अन्तिम पुकार

-बलदेव सिंह

-अनुवाद सत्यप्रकाश उप्पल

मैं जब अपने चेहरे को अत्यधिक शोक में डूबा हुआ दिखाने की कोशिश करते हुए, दरियों पर बैठे हुए उदास लोगों की भीड़ को हाथ जोड़ते हुए अभिवादन की मुद्रा में किंचित् संकोच सहित वहां सम्मिलित हुआ तो मैंने देखा कि अभी तक भगवान कौर की लाश आंगन में खाट पर रखी हुई थी। उमस और गर्मी के कारण लाश को ख़राब होने से बचाने के उद्देश्य से उसके आस-पास बर्फ़ के छोटे बड़े टुकड़े रखे हुए थे। बर्फ़ पिघल कर चारपाई के नीचे इधर-उधर कच्चे आंगन को गीला करती कीचड़ बना रही थी। चार-पांच औरतें या फिर लड़कियां होंगी, क्योंकि मुंह ढके हुए होने के कारण कुछ पता नहीं चल रहा था चारपाई की बाजू पर सिर टिकाये रो रही थीं। थोड़ा हट कर बैठीं औरतों की भीड़ में से कोई लम्बे शोक वचन (वैन) बोल रही थी।

अत्यन्त गर्मी के इस मौसम में वातावरण शोक में डूबा हुआ था। परिन्दे भी जिह्वा निकाल कर अपना मुख खोले हुए छांव की शरण ढूंढ़ते भटक रहे थे।

संवेदना प्रकट करने के लिए आने वाले लोगों को पीने के लिए ठंडा पानी दिया जा रहा था। भगवान कौर का पति बोहड़ सिंह एक कोने में सिर पर पीला पटका लपेटे हुए बैठा था। उसके आस-पास गांव के सूझवान प्रतिष्ठित लोग और निकटतम संबंधी बैठे हुए थे। बोहड़ सिंह भगवान कौर की पुरानी बातें और अन्तिम समय का हाल बयान करते हुए अपने आंसू पोंछने लगा।

बोहड़ सिंह का बड़ा बेटा गुरूचेतन मेरे समीप बैठा था। वह इन दिनों गांव का सरपंच था। मैंने बैठे बिठाए थोड़ा खिसक कर उसके निकट होते हुए शिष्टाचार वश पूछा- क्या हो गया था ताई को?

अच्छी भली थी। दो एक दिन बुख़ार चढ़ा। परसों तबीयत कुछ ज़्यादा ख़राब हो गई। कल शहर डॉक्टर के पास लेकर गए थे। डॉक्टर ने कहा- दिमाग़ को बुख़ार चढ़ गया है लेकिन ख़तरे जैसी कोई बात नहीं है…. अभी उसकी दवाई आधी बाक़ी पड़ी है। परन्तु आज सवेरे वह पूरी हो गई।

पहले भी कभी ऐसा बुख़ार चढ़ा था? मैंने पुनः पूछा।

न बिल्कुल नहीं। कभी सिरदर्द तक नहीं हुआ था, उसने सगर्व उत्तर दिया।

क्या उम्र रही होगी?

उम्र तो होगी…. आकाश की ओर देखते हुए उसने तुरन्त उत्तर दिया…. सत्तर साल तो रही होगी….

फिर तो कुछ भी नहीं। …. पहले समय के लोग तो 90-90 वर्ष की उम्र तक चलते-फिरते अच्छे भले दिखाई देते हैं…. मैंने सहानुभूति वश ऐसा कहा।

वही तो! हमें तो कुछ पता नहीं चल पा रहा। न कभी बीमार हुई न ताप चढ़ा। न कभी खांसी की आवाज़ सुनाई दी। अगर कोई पीड़ा हो भी तो आज तक उसने हमसे शिकायत नहीं की। हमने तो आज तक बेबे को दिन में सोते हुए नहीं देखा था। अब बीमार हुई तो…. कुछ ही दिनों में….। यक़ीन नहीं होता। न कोई सगा संबंधी मानता है, न आस-पड़ोस। जिसे भी फ़ोन पर बताते हैं, उसके पांव तले से ज़मीन खिसक जाती है…. यह सब बताते हुए गुरूचेतन का गला रुंुंध गया।

