अंतिम सांझ का दर्द

सुमित्रा को मरे आज पांच दिन हो चुके थे लेकिन अमित और सुमित अभी घर नहीं पहुंचे थे। खेत की मेड़ पर बैठा बसंतु बार-बार यही सोचकर दुःखी हो जाता कि सुमित्रा के बग़ैर वह आगे की ज़िंदगी अब कैसे काटेगा। सुमित्रा थी तो कम-से-कम किसी अपने के होने की तसल्ली तो रहती थी। वरना दो बेटों के होते हुए भी वह बेसहारा ही था। उसके मन में बार-बार यही प्रश्न कौंध रहे थे। यदि बुढ़ापा इसी दर्द का नाम है तो यह क्योंआता है? बच्चे इस उम्र में अपने मां-बाप से दूरियां क्यों बना लेते हैं? क्यों उन्हें कष्ट भोगने के लिए अकेला छोड़ देते हैं? जबकि इसके विपरीत मां-बाप यदि स्वप्न में भी अपने बच्चे को तकलीफ़ में देखते हैं तो वे तिलमिला उठते हैं। परंतु इतने कष्ट मां-बाप को देने पर भी बच्चों में रत्तीभर भी तिलमिलाहट का एहसास नहीं पनपता। बड़े होकर अपने ही बच्चे इतने सवार्थी और पत्थर दिल कैसे हो जाते हैं?

बसंतु की आंखें लाल थीं। दुःखों की मार ने बसंतु की आंखों के पानी को पहले ही वसूल लिया था। ऐसा प्रतीत होता था मानो इनसे अभी लहू की बूंदें टपकने लग पड़ेंगी। सुमित्रा ने तो कभी उन्हें ज़रा से भी दुःख तकलीफ़ का एहसास तक न होने दिया था। फिर वे उसकी अंतिम यात्रा में क्यों नहीं आए? जिनकी ग़लती के लिए सुमित्रा लोगों के सामने शर्मिंदा होती रही। उनकी ज़रा-सी तकलीफ़ के लिए आस-पास के वैद्य-हकीमों को इकट्ठा कर लेती। उनकी इच्छा को ज़ुबान पर आने से पहले ही पूरा कर देती। दोनों के लिए कभी उसकी ममता में ज़रा भी कमी न आई। वही लड़के उसके बीमार होने पर तो क्या अंतिम विदाई पर भी उन्हें समय की कमी खली।

अमित ने तो टेलीफ़ोन पर बीमार मां के पास न पहुंचने की अपनी मजबूरी पहले ही बयान कर रखी थी। उसे बीमार मां से ज़्यादा इस वक़्त कम्पनी के फ़ायदे के लिए विदेश यात्रा सही लग रही थी। रही बात छोटे लड़के सुमित की उसने भी चिट्ठी में साफ़ लिख रखा था, ‘पिता जी, मेरे पास इस वक़्त छुट्टियां बिल्कुल भी नहीं हैं, जो थोड़ी बहुत शेष हैं उन्हें मैं दो महीने बाद बनने वाले अपने नए मकान के लिए ख़र्च करूंगा। मैं नहीं आ पाऊंगा। मां की देखभाल के लिए किसी नौकरानी को रख दो।’

बसंतु के पास रुपयों की बिल्कुल भी कमी न थी। वह चाहता तो कई नौकर रख सकता था लेकिन इस वक़्त उसे किसी पराए से ज़्यादा अपने की ज़रूरत थी। दिन प्रतिदिन बिगड़ती सुमित्रा की हालत उसे परेशान किए जा रही थी। दिल में हर क्षण एक अनजाना-सा डर अंगड़ाई लेता रहता था। बसंतु की सुबह-शाम सुमित्रा के पलंग के पास ही बीतती। लड़कों के आने की झूठी तसल्लियां दे दे कर वह थक चुका था। बसंतु के ग़म को कोई बांट सके ऐसा कोई अपना इस घड़ी उसके पास नहीं था।

सुमित्रा अंतिम सांस तक अपने बच्चों, बहुओं और पोते-पोतियों की एक झलक पाने के लिए तरसती रही। वह हर दिन निकलने वाले सूर्य के साथ दरवाज़े पर टकटकी लगाए एक आशा भरी निगाह लिए अपने बेटों का इंतज़ार करती। उसे हर आने वाले कल पर भरोसा था। लेकिन हर सांझ को उसका भरोसा दम तोड़ देता। हर बीतता दिन अब उसे भी अपने बच्चों की फ़ितरत का एहसास करवाने लग पड़ा था। उसकी आंखें बच्चों और उनके परिवार के दीदार की अधूरी हसरत लिए सदा के लिए बंद हो गईं।

