-मुकेश विग

इस संसार में जो भी आता है अपना खेल दिखाकर एक दिन यहां से चला जाता है लेकिन सबसे बड़ा खिलाड़ी तो वह है जिसकी मर्ज़ी से ही तो हर खिलाड़ी अपनी गेम दिखाता है इसलिए तो कहते हैं ‘तेरे खेल भी निराले हैं’ उसके तो दो ही खेल हैं सुख और दुःख, निर्माण और विनाश। इन्हीं दो खेलों के दम पर पूरी दुनियां चलाता है। लेकिन उसी की बनाई इस दुनियां में तरह-तरह के खिलाड़ी हैं जो अपनी-अपनी क़िस्म की गेम दिखाते हैं। एक खिलाड़ी वह होता है जो केवल मैदान पर ही जा कर खेलता है दूसरा वह होता है जो दूसरों की भावनाओं व अरमानों से खेलता है। ऐसे खिलाड़ियों को हम स्वार्थी की संज्ञा देते हैं। एक ऐसा खिलाड़ी भी होता है जो दुश्मनों से जान हथेली पर रखकर खेलता है ऐसे जांबाज़ खिलाड़ी पर हर किसी को गर्व होता है।

मैदान पर खेलने वाले खिलाड़ियों ने तो लम्बे समय से हमारी नाक में दम कर रखा है न जाने इन्हें किसकी बुरी नज़र लग गई है? यही हाल रहा तो हमें आने वाले समय में कुछ अच्छे खिलाड़ी आयात भी करने पड़ सकते हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या में दस-बारह अच्छे खिलाड़ी ढूंढ़ते-ढूंढ़ते बुरी हालत हो गई है। आज जब विदेशी कंपनियां, विदेशी खान-पान, रहन-सहन हमारी सभ्यता व संस्कृति पर हावी होता जा रहा है तो भला विदेशों से खिलाड़ी लाने में क्या हर्ज़ है? हां, यदि भावनाओं व जज़बातों से खेलने वालों की बात की जाए तो यह हमें राहत ही प्रदान करती है क्योंकि हमारे देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है। इनकी लिस्ट पूरे विश्व में सबसे लम्बी हो सकती है। ऐसे खिलाड़ी हमें हर गली मोहल्ले में मिल सकते हैं। वैसे इन्हें राजनीति का खिलाड़ी यानी नेता भी कह कर पुकारा जाता है। इनकी गेम का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। एक नेता जी हार कर भी मुस्कुरा रहे थे तो एक पत्रकार ने इसका कारण पूछा। नेता बोले, “देखो भैय्या, हार से हमारा गहरा संबंध है। जो जीतते हैं उनके गले में भी तो हार ही डाले जाते हैं। कभी हार हमारे गले में तो कभी उनके। आख़िर है तो हार ही।”

एक नेता जी चुनावी जनसभा को सम्बोधित करने जा रहे थे। रास्ते में एक गरीब सड़क के किनारे पड़ा था जो तीन दिन से भूखा था। नेता जी को पता चला तो नेता जी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने तुरन्त जूस मंगवाया व मीडिया वालों के सामने अपने हाथों से उसे पिलाते हुए बोले, “देखो, इस उम्र में तुम्हें इस तरह अनशन पर बैठना शोभा नहीं देता। देखो क्या हालत बना ली है तुमने अपने शरीर की। जाओ अपने घर जाओ हम तुम्हारी मांगों पर अवश्य गौर करेंगे।” नेता की गाड़ी तो इतना कहते ही आगे बढ़ गई लेकिन वह ग़रीब काफ़ी देर तक सोचता रहा कि कैसा अनशन व कौन-सी मांगों की बात हो रही थी। कौन से घर जाने को कह रहे थे। दूसरे दिन नेता जी की जूस वाली तसवीर छपी थी व लिखा था कि नेता जी ने अपने हाथों से जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। हर तरफ़ उन्हीं की प्रशंसा हो रही थी। वे भी हाथों में गिलास थामे बार-बार उसी तसवीर को देख मुस्कुराते हुए सोच रहे थे कि अपने पूरे नम्बर बना गया एक गिलास जूस का और वह भूखा भी कम लक्की नहीं था हमारे लिए। सचमुच भावनाओं से खेलने वाला इससे बड़ा खिलाड़ी दूसरा हो भी नहीं सकता। एक नेता जी की पत्नी ने उन्हें बताया कि अपना मुन्ना रोज़ मिट्टी खाता है तो नेता जी बोले कि कई बड़े-बड़े नेता तो देश को ही खा रहे हैं। हमारे मुन्ने ने तो इसी देश की थोड़ी-सी मिट्टी ही तो खाई है। चलो हमारे आदर्शों व पदचिन्हों पर चलने के लिए इस ठोस शुरुआत से मज़बूत नींव रखने की पहल तो कर दी है। ऐसे खिलाड़ियों के कारनामों से तो दुनियां का सबसे बड़ा खिलाड़ी भी हैरान होता होगा।

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