आंगन में औरतें उसी प्रकार रुक-रुक कर रो रही थी। आंसू पोंछते हुए वे पसीना भी पोंछ लेती। पहचानने का यत्न करतीं, पड़ोस में से किसकी बहू अथवा किसकी सास आई है। कौन जल्दबाज़ी में सिर पर रंगीन दुपट्टा ओढ़ कर चली आई हैं। उस पर नाक भौं चढ़ाती अपने आभूषण भी दिखा रही है।

पुरुषों के समूह में बेशक महिलाओं जैसा शोर नहीं था। पर बातें तो यहां भी हो रही थी। बुज़ुर्ग अपने ढंग से ज़िन्दगी और मौत के फ़लसफ़े पर वार्तालाप कर रहे थे।

मनुष्य व्यर्थ में ही मेरी-मेरी के चक्कर में पड़ा ख़र्च हो रहा है। मर खप रहा है। दुःखी हो रहा है…. यहां आते-आते सब ममता समाप्त हो जाती है। मैं…. मेरा कुछ शेष नहीं बचता। अब यही देख लो इतने बड़े आर-परिवार वाली जत्थेदारनी…. यहां बर्फ़ में लगाकर रखी हुई है। बस मरघट तक लोग याद रखते हैं कि अन्ततः उन्हें भी यहां आना है। वापिस लौटते ही सब भूल जाते हैं। फिर वही चल सो चल।

अध्यापक वर्ग अपनी बातों में मस्त थे। सियासी क़िस्म का एक शख़्स सरकार की नाकामियां बता रहा था। वह बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था…. सरकार की नीतियों ने तो किसान को भिखारी बना कर ही दम लेना है।

जब भी कोई दूर दराज़ अथवा निकटवर्ती संबंधी का आगमन होता। वह कुछ उदास दिखाई देता और शालीनता से अन्य लोगों में जाकर बैठ जाता। स्त्री तो बाहर से ही अथवा आंगन में प्रवेश करते ही चीत्कार करती, जांघें पीटती भगवान कौर की मृत देह से लिपटने का प्रयास करती। चुप बैठी औरतें फिर रोने लगतीं। कोई एक बाहर से आई शोकाकुल औरत को भगवान कौर की लाश पर गिरने से रोकती। जितना उस औरत को रोकने का प्रयास किया जाता वह उतना ही अधिक शोर मचाती।

सुबह से ही यह सिलसिला जारी था। रुदन करती औरतें रुक-रुक कर अपनापन जताते हुए कहतीं।

मैं भी आख़िर क्यों तुम्हारे साथ नहीं मर गई… मां।

मुझे भी अपने साथ ले चल मेरी अम्मीयें।

उठ कर एक बार तो बोल…. ज़्यादा मेरी-मेरी करने वाली मेरी मां।

उसी वक़्त आंगन में दौड़ते हुए एक औरत ने गुरूचेतन से छोटे हरमीत को घबराहट में आवाज़ दी- वे पुत्तरा, जा दौड़ कर लाल चन्द को बुला…. छोटी बहू बेहोश हो गई है।

तत्काल हरमीत स्कूटर ले कर लाल चन्द हकीम को लेने चला गया। पुनः वह औरत भागती हुई आंगन की तरफ़ चली गई।

संस्कार का समय क्या रखा है? सरसरी तौर पर मैंने गुरूचेतन से पूछा।

दो-एक रिश्तेदारों की प्रतीक्षा है। अभी हरमीत के ससुराल वाले नहीं पहुंचे और मंझली लड़की भी नहीं आई। डेढ़-दो तो बज ही जाएंगे। ईश्वर की कृपया से परिवार बहुत बड़ा था। भगवान कौर की तीन लड़कियां और तीन बेटे थे। सभी शादीशुदा थे। लड़कियां भी और लड़के भी सभी समृद्ध घरों में ब्याहे थे। कोई पुलिस में ऑफ़िसर था तो कोई सेना में। समधी और अन्य रिश्ते नाते वालों ने पूरे उत्साह और शानो शौकत के साथ आना था। अन्य लोगों के बिना तो काम चल सकता था। मगर बहुओं के मायके वालों और लड़कों के ससुराल वालों की तो प्रतीक्षा करना बहुत ज़रूरी था। अन्यथा सारी उम्र का उलाहना और शर्मिन्दगी रहती।

उनकी प्रतीक्षा करना तो बहुत ज़रूरी है भाई, एक वयोवृद्ध व्यक्ति गर्मी से बेहाल होते हुए भी दूसरों को समझा रहा था। समधी का रिश्ता तो बेशक उम्र भर के लिए होता है पर ये रिश्ते ताने के कच्चे सूत जैसे होते हैं। अगर कहीं गांठ पड़ जाये तो तोड़ कर भी गांठ बांधनी पड़ती है। कोई बात नहीं और थोड़ी देर तक आ जायेंगे। ऐसे समय तो बहुत ध्यान रखना पड़ता है। विवाह अवसर पर तो काम चल सकता है…. और फिर घर से निकलना कौन-सा आसान काम है। सौ तरह के कार्य व्यवहार, सौ तरह के संशय विचार….

