हार

दूसरों के घर बर्तन मांजकर अपने चार बच्चों का पेट पालने वाली विधवा बसन्ती ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। मायके में बचपन में ही माता-पिता स्वर्ग सिधार जाने के बाद उसने अपने छोटे भाई बहनों को मेहनत-मज़दूरी करके ही पाला-पोसा था। खुद की शादी सेना के एक जवान से हो गई तो सोचा बाक़ी की ज़िन्दगी चैन से कट जाएगी। परन्तु सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए पति भी वीरगति को प्राप्त हो गया, तब से बच्चों का पेट पालने के लिए घर-घर जाकर बर्तन मांजना उसकी नियति बन गई है।

एक दिन उसके नन्हें बेटे अमित ने पूछ ही लिया, मां! जिनके पापा देश के लिए मर जाते हैं उन सब की मां, क्या दूसरों के घरों में बर्तन मांजती हैं? यह सुनकर बसन्ती निरूत्तर हो गई। पहली बार ज़िन्दगी में उसे लगा जैसे वह हार गई हो अपने बच्चों के सामने।

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