सुमित्रा की मौत ने तो जैसे बसंतु की जान ही निकाल ली थी। यही तो एक सहारा थी बसंतु के सुख-दुःख का। अब तो वह भी छिन चुका था। दोनों अपने ग़मों को बांट कर छोटी-छोटी खुशियां तलाशते रहते थे। बसंतु जब सुमित्रा से कहता कि “वे दोनों कितने अभागे हैं जो उन्हें अपने बेटों, बहुओं और पोते-पोतियों का सुख नसीब नहीं हुआ। पोते-पोतियों को अपनी गोद में खिलाने, उन्हें प्यारी-प्यारी कहानियां सुनाने के अरमान ही रह गए।” तो सुमित्रा बसंतु को भावनात्मक सहारा देते हुए कहती, ‘तुम भी न अम्मू-सम्मू के बापू। बेकार की बातें अपने दिमाग़ में लाते रहते हो। लड़कों की अपनी ज़िंदगी है। वे अपने पैरों पर खड़े हैं और खुश हैं। इससे ज़्यादा हमें और क्या चाहिए। हमें उनकी खुशियों में ही अपनी खुशियों को तलाशना चाहिए। वे कार्य में व्यस्त रहते होंगे। ज़बरदस्ती गांव बुलाकर क्यों हम उनकी तरक्क़ी में बाधा डालें।’

‘लेकिन फिर भी सुमित्रा, अपने मां-बाप के प्रति बच्चों का कुछ तो फ़र्ज बनता है न।’

‘जिसके भाग्य में जितना लिखा है वह उसे मिल कर ही रहता है, अम्मू-सम्मू के बापू। शायद हमारे भाग्य में अपने बच्चों का सुख इतना ही था। हम बेकार में ही उनके आने की उम्मीद पाले रहते हैं। उनकी दुनियां में अब उनके अपने बीवी-बच्चे और शहर के उच्च शिक्षा प्राप्त सभ्य लोग हैं। उनकी दुनियां में हमारा कोई स्थान नहीं।’

ऐसे ही एक-दूसरे को तसल्लियां देकर दोनों एक-दूसरे के ग़मों को बांटने का प्रयास करते। ऐसी परिस्थति में एक-दूसरे से लिपट कर रोने के सिवाए बसंतु और सुमित्रा के पास कोई चारा नहीं रह जाता था।

घर का हर कामकाज संभालने वाली सुमित्रा को कम दिखाई देने के कारण बसंतु ने घर में एक नौकर रख लिया था। नौकर रख लेने से उन्हें इस बात की तसल्ली रहती थी कि चलो कोई तो इस अवस्था में उनके साथ है जो मुसीबत में उन्हें संभाल सकेगा।

जब पिछले वर्ष अमित और सुमित गांव आए थे तो बसंतु और सुमित्रा ने उनके साथ चलने का ज़िक्र किया था। अमित ने बात को टालते हुए कह दिया था कि ‘पिता जी, यहां की ढेर सारी ज़मीन तो ख़राब हो ही जाएगी और जो अनाज ये लोग आधा अपने-अपने घर ढोएंगे वो अलग। इसलिए आपका यहां रहना ज़रूरी है।’

सुमित ने बड़े भाई की हां में हां मिलाते हुए कहा था, “अमित ठीक कह रहा है पिता जी। इस बुढ़ापे में शहर का प्रदूषण भरा वातावरण आपकी सेहत के लिए वैसे भी अच्छा नहीं है। गांव का स्वच्छ और प्रदूषण रहित वातावरण ही आप दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर रहेगा।”

बसंतु ने उसी दिन ही दोनों लड़कों के मन को टटोल लिया था। उसे मन ही मन एहसास हो रहा था कि दोनों लड़कों के सहारे की उम्मीद रखना बेकार है। ऐसी स्थिति में उसे सुमित्रा का सहारा ही बहुत था लेकिन अब तो वह भी उससे छिन चुका था।