मेरा ज़्यादा मेल मिलाप तो गुरूचेतन संग ही था। दसवीं तक हम एक साथ पढ़े थे। फिर वह खेती करने लगा। दूसरे तीसरे रोज़ आते-आते हम एक दूसरे से अक्सर मिल लिया करते थे। रसमन दुआ सलाम होती रहती थी। वैसे मैं उनके घर प्रायः कम ही जाया करता था। कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। भगवान कौर गांव के रिश्ते नातों में मेरी ताई लगती थी। दो-तीन बार ही मैंने कभी ताई से बात की होगी।

ताई भगवान कौर का स्वास्थ्य देख कर तो कोई अनुमान नहीं लगा सकता था कि उसकी उम्र सत्तर साल होगी। कद लम्बा, गठा हुआ शरीर, रंग गोरा और बड़ी-बड़ी आंखें। चेहरे पर एक भी शिकन न थी। कानों में सोने की वज़नी डण्डियां, गले में पैण्डल, हाथों में सोने की चूड़ियां। उसके साथ गुरूचेतन के पिता बोहड़ सिंह का क्या मुक़ाबला? उसका कद भगवान कौर से चार अंगुल कम, रंग पक्का और नैन नक्श भी काम चलाऊ थे। छितरी दाढ़ी थी। विगत कुछ वर्षों से उसकी तोंद भी कुछ बड़ी हो गई थी। वैसे गांव में अब उसका नाम गणमान्य लोगों में शामिल होने लगा था। मुझे प्रायः इस बात की हैरानी होती कि भगवान कौर के मां-बाप ने आख़िर बोहड़ सिंह को पसंद कैसे कर लिया? वह किसी भी आधार पर उसके योग्य नहीं था। कभी-कभी मन में विचार आता कि शायद बोहड़ सिंह की कई एकड़ ज़मीन के कारण ही यह रिश्ता हो गया होगा। जाट की इकलौती सन्तान न कोई भाई, न कोई बहन। बना बनाया सब कुछ उसकी झोली में आ गया। ऐसी जगह लड़की से किसने पूछा होगा। गाय ख़रीदने के बाद जब कोई उसके गले में रस्सा डाल कर उसे अपनी ओर खींचता है। उस वक़्त घरवाले उस गऊ के मन की पीड़ा को कहां समझते होंगे। वह मुड़ कर पीछे देखती है, सजल आंखें लिए रम्भाती है। ख़रीदार दो एक झटके देकर उसे घसीट कर ले जाता है। कौन जाने भगवान् कौर के साथ भी यही सब हुआ हो।

कुछ भी हो अब तो वह विशाल परिवार वाली थी। गुरूचेतन और दो बेटियां तो बिल्कुल भगवान कौर पर गई थीं। वही रंग रूप, वही नैन नक्श। दूसरे बोहड़ सिंह पर गये थे। वे लोग जो परिचित नहीं थे अक्सर धोखा खा जाते थे। वे उन्हें दो अलग-अलग परिवारों के बच्चे समझते थे।

अचानक रोने धोने की ऊंची आवाज़ से मेरा ध्यान भंग हो गया। बाहर सूमो गाड़ी आकर रुकी थी। शायद मेझली के सास-ससुर तथा अन्य संबंधी आए थे। गुरूचेतन ने लपक कर रोती हुई बहन को गले लगाया। कुछ देर वह भाई के गले लग कर रोती रही। फिर रुदन करती हुई अन्दर जा कर बेबे की चारपाई की बाजू के साथ सिर टकराने लगी। आंगन में बैठी औरतों का रोना धोना फिर शुरू हो गया।

