विज़डम ट्री

-जसबीर भुल्लर

  विज़डम ट्री अर्थात् बोध वृक्ष फ़िल्म एण्ड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्डिया, पुणे के प्रभात स्टुडियो के नज़दीक खड़े उस वृक्ष का नाम ‘विज़डम ट्री’ पता नहीं किस समय पड़ गया था।

विज़डम ट्री एक साधारण-सा आम का वृक्ष है परन्तु फिर भी वह साधारण नहीं। 1983 में मैं पहली बार फ़िल्म इंस्टीट्यूट गया था। उस समय तक वह वृक्ष अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका था।

फ़िल्मों से संबंधित लोग उस वृक्ष को जानते हैं। उस वृक्ष के हवाले से वह पुरानी यादों को ताज़ा करते हैं। वह वृक्ष फ़िल्म इंस्टीट्यूट की मुहब्बतें-बिछोह, सपनों के बनने-दरकने और बौद्धिक बहस का चशमदीद गवाह है। इस वृक्ष के नीचे बैठ कर कइयों ने फ़िल्मों के बड़े सितारे बन जाने के दावे किए थे और फिर गुमनामी के अंधेरे में गुम हो गए थे।

इसी वृक्ष के नीचे ओम पुरी ने निराशा में डूब कर कहा था, ‘शायद मेरा चेहरा मुझे फ़िल्मों में सफल न होने दे।’ इसी वृक्ष के नीचे मृणाल सेन और श्याम बेनेगल जैसों ने फ़िल्म इंस्टीट्यूट के छात्रों की समस्याओं को सुलझाने का यत्न किया था। इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर शबाना आज़मी, जया भादुड़ी, रिहाना सुलतान, ज़रीना वहाब, योगिता बाली और कइयों ने सफल अभिनेत्री होने की कल्पना की थी। इसी वृक्ष के नीचे बैठकर मिथुन चक्रवर्ती, शत्रुघ्न सिन्हा, नसीरुद्दीन शाह, सुरेश ओबरॉय, ओम पुरी तथा औरों को फ़िल्में दूर देश की बात लगती थी। इसी वृक्ष के नीचे उस समय एफ.टी.आई.के लड़के-लड़कियों को मैंने साथ-साथ सिगरेट पीते तथा धुएं के छल्ले उड़ाते देखा था।

1983-84 और 85 में इसी वृक्ष के नीचे हम कुछ दोस्त बैठते थे। उन दोस्तों में गुलशन कपूर, गुरचरण चन्नी तथा सुरिन्दर चौधरी शामिल थे। चाय की चुस्कियां भरते हम इंस्टीट्यूट में दिखाई गई नई फ़िल्मों की परतें खोलते थे, साहित्य की चर्चा करते थे।

इसी वृक्ष के नीचे मैंने प्रोफ़ेसर गुलशन कपूर के मुंह से जापान के महान् फ़िल्म साज़, निर्देशक अकीरा कुरुसावा का नाम पहली बार सुना था।

1910 में वह टोकियो (जापान) में पैदा हुआ था। परिवार के आठ बच्चों में वह सब से छोटा था। अकीरा कुरुसावा चाहता था कि वह चित्रकार बने परंतु आर्टस स्कूल में उसे दाख़िला नहीं मिला। पेन्टर के तौर पर ग़रीबी भोगते उसने फ़िल्मों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा आज़माने के बारे में सोचा और फिर निजी यत्नों से सहायक निर्देशक बन गया। दरअसल फ़िल्म बनाने के समय भी वह चित्रकार ही था, अन्तर सिर्फ़ इतना था कि वह तस्वीरों के लिए रंगों और ब्रशों की जगह सैल्युलाइट का प्रयोग करने लग पड़ा था।

आयु के 33वें वर्ष में उसने अपनी पहली फ़िल्म ‘सन शीरो सुगाटा’ अर्थात् जूडो गाथा निर्देशित की थी। इस फ़िल्म की सफलता ने उसे स्थापित निर्देशकों की लाइन में खड़ा कर दिया। राशोमोन (1950), द सैवन समुराय (1954), थ्रोन ऑफ़ वर्ल्ड (1957), योज़िबों (1961) कागेमुशा (1980) उस की महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं।
अकीरा कुरुसावा की फ़िल्मोंं ने दुनिया भर के कई निर्देशकों की पीढ़ियों को सिर्फ़ प्रभावित ही नहीं किया बल्कि उनकी वह प्रेरणा भी बना है।

