रचनाकार हूं भाई

-सुनीता ‘बेख़बर’

रचनाकार मतलब रचना करने वाला रचियता या बनाने वाला। दरअसल पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में रचनाओं के प्रति अजीब प्रेम उमड़ रहा है। अतः हमने एक रचनाकार से मिलने की ठानी। ये भाई साहिब लेखन के लिए जी रहे हैं, खा रहे हैं, कभी-कभी पी भी लेते हैं। ये लेखन की हर विधा में पारंगत हैं। यूं तो आजकल स्थान-स्थान पर क़लमघिस्सू सॉरी रचनाकार मिल जाते हैं। इसलिए हमने सोचा कि इनसे अच्छा रचनाकार शायद ही कोई मिले। रचनाकार बनने में ख़र्च ही कितना आता है। दो रुपये की क़लम, दो रुपए की कॉपी। महंगाई के ज़माने में कितना सॉलिड प्रोफेशन है, रचना करना।

भगवान दुनियां की रचना करता है, इन्सान आबादी की रचना करता है। सरकार कर की रचना करती है, नेता झूठे वादों की रचना करता है, वधू-पक्ष दहेज़ की रचना करता है, बढ़ई मेज़ की रचना करता है, अभिनेता पागलों की रचना करता है, प्रेमिकागण घायलों की रचना करती हैं। यानी संसार का हर जीव किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति व स्थान की रचना करने में जुटा है। तो हम पीछे क्यों रहें? अतः हम निकल पड़े एक रचनाकार से मिलने।

उनकी हालत पर मुझे बड़ा तरस आया। वे लिखने में मशगूल थे। उनके बिखरे-बिखरे बाल, किताबें व काग़ज़ बता रहे थे कि लेखन के सिवा उन्हें कोई काम नहीं। शायद आज नहाने और खाने का भी वक़्त नहीं मिला। बुझी-बुझी-सी आंखें मगर हर चीज़ में कुछ तलाशने की ललक लिए। अन्य औपचारिकताओं के बाद मैंने उनसे लेखन साहित्य का इतिहास जानना चाहा। वे बोले, “आप साहित्येतिहास को न छेड़कर वर्तमान में रहकर सोचें।” जब मैंने उनसे वर्तमान साहित्यिक गतिविधियों पर प्रकाश डालने की गुज़ारिश की तो वे अपने स्थान से फुदके, ‘जो आप लिख देंगी वह वर्तमान है।’

‘और भविष्य।’

‘भविष्य के लिए नवोदित लेखक-लेखिकाओं की कमी नहीं। विषय तो एक ही होता है मगर उसे रिपीट करने का अंदाज़ अलग-अलग होता है। हां रिपीट करते-करते कई बार विषय पिट ज़रूर जाता है।’

‘आप रचनाकार क्यों बने?’ मैंने कुरेदने के लहज़े में पूछा।

‘अपने दिल के अरमान निकालने के लिए मैं रचनाकार बना।’

मैंने सहज स्वर में पूछा, ‘अच्छा आपने अपने अरमान निकाल कर बेचे कितने रुपए में।’

‘अजीब बदतमीज़ी है, अरमान भी कभी बिकते हैं क्या?’ ग़ुस्से से लाल-पीले हो चुके रचनाकार ने कहा। 

‘तो क्या महज़ पुस्तकों तक सीमित रखने के लिए आपने अपने अरमान निकाले थे?’

‘नहीं, अरमानों से तात्पर्य विचारों से है। मेरी रचनाओं को पढ़कर सहृदयों को सुकून मिलेगा। दिल-दिमाग़ को शान्ति मिलेगी, जीने का सलीक़ा मालूम होगा।’ वे समझ रहे थे।

‘आपको ऐतराज़ न हो तो एक बात कहूं।’

‘हां, हां कहिए।’

‘क्या देश में सिनेमाघरों, होटलों, टी.वी. चैनलों, मयख़ानों, दर्शनीय स्थानों और क्रिकेटरों की कमी है कि लोग रचनाएं पढ़कर सुकून प्राप्त करना चाहेंगे? रही दिलो-दिमाग़ की शान्ति की बात तो गीता, रामायण, महाभारत, वेद और पुराण आदि पुस्तकें क्या शो-केस में स्थापित करने के लिए हैं? आधुनिक युग में बच्चे इतने होनहार हो गए हैं कि मां-बाप को जीने का सलीक़ा सिखा दें। फिर रचनाकार का स्थान कहां रहा?’

‘आप कभी रचनाकार नहीं बन सकेंगी, क्योंकि दिल की गहराई से किसी बात को समझने की क्षमता आप में नहीं है।’

माफ़ी मांगते हुए मैंने उनसे रचनाकार बनने के फ़ायदे पूछे।

‘रचनाकार बनने का मात्र एक फ़ायदा है कि घर बैठे-बिठाये लोग आपको जानने लगते हैं।’

‘आर्थिक तौर पर रचनाकारिता कितनी लाभदायक है?’

‘इस दृष्टि से यह धंधा बड़ा ख़राब है। पहले ख़र्च करना पड़ता है, बाद में थोड़ी बहुत कमाई होती है। सम्पादक इतने नख़रीले होते हैं कि एक रचना प्रकाशित करने में उनकी जान निकलती है। मशहूर रचनाकारों को अधिक स्थान मिलने के कारण, तुम जैसे रचनाकारों की रचनाएं सालों सम्पादकों की संदूक में प्रकाशित होने के लिए कसमसाती रहती हैं। यदि आप राजनीति से सम्बद्ध लोगों से सम्पर्क बनाएं तो अवश्य किसी ‘ईनाम’ की आशा की जा सकती है। ईमानदार रचनाकारों को कौड़ी के भाव समझा जाता है। मरने के बाद यश होता है, कमाई उनकी नहीं, फ़िल्में व सीरियल बनाने वालों की होती है।’ उन्होंने लाचारगी भरे शब्दों में कहा।

“मैंने सुना है रचनाकार सच्चाई ब्यां करता है।”

“बिल्कुल।”

‘लेकिन रचनाकार जब पूर्व प्रकाशित रचनाओं को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखता है तो क्या यह एक झूठ नहीं है?’

‘रचनाकार हूं भाई यही चाहूंगा कि देश के कोने-कोने में जन-जन तक मेरी आवाज़ पहुंचे और फिर अप्रकाशित या पूर्व प्रकाशित रचनाओं से झूठ का क्या लेन-देन?’

मुझे ‘कौड़ी के भाव’, ‘मरने के बाद यश’ व ‘आर्थिक लाभ न दिलाने’ के कारण रचनाकार बनना गवारा नहीं हुआ। लेकिन जब से दिल की गहराई से किसी बात को समझने का अभ्यास किया तो ख़ाली वक़्त में, शब्दों को जोड़कर, उन रचनाकार से वार्तालाप को काफ़ी सुखदायक महसूस किया। मैं उन रचनाकार पर व्यंग्य नहीं कर रही। आख़िर अब मैं भी उन्हीं की कैटेगरी से हूं यानी ‘रचनाकार हूं भाई।’  

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