उसी समय औरतों के इकट्ठ में से निकल कर मेरी बुआ दया कौर आंसू पोंछते हुए मुझे इशारे के साथ बुला कर एक तरफ़ ले गई। जब मैं बुआ के पास आया तो उसके भीगे हुए बोल सुने- पुत्तर मुझसे चला नहीं जाएगा। जब तुझे जाना हो तो मुझे शमशान घाट तक अपने साथ स्कूटर पर ले चलना।

बुआ का शरीर भारी था। घुटनों में दर्द रहता था। विधवा थी, निःसंतान थी। ससुराल तो कभी-कभी ही जाती थी। अधिकतर मेरे चाचा के घर पर ही रहती थी। चाचा ही बुआ के ससुराल उनकी ज़मीन जोत कर आता था। फ़सलें सम्भालता था। कई ईर्ष्या द्वेष करने वाले लोग उस पर लांछन लगाते- बहन की ज़मीन की उपज खा रहा है। लेकिन न कभी बुआ ने लोगों की बातें सुनी न चाचा ने। बुआ, भगवान कौर की पक्की सहेली थी। भगवान कौर जब बीमार पड़ी, तो बुआ उसका हाल पूछने रोज़ आती थी। कई बार तो पैदल, दुखी हो कर भी पहुंचती। अन्तिम दो दिन तो वह भगवान कौर के ही पास बैठी रही। गुरूचेतन ने बताया, पता नहीं परस्पर धीरे-धीरे क्या बतियाती रहतीं। हमारी समझ में तो कुछ न आता। कभी हंसने लगतीं। कभी दोनों आंखें पोंछने लगतीं। एक दिन दोनों साथ-साथ समवेत गीत गा रही थीं।

मैंने सहजता से पूछा- बुआ को ताई के बीमार होने की ख़बर कैसे पहुंची।

जिस दिन बेबे की हालत कुछ ज़्यादा ख़राब हुई, उस दिन कहने लगी दया कौर को बुला लो। मेरा बातें करने को जी चाहता है- हम उसे ले आये। एक दिन बुआ कहने लगी- पुत्तर। मैंने तेरी मां को तीस वर्ष बाद भी पहचान लिया। हम सभी आश्चर्यचकित थे कि हमारी होश में तो बुआ कभी बेबे से मिलने नहीं आई। इतना प्यार कहां से जागा? फिर तो बुआ जब भी कभी मायके आती बेबे से मिलने ज़रूर आती। कई बार तो बातचीत करते दिन छिप जाता। अन्धेरा हो जाता और वह रात यहीं रुक जाती। एक दो वर्ष से तो कुछ ज़्यादा ही आने लगी थी।

हम से पूर्ववर्ती लोगों में अभी भी मोह-ममता बाक़ी है। आजकल तो बाप, बेटे के पीछे गंडासा लिए घूमता है। बहू-बेटियां अपनी ही माताओं के बाल नोच रही हैं। मेरे पीछे बैठे हुए एक बुज़ुर्ग ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा। अब तक वह गुरूचेतन की हां में हां मिला रहा था।

मुझे किसी काम से जाना था। मैं बहाना बना कर जाना चाहता था। किंचित् संकोच के साथ मैंने गुरूचेतन से पूछा- अन्तिम संस्कार के लिए एक डेढ़ तो बज ही जाएगा?

हां! इतना टाइम तो लग ही जाएगा। ऐसे ही रिश्तेदारों को एतराज़ रहेगा कि उनकी प्रतीक्षा नहीं की गई।

बुआ से तो चला नहीं जाता। मैं इसे शमशान घाट तक छोड़ आता हूं। वहां मेरे लायक़ कुछ काम है तो बता दे। मैं यह सब कहते हुए वहां से उठ खड़ा हुआ।

न, न काम क्या होगा? वहां लड़के गए हुए हैं। लकड़ी और उपलों का ढेर लेकर गए हुए हैं।

अच्छा, फिर वहीं मिलूंगा। हाथ जोड़ कर मैंने उनसे विदा ली और एक तरफ़ बैठी बार-बार मेरा मुंह ताकती बुआ के पास आ गया।

चलें, पुत्तर? बुआ ने घुटनों पर हाथ टिका कर उठने की कोशिश करते हुए कहा।

देख ले, बुआ। अभी रुकना है तो मैं फिर आकर ले जाऊंगा।

न पुत्तर, अब क्या रुकना है। भागो को तो औरतें अब नहलाने लगी हैं। मैं वहीं बैठ जाऊंगी। अगर तूने कहीं जाना हो तो हो आना।