अकीरा कुरुसावा में मेरी रुचि देख कर प्रोफ़ेसर गुलशन कपूर मुझे उसकी बातें सुनाता रहता था। गुलशन कपूर को एक फ़िल्म मेले के समय उसके साथ रहने और बातें करने का मौक़ा मिला था। वह छोटी-सी मुलाक़ात उसकी ज़िंदगी की बहुत बड़ी प्राप्ति थी। पहले तो अकीरा कुरुसावा का नाम मेरे लिए याद रखना भी कठिन था। फिर मैंने फ़िल्म ‘दी सैवन समुराय’ देखी तो वह जैसे मेरे गहरे अन्दर घर बनाकर ही बैठ गया।

फिर मेरी प्राप्ति यह हुई कि मैंने नैशनल फ़िल्म आरकाईवज़ के बहुमुल्य ख़ज़ाने में से अकीरा कुरुसावा की बहुत सारी फ़िल्में देख लीं। मैंने वह फ़िल्में फ़िल्म इंस्टीट्यूट के मेन थिएटर में देखीं थी। वहां ही मैंने र्इंग्गार बर्गमैन की फ़िल्म ‘वाईल्ड सट्राबैरीज़’ देखी थी। मेरे मन में पता नहीं क्या आया कि मैंने इन फ़िल्मों की सक्रिप्ट फ़िल्म इंस्टीट्यूट की लाइब्रेरी में से निकलवा लीं। शायद मैं देखना चाहता था कि ऐसी महान् फ़िल्मों की सक्रिप्ट कैसी होती है।

बर्गमैन की सक्रिप्ट संक्षेप में लिखी हुई थी। उसने बहुत सारे विवरण को अपनी कल्पना के लिए छोड़ दिया था। फ़िल्म के पूरे कई दृश्य सक्रिप्ट में से गायब थे। मुझे लगा, शूटिंग के समय कल्पना बर्गमैन की सक्रिप्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा हो जाती थी तथा वह कई बार सक्रिप्ट को एक तरफ़ रख के कल्पना को पहल दे देता था। इसके विपरीत ‘दी सैवन समुराय’ की सक्रिप्ट काग़ज़ों का भारी पुलिंदा थी, ‘वाईल्ड सट्राबैरीज़’ की सक्रिप्ट से लगभग चौगुना।

अकीरा ने दृश्य निर्माण के लिए कल्पना को शब्दों में उतारा था। समुराय की सक्रिप्ट इतनी गहराई से लिखी हुई थी कि उस सक्रिप्ट को अकीरा कुरुसावा की जगह कोई और भी फ़िल्मा रहा हो तो भी परिणाम अच्छे ही होने थे। कौन से दृश्य के समय कैमरा कहां रखा गया हो, सीन कौन से ऐंगल से फ़िल्माया जाए, कैमरे के फ्रेम में क्या हो, कितना हो, कैमरा कब ऑन हो, कब क्लोज़अप, कब मीडियम शॉट, कब लांग शॉट, कब ज़ूम ईन, कब ज़ूम आऊट, कब फेड-इन, कब फेड आऊट, क्या कहना हर दृश्य के साथ ही ऐसे विवरण शामिल थे। तौबा! इतनी मेहनत! मुझे लगा उस सक्रिप्ट से शॉट प्लैन करना भी सीखा जा सकता था और निर्देशन भी।

वर्ष 1998 वर्ष में फ़िल्म इंस्टीट्यूट में मैं तेरह सालों के बाद गया था। बीते दिनों को मैं पहले की तरह ही जीना चाहता था। उस समय मैं किसी कॉलेज के पुराने छात्र जैसा था जो सालों बाद कॉलेज में अपने अतीत को ढूंढने आता है। उस समय मुझे अपनी एक नज़म याद आई।