अपने गाल को हथेली पर टिकाए मेड़ पर बैठे उदास बसंतु को अतीत में झांकना किसी पैने दर्द की अनुभूति करा रहा था। आंखों से टपकते खारे पानी ने हथेली और गाल में चिपचिपाहट पैदा कर दी थी। दोनों लड़कों को पांच दिन पहले ही सुमित्रा की मृत्यु की ख़बर भिजवाई जा चुकी थी लेकिन अभी तक दोनों का कोई अता-पता नहीं था। इस दुःख की घड़ी में बसंतु का कोई भी अपना साथ न था। इस पांच दिन के अंतराल में बसंतु ने एक-एक पल किस तरह से काटा, यह बसंतु की हालत साफ़ बयान कर रही थी।

बसंतु ने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई तो उसकी नज़र दोनों गांवों के बीच बहने वाली नदी के नवनिर्मित पुल से फिसलती हुई दूसरे गांव में स्थित उस जर्जर खंडहर लकड़ी के मकान से जा टकराई जो तिमंज़िला सीमेंट की भव्य कोठी के समीप खड़ा जैसे स्वयं को उपेक्षित-सा महसूस कर रहा था। यही वह मकान था जहां सुमित्रा का बचपन बीता। इसी बूढ़े मकान में पहली बार सुमित्रा और बसंतु की मुलाक़ात हुई थी। बसंतु को अपने इस अतीत में झांकना सुखद एहसास की अनुभूति करा रहा था। कितनी रौनक थी तब इस मकान में। सुमित्रा की बड़ी अम्मा और बहू की मीठी नोंक-झोंक, दादा की डांट, छोटे भईया और सुमित्रा की बुआ की शरारतों तथा हंसी के ठहाकों से घर हमेशा गूंजता रहता था। घर के छोटे-बड़ों के साथ मिल बैठ कर खाने का मज़ा ही कुछ और होता था। इसका एहसास बसंतु तब करता जब किसी रोज़ वह अपने परिवार के साथ दावत पर सुमित्रा के घर जाता। बसंतु का परिवार छोटा-सा था। मां-बाप और बसंतु को मिलाकर परिवार में कुल तीन सदस्य थे। सुमित्रा और बसंतु के घर वालों की खूब बनती। बसंतु और सुमित्रा साथ-साथ स्कूल में पांच तक पढ़े। दोनों ही परिवारों ने बसंतु और सुमित्रा के विवाह को बचपन में ही हरी झंडी दिखा दी थी।

गांव के बीच से होकर जाने वाली सड़क पर शाम की बस की चिलचिलाती ज़ोर की ब्रेक ने बसंतु के ख़्यालों को विराम लगा दिया था। एक आशा भरी निगाह से बसंतु ने बस की ओर देखा लेकिन लड़के इस बस में भी न आए थे। बसंतु की हिलोरे खाती गर्दन जब वापिस मुड़ी तो बसंतु के चेहरे पर पहले से ज़्यादा चिंता की रेखाएं और निराशा के भाव उफान मार रहे थे। ग़म के अथाह सागर में घिरे बसंतु ने एक नज़र आसमान पर दौड़ाई तो सूर्य क्षितिज की खाई में आधा समा चुका था। उसके विश्वास का एक ओर पहलू आज दम तोड़ चुका था। बसंतु ने कांपते हाथों से मेड़़ पर एक ओर रखी अपनी छड़ी को उठाया और धीरे-धीरे खड़ा हो गया। घर की ओर बढ़ते बसंतु के क़दम कुछ दूरी पर जाकर ठिठक गए। उसकी हिलोरे खाती गर्दन ने एक बार फिर सड़क का मुआयना किया लेकिन दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा था, अंधेरा हो चला था। बसंतु की कांपती टांगे धीरे-धीरे फिर से घर की राह तकने लग पड़ी थीं।

अमित और सुमित गांव पहुंचे तो गांव में चारों तरफ़ खामोशी छाई थी। खेतों पर भी कहीं बैल नज़र नहीं आ रहे थे। आज चौपाल भी ख़ाली था। उन औरतों के झुंड भी ग़ायब थे जो सदा किसी पेड़ के नीचे बैठे या फिर बीच रास्ते में या चौराहे पर खड़े एक-दूसरे की चुगली में मशगूल रहते थे। चंदू की चाय पकौड़े की दुकान पर भी आज मक्खियां भिन-भिना रहीं थीं। जहां हमेशा लोगों की चहल-पहल रहती थी, सुनसान थी। कहीं-कहीं छोटे-छोटे बच्चे खेलते नज़र आ रहे थे। पूरा दृष्य उस फ़िल्म के सीन की याद को ताज़ा कर देता था। जब डाकुओं के आने पर सारे लोग डर के मारे अपने-अपने घरों में दुबक जाया करते थे।