यह कहते हुए बुआ बाहर की ओर चल दी।

वह जब बाहर खड़े स्कूटर के पास पहुंची तो उसकी सांस फूलने लगी और वह पसीने से तर-बतर हो गई।

अब तो यह निगोड़ी देह हारती जा रही है। भागो तो तगड़ी थी। पता नहीं क्या हुआ कोढ़ी को। बस पलों में ही… मैंने तीस वर्ष बाद भी उसे पहचान लिया था। मैंने पूछा- अरी, क्या तू मरियम.. बशीर की बेटी नहीं क्या? मुझे सधे सधाये शब्दों में उसने उत्तर दिया- मरियम तो उसी रात मर गई थी जिस रात मेरे सामने मेरे अब्बा, मेरे भाई, मेरी बहन को नेज़े की नोक पर पशुओं की तरह हांक कर ले गए थे।

मरियम….? स्कूटर स्टार्ट करते हुए मैं रुक गया और अवाक् बुआ की ओर देखने लगा।

हां, पुत्तर यह नये गांव के बशीर की लड़की थी। दंगों के दौरान अपने गांव का निहंग तेगा सिंह इसे उठा लाया था।

मैं बहुत हैरान हुआ यह जानकर। गांव में मेरे हम उम्र तो इस रहस्य से परिचित नहीं थे। हम तो यही समझते रहे कि भगवान कौर जट्ट परिवार की लड़की है।

मेरे मस्तिष्क में कई प्रश्न एकाएक उभर कर सामने आने लगे। अगर यह बशीर की बेटी है तो फिर बोहड़ सिंह के पास कैसे आई? यह विवाह कैसे संभव हुआ? मरियम के अम्मी अब्बू ने उसे ढूंढ़ा क्यों नहीं? किसी ने मुख़बिरी नहीं की? हालात सामान्य होने पर पूछ-ताछ के समय मरियम ने अपनी पहचान क्यों छुपा कर रखी?

सिर पर सूरज आग उगल रहा था। मुझे गुमसुम खड़ा देख बुआ ने चिंतित मुद्रा में कहा- पुत्तर गर्मी लग रही हो तो रहने दे, मैं धीरे-धीरे अपने आप चली जाऊंगी।

नहीं बुआ…. बैठ तू! मैंने स्कूटर स्टार्ट कर लिया। मुझे यक़ीन था कि बुआ निश्चित रूप से कुछ और बातें भी ज़रूर जानती होगी।

गांव की परिधि पर बने तालाब पर से होते हुए हम शमशान घाट पहुंच गये। मैं वहां एक वृक्ष की छितरी हुई शाखा तले बुआ को ले गया। लकड़ियों और उपलों की बैलगाड़ी वहां आ चुकी थी। दो व्यक्ति गाड़ी में से लकड़ियां और उपले उतार रहे थे।

पुत्तर। थोड़ा पानी पिला दे। बुआ ने पेड़ तले छांव ढूंढ़ते हुए खुश्क होंठों पर जीभ फेर कर पसीना पोंछते हुए कहा।

मैं इधर-उधर पानी ढूंढ़ने लगा। वहां एक नल तो था लेकिन पानी पीने के लिए बर्तन नहीं था। रेहड़े वालों से पूछा तो उनके पास एक टीन का डिब्बा था।

पानी ला कर बुआ को पकड़ाते हुए मैंने आस-पास देखा। जलती हुई दोपहरी में शमशान घाट खुद जलता हुआ दिखाई दे रहा था। चिता वाले स्थान पर टीन का शैड स्याह काला हो चुका था। एक तरफ़ कीकर के नीम खुश्क पेड़ पर गिद्ध अथवा कौए का घोंसला था पर उसमें पंछी कोई नहीं था। वृक्ष के आस-पास मण्डलाकार थड़े पर पंछियों की बीठ बिखरी हुई थी। चारों तरफ़ सरकण्डा बिखरा हुआ था। कोई चक्रवात उठता तो कुछ दिन पूर्व जली हुई चिता की राख से शमशान घाट का परिवेश भर जाता फिर वही राख धीरे-धीरे वृक्षों पर, वनस्पति पर, प्राणियों पर और धरती के ऊपर बिखरने लगती।