‘कितना उदास करता है,
बे आबाद वृक्षों पर
पुराने घोंसलों का
हवा के झोंकों से
तिनका-तिनका गिरते रहना
कि अपनी तलाश में
कॉलेज के वर्षों की ओर चलना
क्लास रूम की
पुरानी कुर्सियों को पलोसना
गुम हुए
मोहब्बती चेहरों को ढूंढना
और कैन्टीन की चाय के
टूटे कप से
बे पहचान हो कर लौट आना।’
(नज़म ‘बीते दा लिबास’ में से)

      मैं अनजान-सा विज़डम ट्री के पास खड़ा था नितांत अकेला।

आज मुझे फ़िल्म इंस्टीट्यूट के गेट के पास अबदुल रहमान नहीं मिला था। वह अकसर चाय की वैन के पास एक बैंच के ऊपर बैठा मिलता था। वह मुझे देख कर हंसता था। हाथ में पकड़ी सिगरेट का गुल चुटकी मारकर झाड़ता था और फिर आवाज़ देकर वैन वाले से कहता, ‘ओए चड्डे! भुल्लर साहब आए हैं, चाय रखना।’ न करने पर वह बातें करता-करता मेरे साथ ही चल पड़ता था। किसी ज़माने में अबदुल रहमान बहुत ही सुन्दर नौजवान था। कहते हैं वी.शान्ताराम के प्रभात स्टुडियो के एक हिस्सेदार की लड़की उसे पागलों की तरह इशक करने लग पड़ी। माता-पिता की मरज़ी के ख़िलाफ़ उसने अबदुल रहमान से शादी कर ली। अमीर घर की लड़की के साथ तुलने के लिए उसने कई पापड़ बेले थे। उसने एक फ़ीचर फ़िल्म भी बनाई थी, जो पूरी तरह फेल हो गई। तंगियों से जूझता आख़िर वह फ़िल्म इंस्टीट्यूट के गेट पर सिक्योरिटी गार्ड हो गया परन्तु इस अबदुल रहमान के दबदबे में कमी नहीं आई थी। इंस्टीट्यूट के प्रो., छात्र तथा कर्मचारी उसे ‘चाचा’ कह कर दुआ सलाम करते थे परन्तु हार उसे अंदर से खरोंच रही थी। वह धीरे-धीरे शराब में डूब रहा था।

मेरे साथ चलता-चलता वह विज़डम ट्री के पास रुक जाता था और कभी-कभी चिड़ कर सिगरटों का गुल झाड़ता था। ‘इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर वह मुझसे सिगरटें मांग-मांग कर पीते थे। उनमें शत्रुघ्न सिन्हा भी था, ओम पुरी भी, नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती और……।’ वह फ़िल्म इंस्टीट्यूट के पुराने छात्रों की सूची खोल लेता था। लम्बा कश खींच कर धुआं छोड़ता था, चुटकी मारकर गुल झाड़ता था और फिर दु:खी हो कर बताता था, ‘उनकी चाचा-चाचा कहते ज़ुबान सूखती थी। छोटी-छोटी कठिनाई के समय मुझसे मशविरा लेते थे। अब वह कभी-कभार यहां आएं भी तो मेरे साथ आंख नहीं मिलाते।’

मैंने एफ. टी. आई. के अंदर दाख़िल होते ही गेट की गार्ड ड्यूटी वाले संत्री को अब्दुल रहमान के बारे में पूछा था। उसने लंबी सांस ली थी, ‘चाचे को स्वर्गवास हुए तो साल हो गया है। बस, शराब ही उसे पी गई।’

फ़िल्म इंस्टीट्यूट की मुख्य सड़क उस समय वीरान थी। इम्तिहान के बाद छात्र अपने घर छुट्टियां मना रहे थे। विज़डम ट्री के चबूतरे पर उस समय कोई नहीं बैठा हुआ था।

एक्टर जगीरदार के फ़िल्म इंस्टीट्यूट छोड़ने के बाद गुलशन कपूर ने एक्टिंग विभाग का चार्ज संभाला था। अधिकतर लोग उसे ‘गांधी’ और ‘कमला’ फ़िल्म के एक्टर के रूप में जानते थे परन्तु उसका फ़िल्म की विद्या और साहित्य के बारे में ज्ञान असीम था। उन दिनों वह एक बड़े आकार का नावल भी लिखना चाहता था। वह उर्दू के अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो का समकाली था। वह और मंटो रेडियो पर एक साथ काम करते रहे थे। गुलशन कपूर मंटो की बहुत बातें बताता था। मंटो की एक बात मेरे लिए बिलकुल नई थी कि मंटो कई बार शर्त लगाकर कहानी लिखता था। वह कहानी शाम से पहले-पहले लिखनी होती थी। गुलशन कपूर और दूसरे साथी सोच-सोच कर मंटो को कोई कठिन विषय देते थे, वह शाम तक कहानी लिख कर सभी को हैरान कर देता था। वह शर्त आमतौर पर शाम की शराब होती थी।

