मिट्टी के दीये

-सुरेन्द्र कुमार ‘अंशुल’

दीवाली वाले दिन वह घर लौटा तो काफ़ी देर हो चुकी थी। वैसे तो वह शाम को ही घर पहुंच जाता था लेकिन आज मालिक के कहने पर उसे फ़ैक्टरी में रुकना पड़ा और फिर रास्ते में वह जाम में फंस गया। पत्नी उसके इंतज़ार में बैठी थी।

“आज बहुत देर लगा दी?” पत्नी ने पति को स्कूटर स्टैंड पर खड़ा करते हुए देखकर पूछा।

“हां… रास्ते में जाम में फंस गया था।” पति निढाल से स्वर में बोला।

“ठीक है… आप अब जल्दी से फ्रेश होकर चाय पी लें फिर हम बाज़ार चलते हैं।” पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा।

“बाज़ार?”

“हां… आज दीवाली है। दीये और पटाखे नहीं लाने क्या? आपने ही तो कहा था कि शाम को मैं जल्दी आ जाऊंगा फिर बाज़ार चलेंगे।” पत्नी ने उसे याद दिलाने की कोशिश की।

“हां मैंने कहा तो था लेकिन…? अब बहुत देर हो गई है। चलो ऐसा करो चाय छोड़ो हम अभी बाज़ार चलते हैं।” घड़ी देखते हुए वह बोला।

“ठीक है मैं अभी घर को ताला लगा कर साथ चलती हूं।” पत्नी ने घर को ताला लगाया और फिर वो दोनों स्कूटर से बाज़ार पहुंचे।

अपने चिर-परिचित कुम्हार की दुकार पर वे पहुंचे और बोले, “भाई जी दीये चाहिए।”

“बाबू जी क्या बात…? आज बहुत लेट हो गए?”

“हां भाई लेट हो गया। बस तुम जल्दी से 21 दीये दे दो।” वह बोला।

“बाबू जी दीये तो सारे बिक गये और इस समय तो आपको कहीं से भी नहीं मिल पाएंगे।” बूढ़ा कुम्हार बोला था।

“लेकिन हमें तो 21 दीये चाहिये पूजा करने के लिए।” वह गिड़गिड़ाया था।

“लेकिन…?” बूढ़े कुम्हार ने लाचारी व मजबूरी दिखाई। “भाई जी प्लीज़… कुछ करो। बिन दीयों के हमारी लक्ष्मी जी की पूजा अधूरी रह जाएगी।” पत्नी ने हाथ जोड़ कर विनती की।

कुछ सोचते हुए बूढ़ा कुम्हार बोला, “अच्छा कुछ न कुछ करता हूं बेटी।” कहकर बूढ़ा कुम्हार दुकान के भीतर बने मकान में गया। थोड़ी देर बाद वह लौटा तो उसके हाथ में 11 दीये थे जोकि भीगे हुए थे पानी से।

“ये लो कहते हुए बूढ़े कुम्हार ने दीये उनकी ओर बढ़ाए।”

“बाबा जी… ये दीये… ?” पत्नी ने पूछा।

बूढ़ा कुम्हार बोला, “बेटी ये दीये हमने अपने लिए पूजा के लिए पानी में भिगो कर रखे थे। 21 दीयों में से 11 दीये मैं तुम लोगों के लिए ले आया हूं। अरे पूजा ही करनी है तो हम 21 की जगह 7 दीयों से कर लेंगे। 11 दीयों से तुम पूजा कर लेना। तुम्हारा काम भी बन जाएगा।”

उन दोनों के मुख से स्वर नहीं निकल रहे थे बोले, “बाबा जी इनके कितने पैसे दूं।”

“इनका कोई मोल नहीं है। ये हमारे घर के पूजा के दीये हैं। यहां नहीं जले तो कोई बात नहीं, तुम्हारे घर पूजा में सजे… इससे ज़्यादा… और मुझे क्या चाहिए?” कहकर बूढ़े कुम्हार ने वे दीये उन्हें पकड़ा दिये।

‘हर घर दीप जले’ इस कहावत को बूढ़े कुम्हार की सहृदयता ने सार्थक कर दिया था।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*