आओ चुनाव-चुनाव खेलें

-विद्युत प्रकाश मौर्य

बचपन में आईस-पाईस खेलते थे पर अब उनका महत्वपूर्ण शगल बन गया है चुनाव-चुनाव। जल्दी-जल्दी चुनाव न हो तो नेता जी का मन नहीं लगता है। उनका बस चले तो वे हर साल चुनाव करवाते रहें। इससे क्या होगा जनता वोट देने में ही उलझी रहेगी फिर रोटी कैसे मांगेगी। लिहाज़ा उन्होंने पांच साल पूरे करने का सब्र भी नहीं किया। समय से पहले ही संसद भंग करने की सिफ़ारिश कर डाली। उन्हें किसी ज्योतिषी ने सलाह दी थी कि अब होली में चुनाव खेलो। पिचकारी में चुनावी रंग भर कर जनता के सामने फेंको। जनता इसका प्यार से जवाब देगी। क्या पता अगली होली में क्या होगा। नेता जी ने जब पहली बार चुनाव लड़ा तभी से उन्हें चुनाव लड़ने का चस्का लग गया। हालांकि पहला चुनाव वे हार गए थे। पर चुनाव जीतने के बाद भी अच्छा लगता है, हारने के बाद भी। हारने के बाद जब तक विपक्ष में रहो सत्ता पक्ष को गालियां देने में असीम आनंद की अनुभूति होती है वहीं अगर सत्ता में आ गए तो सत्ता के सुख का नशा तो कुछ और ही होता है। यह इंद्र के आसन से भी ज़्यादा मिठास भरा होता है। अप्सराएं चंवर डुलाती हैं। लोग पोटली लेकर आते हैं। नेता जी उन्हें माथे से लगाते हैं और कहते हैं क़सम से पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से किसी तरह कम भी नहीं। तभी तो हमारे जूदेव भैया राजपाट छोड़कर सत्ता के नशे का रसपान करने के लिए राजनीति में आए।

हमारे नेता जी चाहते हैं कि सालों भर बारह महीने चुनाव-चुनाव का खेल चलता रहे। लोक सभा चुनाव, राज्य सभा चुनाव, विधान सभा चुनाव, पंचायत चुनाव, नगर निगम चुनाव आदि के महीने तय कर दिए जाएं। जनता जब भी विकास की बात करे तो उसे बतांएगे कि यह काम इस चुनाव के बाद। फिर उसके काम को अगले चुनाव के बाद टालते जाएंगे। जैसे बच्चा खिलौने की ज़िद्द भूल जाता है उसी तरह जनता भी अपनी मांग भूल जाएगी। हम तो बस उससे वोट डलवाते रहेंगे। हां चुनाव के समय उसके लिए थोड़े से नाच गानों का प्रबंध कर देंगे। ग़म ग़़लत करना चाहे तो हर चुनाव में दारू व मुर्गे का प्रबंध तो होता ही रहता है। वोटर तो दारू पीकर हमारे सौ खून माफ़ कर देता है। उसके असली फील गुड का वही तो मौसम होता है। सत्ता में आने के बाद हम फिर अगले चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो जाएंगे। जब तक जिंदगानी है खेल तो ज़ारी रहेगा। चुनाव… चुनाव…। 

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