प्रो.गुलशन कपूर अब फ़िल्म इंस्टीट्यूट से रिटायर हो चुके थे। गुरचरण चन्नी ने गुलशन कपूर से पहले ही एफ.टी.आई. छोड़ दिया था। वह पहले जालंधर दूरदर्शन पर प्रोड्यूसर था। वहां से नौकरी छोड़ कर वह एफ.टी.आई. के टी.वी. विंग में प्रोफ़ेसरी करने लग पड़ा था। उस समय हमारी बहुत सारी शामें इक्ट्ठे गुज़रती थीं। अब वह मेरे नज़दीक चण्डीगढ़ में आ कर रहने लगा था। वह फ़िल्मेंं बनाने में इतना मसरूफ़ हो गया था कि हमारा आपस में मिलना कठिन था। ‘टूटू’ उसकी एक यादगार फ़िल्म थी। मैंने चण्डीगढ़ उसके नज़दीक रह कर उसे याद नहीं किया। कम्बख्त मुझे बोध वृक्ष की छाया के नीचे याद आया था।

सुरिन्दर चौधरी फ़िल्म डायरेक्शन के प्रोफ़ेसर हैं। वह स्वभाव से लेखक हैं। उन्होंने फ़िल्म स्क्रिप्ट के एन.एफ.डी.सी के इनाम भी जीते हुए थे। फ़िल्मों के निर्देशन के अलावा उनका सत्यजीत रे पर खोज कार्य काफ़ी महत्वपूर्ण है। अब भी वह सत्यजीत रे के साथ संबंधित सेमिनार में शामिल होने तथा खोज पत्र पढ़ने के लिए जर्मनी गए हुए थे। फ़िल्म इंस्टीट्यूट की मुख्य सड़क उस समय सुनसान थी और मैं बोध वृक्ष के पास अकेला खड़ा था।

अचानक जैसे बादल बिखर गए हों। प्रो.सतीश कुमार कहीं से हंसता हुआ आया और आकर आलिंगनबद्ध हो गया, ‘तुम वही हो न जो कहानी लिखते थे।’

प्रो.सतीश कुमार ऑडियोग्राफ़ी विभाग का मुखिया है। वह शांत-सा आदमी हमारी महफ़िलों का कभी-कभार हिस्सा भी होता था। परन्तु मुझे पता ही नहीं था कि वह स्नेह के किसी रिश्ते में मेरे साथ भी जुड़ा हुआ था।

उसके आलिंगन में मुझे लगा, तेज़ दोपहर में मुझे धूप में खड़े हुए को बोध वृक्ष ने अपनी छाया में ले लिया हो। हम दोनों कैंटीन की ओर चल पड़े। कैंटीन नई इमारत में तबदील हो चुकी थी। हम पुराने दिनों की तरह चाय का गिलास हाथ में लेकर बोध वृक्ष के नीचे नहीं बैठ सकते थे। बोध वृक्ष नई कैंटीन से दूर था।

कैंटीन की पुरानी इमारत खण्डहर हुई अतीत को याद करती प्रतीत हो रही थी। प्रो.सतीश कुमार ऑडियोग्राफ़ी विभाग का मुखिया बन चुका था। चाय ख़त्म करने के बाद वह मुझे अपने विभाग की ओर लेकर चल पड़ा। रास्ते में उसने सिनेमा की बात छेड़ ली। हम बहुत फ़िल्में देखते हैं लेकिन हमें फ़िल्म देखनी नहीं आती। दरअसल सिनेमा की अपनी एक भाषा है। वह भाषा हमें नहीं आती। हम वह भाषा सीखने की कोशिश भी नहीं करते। सिनेमा की भाषा की अज्ञानता साधारण लोगों के अलावा लेखकों, पत्रकारों, चित्रकारों, संगीतकारों यहां तक कि बहुत सारे पंजाबी फ़िल्मों के निर्माताओं में भी है।      