थड़े पर अपने बैठने लायक़ स्थान साफ़ करके बुआ वहां बैठ गई। मेरे मस्तिष्क में कुछ प्रश्न मछली के कांटे समान फंसे हुए थे। बात आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मैंने मासूमियत के साथ आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- बुआ, हम तो अब तक यही समझते रहे कि भगवान कौर जट्टों की बेटी है।

बे, कहां…. यह तो बशीर की बेटी है। बशीर रंधावे की। बुआ ने यक़ीनी तौर पर कहा।

फिर यह…. भगवान कौर…. बोहड़ ताया….? …. मेरी हकलाई हुई जिज्ञासा को समझते हुए बुआ बोली…. यह जो आज़ादी मिली है आप लोगों को। उस समय दंगा फसाद और मार काट के दौरान अपने गांव का तेगा इसे नये गांव से उठा लाया था। …. अपने खेतों की तरफ़ ले गया। यह बला की हसीन लड़की थी। अनुमानतः दस ग्यारह साल उम्र रही होगी।

मैं सांस रोक कर, बुआ से इतिहास के पृष्ठों की चश्मदीद गाथा सुनने लगा। कुछ बोल कर अथवा टोक कर मैं उसका ध्यान भंग नहीं करना चाहता था। बुआ अधमुंदी आंखों से बीते हुए संगीन वक़्त के रू-बरू थी।

तेगा तो लड़की को क़त्ल करने के लिए तैयार हो गया था। तलवार म्यान से बाहर निकाल ली। बोहड़ का बापू टहल सिंह संयोगवश मौक़े पर पहुंच गया। उसने कहा बेवकूफ़ आदमी, क्यों गऊ हत्या कर रहे हो? …. लड़की की ओर देख। इस मासूम की हत्या का पाप कहां भरेगा? मुझे दे दे…. मैं इसे अपने घर ले जाऊंगा। गुरूद्वारे में इसे अमृत छका अपनी बेटी बना लूंगा। मेरी कोई बेटी नहीं है एक मात्र लड़का है- बोहड़। दोनों बहन-भाई एक साथ पल जाएंगे।

पुत्तर! सुना है कि पहले तो तेगा सिंह रज़ामन्द नहीं हुआ। कहने लगा- तुर्कों की लड़की है, इसको मैंने जन्नत भेज देना है। लड़की चीत्कार करने लगी। टहल सिंह से उसका रोना बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने कहा- चल बीस के छः दूंगा, मुझे यह लड़की दे दे। तेगा मान गया। टहल सिंह लड़की को घर ले आया। संक्रान्ति के पर्व पर अमृत छका कर उसका नाम भगवान कौर रख दिया। उसे डरा भी दिया कि अगर बाहर निकली तो तेगा तुझे मार देगा। घर से भागने की कोशिश की तो मैं मार दूंगा। लड़की तो सहम गई, पुत्तर! अन्दर की दहलीज़ से भी बाहर नहीं निकली। तब मैं भी ग्यारह-बारह की रही हूंगी। कभी-कभी मैं बेबे के साथ टहल चाचे के घर जाया करती थी। मुझे मरियम के साथ प्यार हो गया। हम सारा-सारा दिन अन्दर बैठी चादरों पर कढ़ाई करतीं, चरखा काततीं। नाम तो अब बेशक उसका भगवान कौर था पर मैं उसे मरियम कह कर ही बुलाती। एक दिन चाचे टहल ने मुझे इस बात पर फटकार भी लगाई। परन्तु मुझे अन्दर बुला कर इसने कहा- तू मुझे मरियम ही कहा कर।

बुआ सांस लेने के लिए रुक गई। बेशक वह काला दौर मैंने ज़रूर देखा होगा लेकिन उस वक़्त मुझे इतनी समझ कहां थी कि यह सब क्या हो रहा है? लोगों के घरों से धुआं क्यों उठ रहा है? लोग एक दूसरे के गले लग कर क्यों रो रहे हैं? …. पर अब मैं समझ सकता हूं कि उस वक़्त लोगों के मनों पर क्या गुज़री होगी। अब मैं यह अनुभव भी कर सकता हूं। मैं यह भी जानता हूं अगर मौत न आनी हो तो हर हादसा अपनी भयानकता खो देता है।

