लेखक की पत्नी होने का सुख

-लीना कपूर

सर्वप्रथम मुझ दुखियारी का करबद्ध अभिवादन स्वीकार करें। मैं आपको अपना दुखड़ा सुनाना नहीं चाहती थी पर क्या करूं? बताए बिना रहा नहीं जाता।

हां तो शुरू करूं? मैं एक लेखक की पत्नी हूं। लेखक! क्या शान है इस नाम में। लेखक जो पत्र-पत्रिकाओं में छाया रहने वाला बुद्धिजीवी कहलाता है पर मैं ही जानती हूं कि लेखक की पत्नी होना कितना दुःखदायी है।

मैं उस घड़ी को कोस रही हूं, जब इनके लेखन गुण के बारे में सुनकर इनसे शादी करने की ठान बैठी थी। सुहागरात के समय ही मुझे अपनी फूटी क़िस्मत का पता चल गया था। जब ये मेरा घूंघट उठा कर बोले थे, ‘प्रियतमे आज की यामिनी भी उज्जवल है। तुम्हारे शुभ आगमन से मेरे हृदय की कालिमा दूर भाग गई है। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम मेरे सूने जीवन का पथ अपनी प्रीत से आलोकित कर दोगी।’

यक़ीन मानिए, मैं तो पहले पहल घबरा गई थी कि ये किस भाषा में बतिया रहे हैं? लेकिन अब इनकी इस लेखकीय भाषा को सहने की मुझे आदत हो गई है।

धीरे-धीरे मुझे इनकी अन्य बुरी आदतों का भी पता चलने लगा। बुरी आदतों से मेरा तात्पर्य जुआ, शराब, सिगरेट वग़ैरह से नहीं बल्कि इनके लेखन संदर्भ से है।

उस दिन अपनी एक कहानी दिखाकर बोले, “ज़रा पढ़ कर देखो तो कैसी लगी?” कहानियों में तो मेरी रुचि बचपन से है। सो मैंने पूरी निष्ठा के साथ इनकी वह रचना पढ़ी। कहानी अच्छी थी सो मैंने तारीफ़ भी की।

उसी तारीफ़ का ही परिणाम है कि जनाब अब हर रचना मुझे पढ़ाने लगे हैं। इस पर भी बस नहीं, वरन् पूछते हैं, “इस रचना का शिल्प कैसा है? कथ्य को अनावश्यक विस्तार तो नहीं दिया? कोई शब्द क्लिष्ट तो नहीं?”

इनके कहे वाक्यों को समझने के लिए मैंने एक शब्दकोष ख़रीदकर रख लिया है। क्या पता मुझे अनपढ़ या जाहिल ही न समझ लें।

मैंने इन से कितनी बार कहा है कि मुझे नया ज़रीदार सूट दिलवा दो पर इनका हर बार एक ही कथन होता है, “अमुक पत्र-पत्रिकाओं से पारिश्रमिक आने दो। सबसे पहले तुम्हारा सूट ही ख़रीदेंगे।”

पर हाय रे! वह पारिश्रमिक आज तक मेरे लिए नहीं आया, बल्कि इनके क़लम, काग़ज़ों, डाक-टिकट, पत्र-पत्रिकाओं तथा लिफ़ाफ़ों में ही ख़र्च होकर रह गया।

कभी-कभार हुज़ूर कविता भी करते हैं। जब मेरे रूप सौंदर्य पर लिखते हुए श्री देवी या माधुरी से तुलना करते हैं, तब मैं बड़े चाव से सुनती हूं। लेकिन अधिकांश कविताएं तो ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनते-सुनते मुझे निद्रा आने लगती है।

उसी दिन आधी रात को ये अचानक उठ गए तथा कॉपी में कुछ लिखने बैठ गए। मैं तो बहुत डर गई कि कहीं किसी रोग के लक्षण तो नहीं? जब सुबह डॉक्टर के पास चलने को कहा तो हंसकर बोले, “अरे, वह तो एक ‘प्लाट’ दिमाग़ में आ गया था।” 

उफ़! सोते जागते हर वक़्त लेखन के विचार। मैं तो डरती हूं किसी लेखन के कीटाणु इन्हें रोगग्रस्त न बना दें।

इनके दोस्त भी हैं तो ऐसे…. कोई कविता सुना रहा है तो कोई पांडुलिपि दिखा रहा है। किसी को फलां पत्रिका की प्रति चाहिए तो किसी को अपनी रचना का संशोधन कराना है। हर समय लेखन-चर्चा। घर, घर नहीं ‘प्रेस कल्ब’ दिखाई पड़ता है। मैं क्या करूं?

न जाने डाक से इन्हें इतना मोह क्यों है? बेसब्री से डाकिए की राह ताकते हैं और चिट्ठियां मिलते ही घर की सुधबुध खो बैठते हैं। हर बार एक रचना छपने पर ढेरों पत्र आ जाते हैं। नर प्रशंसक तो शौक़ से पत्र लिखें, किन्तु उन छुईमुइयों से क्या कहूं जो इन्हें तरह-तरह के ख़त लिखती हैं। किसी को इनका हस्ताक्षरित फ़ोटो चाहिए तो किसी को पत्र मित्रता, कोई तो मिलने का समय ही मांग बैठती है और मेरे भोले मियां जी उनके ख़त पढ़ कर इतने प्रफुल्लित हो उठते हैं जैसे कारूं का ख़ज़ाना पा लिया हो। हे मेरी नादान कमनीय सखियो! तुम्हें क्या मिलता है मुझे तड़पाकर?

घर को सजाना-संवारना हम औरतों का प्रथम कर्त्तव्य है। लेकिन मेरे लेखक साहब का कमरा तो रद्दी का गोदाम नज़र आता है। जिधर भी देखो, क़िस्म-क़िस्म के अख़बार तथा पत्रिकाएं बिखरी पड़ी हैं। उस दिन मैंने अख़बारों का एक बंडल क्या बेच दिया कि मुझ पर बिगड़ पड़े। शाम की चाय तक नहीं पी। पता नहीं इन बेजान काग़ज़ों से इन्हें क्या लगाव है? शायद पत्र-पत्रिकाएं इकट्ठी करके अपना नाम गिनीज़ बुक में दर्ज़ करवाना चाहते हैं।

सर्वविदित है कि हर पुरुष की सफलता के पीछे नारी का हाथ होता है। इनके लेखन की प्रेरणा भी मैं हूं।

मेरे बनाव-सिंगार, खान-पान, रूठने-मनाने के हर अंदाज़ पर इन्होंने रचनाएं लिखकर वाहवाही पाई और मैं बेचारी अभी गुमनाम हूं। यह दुखड़ा क्या कम है?

अब तो आप मेरी व्यथा भली भांति समझ गए होंगे। यही इल्तिजा है कि मेरे दुखड़े को जानकर हर लेखक नसीहत ग्रहण करे। अगर कहीं आपको कोई शब्द ‘दुरूह’ प्रतीत हो तब क्षमा याचना ही कर सकती हूं क्योंकि ‘जैसी संगति बैठिए, वैसो ही फल होय।’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*