हम जब भी फ़िल्म देखते हैं तो अचेत ही उसमें से साहित्य देखने लग पड़ते हैं। फ़िल्म देखने के बाद जब विचार-विमर्श होता है तब भी हम दरअसल उस फ़िल्म के बारे में बात नहीं करते बल्कि उस फ़िल्म के अन्दरूनी साहित्य की प्रशंसा या निन्दा करते हैं।

इस बात से कोई मुनकिर नहीं कि फ़िल्मों की ज़रूरत एक वाहन जैसी है। फ़िल्में साहित्य के कन्धों पर अपना बोझ डाल कर चलती हैं। फ्रांसिसी फ़िल्मकार गोदार्द को फ़िल्मोंं की इस निर्भरता का एहसास था। उसने इस निर्भरता से फ़िल्मों को आज़ाद करने के लिए साहित्य को मन्फी करके फ़िल्में बनाने का तजुर्बा भी किया। पर वह फ़िल्में थियेटरों में नहीं चल सकीं। आख़िरकार फ़िल्मकारों को साहित्य की ही मदद लेनी पड़ी। पर किसी सृजनात्मक रचना में से केवल साहित्य को ही देखना, उस रचना को सीमित करने वाली बात है।

फ़िल्म को उसके रंगों, रोशनियों, विस्तार और अर्थों को पूरी तरह मानने और समझने के लिए फ़िल्म और टेलिविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, एफ.टी.आई.आई. फ़िल्मकारों, लेखकों, पत्रकारों, रंगकर्मियों और बुद्धिजीवियों के लिए सिनेमा की भाषा सीखने का अवसर प्रदान करता है। पिछले कई सालों से नैशनल फ़िल्म आरकाईवज़ के सहयोग से पुणे का एफ.टी.आई.आई. पांच हफ़्तों का फ़िल्म ऐपरिसिएशन का यह कोर्स चला रहा है।

फ़िल्म इंस्टीट्यूट के खुशगवार माहौल में आप फ़िल्म निर्माण के हर पक्ष की जानकारी हासिल करते हो। फ़िल्मों की भाषा की जानकारी के लिए महारथियों के भाषण सुनते हो। लगभग 40 फ़िल्में देखते हो। छोटे-बड़े थियेटर इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा होते हैं। ये फ़िल्में वो फ़िल्में हैं जो कहीं और नहीं देखी जा सकतीं। ऐसी फ़िल्मों की हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

आरकाईवज़ की फ़िल्मों के अलावा साल की महत्वपूर्ण फ़िल्में भी दिखाई जाती हैं। फ़िल्म की स्क्रीनिंग के बाद फ़िल्म का निर्देशक दर्शकों के सामने होता है और फ़िल्म से संबंधित हर तरह के सवालों के जवाब देता है। कोर्स का यह भाग अपने आप में एक अदभुत तजुर्बा होता है।

प्रो. सतीश कुमार ने फ़िल्म इंस्टीट्यूट के स्टुडियो, कैमरा, लेबोरेटरी, ऑडियो मशीन और करोड़ों के उस सामान के बारे में जानकारी देते हुए शिकवा किया, ‘यह कोर्स क्रिये‍टिव लोगों को और भी अमीर करता है परन्तु पंजाब से कोई भी यह कोर्स करने पता नहीं क्यों नहीं आता।

मैंने उनका नाम याद करने की कोशिश की जिन्होंने यह कोर्स किया था। डॉ. आत्मजीत, कवियित्री गगन गिल्ल, आलोचक गुरबचन, डॉ. बी. एस. रत्न और….। मेरी सूची ख़त्म हो गई उसने फिर कहा, ‘कम से कम हमारे लेखकों और पत्रकारों को तो फ़िल्म देखने का ढंग सीख लेना चाहिए।’

मैं 1983 से फ़िल्म इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे से जुड़ा हुआ हूं। इस नज़दीकी का कारण दोस्ती भी है, भावुकता भी और अच्छी फ़िल्मों के प्रति दीवानगी भी।