बुआ बोली- मैं अक्सर मरियम से पूछती- सहेली! कहां होंगे इस वक़्त तुम्हारे अब्बा, तुम्हारी अम्मी, तेरी बड़ी बहन फातिमा, तेरा नन्हा भाई फ़िरोज़, तेरी आपा नूरां? वह मेरे होंठों पर हाथ रख कर मुझे चुप करा देती। भरी हुई आंखों से कहती- न-न, तेगा मार देगा अथवा बोहड़ का बापू मार देगा। बड़ी-बड़ी आहें भरती। धीरे-धीरे रोती। …. आहिस्ता-आहिस्ता वह टहल सिंह को बापू कहने लगी गऊओं भैंसों से मोह का नाता बना लिया। एक गाय का नाम फातिमा रख लिया। भैंसे के कटरे को फ़िरोज़ कहने लगी। वह गाय और कटरे को आवाज़ लगाती। टहल सिंह झिड़कने के बजाय खुश होता सारा-सारा दिन वह गाय और भैंसों से बातें करती। कभी कहती तू मेरी अम्मी है, कभी कहती तू मेरी आपा है- बुआ ने आह भरते हुए कहा। टीन के डिब्बे से पानी पीया और मुझसे कहा- देख तो पुत्तर आ रहे हैं भागो को ले कर कि नहीं?

मैं तालाब के ऊपर से दूर तक गांव की ओर देखने लगा- नहीं बुआ। अभी तो कहीं दिखाई नहीं दे रहे। मेरी जिज्ञासा मरियम के विषय में जानने की थी पूछा- बोहड़ सिंह ताये से फिर इसका ब्याह कैसे हो गया? यह तो उसकी बहन लगती थी?

क्या पता पुत्तर, कैसे हुआ यह सब। तीन साल में ही इसने ऐसी कद काठी पा ली कि दहलीज़ लांघते हुए सिर झुका कर निकलती। इतना रूप कि टहल सिंह को चिंता सताने लगी। गांव के लड़कों को तो पता था। सोचते होंगे मुसली है- टहल सिंह अपना क्या कर लेगा। टहल सिंह समझदार था वह लड़की को अपने ससुराल छोड़ आया फिर मेरा विवाह हो गया। फिर तो पुत्तर तीस वर्ष तक हम एक दूसरे से नहीं मिली- बुआ ने ठंडी सांस ली।

मैं कुछ नहीं बोला- सिर झुकाये थड़े पर पड़ी पक्षियों की बीठ खुरचता रहा। बुआ स्वतः बोली- मुझे बाद में पता चला। खुद ही बताया मरियम ने। …. टहल सिंह की सास वृद्ध थी। लड़के वहां भी दीवारों के ऊपर से झांकने लगे। उसने संदेश भेज दिया कि भागो को आ कर ले जाओ। सुना है कि टहल सिंह ने गांव के सयाने लोगों से राय ली थी और रातों रात लड़की को अपने ससुराल से वापिस ले आया और दिन चढ़ते ही गुरूद्वारे में बोहड़ सिंह के साथ लांवें पढ़ा दी। (विवाह कर दिया)

मरियम ने न-नुकर नहीं की, बुआ? मैंने उदास मुद्रा में पूछा।

वह जो अन्दर से ही मर चुकी थी, उसने न-नुकर क्या करनी थी। पहले बेटी का धर्म था फिर बहू बन गई धर्म की। बोहड़ का रंग रूप तो तूने देखा है। चार घर उसको देख कर मुड़ गये थे। टहल सिंह ने सोचा लड़के का रिश्ता तो सिरे चढ़ता दिखाई नहीं देता। इतनी सुन्दर बहू कहां से मिलेगी। पर इस बाप की बेटी ने भी निभा कर दिखा दी। परमात्मा ने भी चार चांद लगा दिये। कुछ ही वर्षों में तीन बेटियों और तीन लड़कों की मां बन गई। घर में सुख समृद्धि आ गई। लोग तो भूल बिसर गए। पुत्तर साऊ निकले, बेटियां बड़े घरों में ब्याही गईं। घर में ट्रैक्टर, मारूति कार, स्कूटर…. बाक़ी सब का तो तुझे सब पता ही है। मुझे तो खुद का पता नहीं था। मैं तो कभी मायके आई नहीं थी। तेरे फुफड़ के पूरा होने के बाद कुछ ज़्यादा आने जाने लगी हूं। मैं कब आती थी? मैं तो सोचती थी कि मरियम कहीं मर खप गई होगी। एक दिन गुरूद्वारे में मैंने उसे पहचान लिया। उससे पूछा तो बोली- मरियम तो कब की मर चुकी। मैं तो भगवान कौर हूं। मैं तो उसके रूप रंग की ओर देखती रह गई। …. फिर बुआ ने व्यंग्यात्मक मुस्कान बिखेरते कहा- हूं, मर गई मरियम। कहती मैं तो भगवान कौर हूं। मुझे काले धागे में डाल कर पहनी हुई कृपाण दिखाने लगी। मुझे एक तरफ़ ले जा कर बोली- तू दया कौर है? फिर तो हम नित्य प्रति मिलने लगीं। उसने मुझे बताया कि उसका बड़ा बेटा गांव का सरपंच है। एक बेटा कचहरी में वकील है एक बेटा मास्टर है। एक बेटी थानेदार से ब्याही हुई है दूसरी का घर वाला फ़ौज में कैप्टन है। मेरी छोटी बेटी कैनेडा चली गई। मरियम तो कब की मर चुकी, दया कौर। अब तो मैं भगवान कौर हूं, जत्थेदारनी।

