रुको मधुमास

-मीरा हिंगोरानी

ज्योंही जेष्ठ की तपती, दुपहरी ढलने लगती है और आषाढ़ का आगमन होने लगता है। पेड़-पौधे, झाड़-झंखाड़ हरिया उठते हैं। सूखी बंजर धरा का आंचल भी भीग उठता है। आकाश में ऊदे बादल उमड़-घुमड़ कर खड़ताल बजाने लगते हैं। ऐसे में पीहर आई गोरी का मन, चंचल चपल हो उठता है। पिया की पाती पाने को, मन हुलसने लगता है। तब वह उलाहना देती है-

तेरी यादों ने मेरी,

पीड़ा को हुलसाया है।

रूठा था फागुन मुझसे,

अब सावन पास न आया है।

गोरी अपने पिया की पाती की प्रतीक्षा में दरवाज़े पर, हर आहट की टोह में लगी रहती है इधर-

घनन-घनन-घन/गर्जन लागे,

बरसी बूंदरिया छनन-छनन-छन,

जियरा कांपे थर-थर-थर।

विरह के जल में भीग कर गोरी आतुर-आकुल हो उठती है। ऐसे में उसे पी बिन, सावन सूना-सूना सा लगता है।

लोग कहें आंखें भर आईं।

मैं नयनों से झरती हूं।

सखी मैं अपने से डरती हूं।

इन बड़ी-बड़ी गौरवर्ण आंखों में, अब सलोने सपने नहीं सुहाते। बस हरदम झर-झर झड़ी-सी लगी रहती है। गोरी गाने लगती है-

बिन सपने रूठी रही।

मुझसे लेकिन रात!

सावन भी तो लौट गया,

दिए बिना सौग़ात।

स्लेटी सांध्य वेला में, नदी तट पर खड़ी गोरी, अपने पी के आने की वाट जोहती है। जाने कौन मंगल बेला में पी का आगमन हो। सावन के झूले पड़े हैं, बागों में अम्बुवा की डार पे, बैरन कोयल कुहू-कुहू की रटन लगाए है। अब आ भी जाओ, मत तरसाओ। बासंती बयार भी फ़ाख्ता सी फुदकती, अटरिया पे आ बैठी है।

पापी पपीहा शोर मचाए

कैसे झूला-झूलन, जाए री गोरी।

प्रकृति के कण-कण से छलक रही मादकता। बासंती पवन ने भी ख़स के खज़ाने खोल दिए हैं। अब तो गोरी की आंख का काजल भी कुलबुलाने लगा है। गाल भी गदरा गए हैं। रात में छत पे लेटी विरहन गुनगुना रही है- “ज्यों-ज्यों बूंदे परे, जिया लरज़े! छतियां मोरी तकरार करें।”

इतनी मिन्नतों पर भी यदि, पिया ने कोई बहाना बना लिया, टाल-मटोल की! तब! गोरी की रही सही उम्मीद भी बरसाती नाले सी, उमड़ पड़ती है। अब रात में छत पर लेटी विरहन यूं गुनगुना रही है-

जूं-जूं बूंदे परे,

जिया लरज़े/छतियां मोरी तकरार करें।

उदास, निराश, हताश आंगन में नीम तले, खटिया पे बैठ, प्रिय को संदेश लिखने बैठती है पर मन है कि अधजल गगरी-सा छलक-छलक पड़ता है-

पत्तिया मैं कैसे लिखूं/लिखयो न जाय

क़लम गहे मोरे, कर कांपत हैं,

सखी! नयन

रहे झरलाय।

यौवन का फिसलन भरा परिवेश! तिस पर सावनी खुमार। गोरी का चपल चंचल मन हिरनी-सा कुलांचे भरने लगता है। अब ऐसे उद्यमी-उद्दंड मन का वह क्या करे?

गोरी की अन ब्याही सखियां, झूले पर बैठी, कोकिला-कंठी स्वरों में, आल्हा गीत गा रही हैं।

खट्टी नीम निमोली/सावन जल्दी आईयो रे।

अम्मां नहीं बुलावेगी।

बाबुल, दूर न ब्याहियो रे।

अब की बरस भेज, भैया को बाबुल। परदेसी पी ने शायद कोई, सौतन पाली है, जो गोरी के तन पर, कटार बन वार कर रही है। इधर सखियों के गीत, मन को छलनी कर रहें। अब अटरिया पे कगवा भी बोलन लगा है।

न भेजी चिट्ठियां ना कोई ख़बरिया।

बलमा बजैर, जियरा हमार!

गोरी की व्यथा नयनों से रिस-रिस बहने लगती है। मन उचाट हो गया है। कुछ सूझता नहीं! थक हार कर बसंत से विनती करती है।

कुछ दिन और रुको मधुमास,

वायु बासंती बहने दो!

कंपित लाज भरे अधरों को,

बात अधूरी कहने दो।

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