मैं जब भी पुणे गया हूं या तो उस समय फ़िल्म इंस्टीट्यूट में हड़ताल होने वाली होती थी या हड़ताल चल रही होती थी या फिर हड़ताल अभी ख़त्म ही हुई होती थी। फ़िल्म इंस्टीट्यूट की सड़कें तथा दीवारों पर मुझे हड़ताल का शब्द हमेशा पक्का खुदा हुआ प्रतीत हुआ है।

वहां हड़ताल की परंपरा हमेशा तो नहीं थी। 1967 से फ़िल्म इंस्टीट्यूट के एक्टिंग के कोर्स की धाक फैल गई थी। एक्टिंग के छात्र शत्रुघ्न सिन्हा और नवीन निश्चल क्रमवार खलनायक और नायक स्थापित हो गए थे। जया भादुड़ी (बच्चन) ने सिनेमा दर्शकों के दिलों को मोह लिया था। इन तीनों की सफलता ने एफ. टी. आई. के छात्रों को सपने भी दिए थे और उनके अंदर अहम् भी जगाया था। वह इंस्टीट्यूट के छात्रों द्वारा बनाई जाने वाली फ़िल्मों में काम करते समय मुंबई के फ़िल्म स्टार की तरह ही नख़रे करते थे। एक्टिंग के छात्र दूसरे छात्रों को नीची निगाह से देखने लग पड़े थे। दोनों पार्टियों में गहरी खाई बन गई थी। डिप्लोमा फ़िल्म के निर्माण के समय एक्टिंग के छात्र, निर्देशक और तकनीकी छात्रों के लिए तरह-तरह की मुश्किलें पैदा करते थे। उन्होंने भी तंग आकर अपनी फ़िल्मों के लिए कलाकार बाहर से लेने शुरू कर दिए। इस बात का एक्टिंग के छात्रों ने विरोध किया। इस विरोध के विकराल रूप धारण करने से फ़िल्म इंस्टीट्यूट की पहली हड़ताल हुई।

पहली हड़ताल के बाद छोटी-छोटी बातें भी हड़ताल का कारण बनती रहीं। इन रोज़ की हड़तालों के कारण ही उस समय के प्रिंसीपल जगत मुरारी को भी अपनी पदवी से हाथ धोना पड़ा।

जब अभिनेता, निर्देशक, रंगकर्मी और नाटककार गिरीश कर्नाड इंस्टीट्यूट का प्रिंसीपल बना तो पतन का एक नया कांड शुरू हुआ। वह शाम को छात्रों के होस्टल चला जाता था और उनके साथ बैठ कर शराब पीता था। वह तीन साल प्रिंसीपल रहा और इस समय में अनुशासन की धज्जियां उड़ती रहीं।

गिरीश कर्नाड ने सभी नियम एक छिक्के पर टांग कर एक फ़ैसला यह लिया कि सभी छात्र सभी विषय ही पढ़ें, अर्थात् फ़िल्म निर्देशन के छात्र सिनेमेटोग्राफ़ी भी सीखें, अभिनय भी, ऑडियोग्राफ़ी भी और सम्पादन भी। पहले दो साल वह यही सीखें, सिर्फ़ तीसरे साल निर्देशन सीखें। जब छात्रों को बाकी विषय ज़बरदस्ती पढ़ने पड़े तो वह उकता गये। अभिनय सीखने वालों के लिए तो यह और अधिक कठिन काम था।

छात्रों के लिए फिर रास्ता हड़ताल का ही था। एफ. टी. आई. की रोज़ की हड़तालों का बड़ा नुक़सान यह हुआ कि 1974 में एक्टिंग का कोर्स ही ख़त्म कर देना पड़ा। गिरीश कर्नाड के जाने के बाद प्रिंसीपल आते रहे, जाते रहे। हड़तालें भी होती रहीं परन्तु हड़तालों का मुख्य मुद्दा सिलेबस हो गया। अब जब भी हड़ताल होती है छात्र सिलेबस में कुछ नया शामिल करवाना चाहते हैं या पुराना निकालना चाहते हैं, कुछ और छोटे-छोटे मुद्दे भी साथ जुड़े होते हैं।
छात्र अपनी मांगें आम तौर पर मुख्य दरवाज़े की बुर्जियों पर लिख देते हैं, सड़क पर लिख देते हैं परन्तु दीवारों पर अकसर हड़ताल साहित्य की इबारत ही दिखाई देती है। नई हड़ताल के समय छात्र पुराने हड़ताल साहित्य को दोहराते नहीं। हर बार नया हड़ताल साहित्य दृष्टिगोचर होता है।