मेरे सामने तो वह हंसती रहती। पर मैं जानती हूं औरतों के मन की बात। मझे पता है वह मन से नहीं हंसती थी। मेरा जी करता कि कभी उससे पूछूं- अब कभी अम्मी-अब्बा याद नहीं आते? पर मैं डरती उससे नहीं पूछती। देख ले पुत्तर आज जत्थेदारनी भगवान कौर भी नहीं रहीं। बुआ ने ठंडी सांस भर कर कहा- देख तो पुत्तर, कहीं आ रहे हैं कि नहीं।

मुझे दूर गांव के एक मोड़ पर अर्थी लेकर आते हुए लोगों का हजूम दिखाई दिया- अभी दूर हैं, बुआ। मैंने कहा।

मैं अजीब सोचों में उलझ गया। कहां होंगे इसके अब्बा-अम्मी? होंगे भी या नहीं। क्या पता किसी क़ाफ़िले में जाते हुए रास्ते में मारे गये हों। अगर ज़िन्दा भी हुए तो उन्हें क्या मालूम कि जिस बेटी को उन्होंने मरा हुआ समझ लिया वह कितना बड़ा परिवार छोड़ कर गई है।

पुत्तर! तुझे और बताऊं, जिस दिन भागो बेहोश हुई थी उस दिन मैं वहीं थी। ताप भी कैसा कि सारा शरीर भट्ठी की तरह तप रहा था। डॉक्टर ने कहा कि माथे पर बर्फ़ की पट्टियां रखो। मैं पट्टियां रख रही थी। ये आंखें मूंद कर निढाल पड़ी थी। सहसा बड़बड़ाने लगी। ऊंची आवाज़ में- अब्बा, मुझे रीछ ने पकड़ लिया। रीछ मुझे घसीट रहा है। अब्बा! कहां हो तुम? फातिमा, मैं कुएं में गिर गई हूं। मेरे मुंह में पानी जा रहा है …. मुझे नहीं जाना बोहड़ के पास- रीछ मुझे बोहड़ की तरफ़ खींच रहा है। मेरे कांटे लगेंगे। वे फ़िरोज़ रीछ को पकड़ो …. अब्बा…. आ…. अब्बा…. अम्मी…. फातिमा आ बे फ़िरोज़। ले मेरी कोई बात नहीं सुन रहा। मैं आवाज़ें दे रही हूं। कहां गये सब लोग? और फिर वह बेहोश हो गई।

हम सब हैरान! घर के सब लोग हैरान। यह क्या हो गया भगवान कौर को। न कोई पुत्तर याद आया न कोई बेटी। किन लोगों को अवाज़ें लगा रही है। इतने बड़े परिवार का बोझ सारी उम्र उठाए रही…. बेहोश हुई तो सुरत कहां अटक गई।

बुआ सचमुच ही हैरान हुई बैठी थी। उसकी समझ से बाहर थीं यह सब बातें।

मैंने पूछा- बुआ उसके बाद ताई कुछ नहीं बोली, क्या? बोली थी, पुत्तर! बुआ बेहद उदास स्वर में बोली- ज़रा-सी होश आई थी। मुई उसी तरह आवाज़ें देने लगी। …. फिर दो एक हिचकी ली और बस।

बुआ चुप कर गई। भरी हुई आंखें पोंछने लगी।

मैंने देखा, लोग जत्थेदारनी भगवान कौर की अर्थी लेकर शमशान घाट के मुख्य द्वार तक पहुंच गये थे।

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