जब जुलाई 1998 में मैं पुणे गया तो हड़ताल ख़त्म हो चुकी थी पर दीवारों पर अभी कूची नहीं मारी थी। छात्रों ने पता नहीं कहां-कहां से कथन ढूंढ कर दीवारों पर लिखे हुए थे।

जब दीवारों पर कूची मार दी जाएगी तो ये सभी कथन गुम हो जाएंगे। इस लिए 1998 के हड़ताल-साहित्य के कुछ अंश आपकी जानकारी के लिए पेश कर रहा हू्ं :-

*जो अधिक जानता है, वो ही अधिक सिखा सकता है। (बाच)

*आन्दोलन से दूर सिनेमा का कोई अस्तित्त्व नहीं है। (आईनस्टाईन)

*ज़िंदगी की लड़ाई में सिर्फ़ कला ही एक महंगा और विवेकपूर्ण हथियार है।

*शोहरत के बारे में चिन्ता करना रसोइए और खानसामियों का काम है। (चैपलीन)

*कैमरे ने यथार्थ का रूपांतरण किया है और यथार्थ ने मेरा। मनुष्यों में से एक मनुष्य के तौर पर इसने मुझे विकसित किया है। मुझे पक्का यक़ीन है कि यदि मुझ में कोई गुण है तो वह यह है कि मैंने आंखों का प्रयोग किस प्रकार करना है। इन आंखों ने ही कैमरे को निर्देश देना है, सिर्फ़ रंगों, रोशनियों और परछाइयों को ही पकड़ने में नहीं बल्कि ज़िंदगी की धड़कन को पकड़ने में भी। चलचित्र के लिए हम जो कुछ कर सकते हैं इसका कोई अंत नहीं। यह मनुष्य की कल्पना की ही कार्यशीलता है।

यह कुछ कथन बस उदाहरण के तौर पर हैं। पूरे कथनों के लिए सफ़हों का विस्तार चाहिए।

इस बार हड़ताल ख़त्म होने पर ऑडियोग्राफ़ी विभाग का मुखी प्रो. सतीश कुमार बहुत व्यस्त था। हड़ताल ख़त्म होने के कारण वह फ़िल्म इंस्टीट्यूट के कोर्सों का नया सिलेबस लिख रहा था। प्रो. सतीश कुमार के नया सिलेबस लिखे जाने से यह सम्भावना ज्यों की त्यों बरकरार थी कि अगली बार बिलकुल नया और अलग हड़ताल-साहित्य पढ़ने को मिलेगा।

जब मैं फ़िल्म इंस्टीट्यूट से वापिस आ रहा था तो उस समय विज़डम ट्री के नीचे का चबूतरा सुनसान था। वे सभी जो कभी बोध वृक्ष के नीचे मेरे साथ बैठते थे, अब नहीं थे। वे फ़िल्म इंस्टीट्यूट के अतीत में गुम हो गए थे। कुछ वर्षों बाद वहां मेरी पहचान का कोई भी चेहरा नहीं होगा।

फ़िल्म इंस्टीट्यूट के उस अजनबी दिन और बेदर्द शाम के तस्व्वुर भर से मेरा मन उदास हो गया।
मैं क्षण भर के लिए बोध वृक्ष के पास खड़ा हो गया, जैसे उस वृक्ष के नीचे ठहरे हुए पलों को अलविदा कह रहा होऊं।
हवा के एक झोंके से उसके पत्तों ने खड़-खड़ की। उस खड़-खड़ में हमेशा की तरह ही स्वागतम् था। उसके इंतज़ार में दोस्ती के अनगिनत चेहरे थे, जो नए थे। शायद फ़िल्म इंस्टीट्यूट का मेरा यह आख़िरी चक्कर ही हो,…… क्या पता।….कौन जाने।

यह ज़िंदगी की निरंतरता थी।….और मैं उस निरंतरता के साथ जुड़ा हुआ था।

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