जैसे ही दोनों घर पहुंचे तो घर के आंगन में मौजूद लोगों की भीड़ को देखा वे आगे पहुंचे तो उन्होंने देखा सफ़ेद कफ़न में ढकी बसंतु की लाश को अंतिम यात्रा के लिए तैयार किया जा रहा था। दोनों लड़कों को देखते ही गांव वालों के बीच खुसर-फुसर शुरू हो गई। इससे पहले कि अमित और सुमित कुछ कहते-पूछते घर का नौकर उन्हें एक चिट्ठी पकड़ाते हुए बोला, ‘अवश्य पढ़ लें।’ चिट्ठी हाथ में थमाते हुए नौकर ने एक अजीब-सी घूरती निगाह दोनों पर डाली। अमित और सुमित एक अजीब-सी कशमकश में थे। सभी गांव वालों की घूरती और क्रोधित नज़रों का सामना कर पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था। अमित के आंख के इशारे पर सुमित भी उसके पीछे-पीछे घर के एक कोने में पहुंच गया। चिट्ठी में लिखी बातें जानने के इरादे से अमित ने चिट्ठी को खोला। बसंतु ने टूटे-फूटे शब्दों में लिखा था।

मेरे प्यारे बच्चो सदा खुश रहना।

शायद जब तक तुम घर पहुंचो, मैं न रहूं। सुमित्रा के जाने के बाद वैसे भी इस शरीर में और जीने की ताक़त नहीं बची है। एक वही तो अपनी थी मेरी जो ताउम्र हर सुख-दुःख में मेरी बराबर की हिस्सेदार रही। तुम दोनों तो अपने होते हुए भी पराए हो गए। न जाने क्यों? आज तक इस बात को समझ नहीं पाया हूं। सुमित्रा तुम्हारी एक झलक पाने की आस लिए अंतिम सांस तक दरवाज़े पर टकटकी लगाए तुम्हारा इंतज़ार करती रही। लेकिन तुम न आए। शायद उस वक़्त तुम्हारा स्वार्थ तुम्हें पुकार रहा था। तुम्हारे लिए मां से ज़्यादा ज़रूरी अन्य काम थे। अपनी बीमार मां का हाल-चाल पूछना तो दूर उसके अंतिम संस्कार के लिए भी तुम्हारे पास समय का अभाव रहा। तुमने हमें दादा-दादी का औपचारिक दर्जा तो दे दिया लेकिन कभी पोते-पोतियों को गोद में खिलाने, उनकी खिलखिलाहट, अठखेलियों में शामिल होने का मौक़ा न दे सके। सुमित्रा के बाद मुझ अकेले को तुम्हारे सहारे की आस बाक़ी थी। कई बार संदेश भिजवाए लेकिन तुम फिर भी न आए। इसे मैं भाग्य की विडम्बना कहूं या उच्च शिक्षा का प्रभाव। आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी को दोष दूं या अपने दिए संस्कारों पर शक करूं। मैं नहीं जानता। शायद तुम हम दोनों के चेहरे झुर्रियों से ढके होने के कारण उनमें उभरे दुःखों के भावों को ठीक ढंग से पढ़ नहीं पाए होंगे।

पत्र को पढ़ते-पढ़ते बीच-बीच में अमित को रुकना पड़ रहा था। बसंतु की आंखों से झरे आंसुओं ने कुछ शब्दों को फीका कर दिया था। अमित ने चिट्ठी को आगे पढ़ना शुरू किया। बच्चो, मैं एक बात समझा देना ज़रूरी समझता हूं। मैंने सारी ज़मीन और यह मकान वृद्धाश्रम को दान कर दिया है, हो सके तो मुझे माफ़ करना। वर्तमान की आबो-हवा को देखकर मुझे लगा कि मेरे जैसे कई लोग तुम जैसी संतान के कारण नारकीय जीवन जी रहे होंगे। कम-से-कम उन्हें और कष्टों से न गुज़रना पड़े इसलिए यह क़दम उठाने पर मजबूर हुआ। इस कार्य से आज मेरे दिल को पूर्ण शांति और संतुष्टि की अनुभूति हो रही है। इसके साथ ही साथ मैं वह क़दम भी उठा रहा हूं जिसे शायद ही कोई बाप उठाना चाहेगा। मैं सामाजिक परंपरा को दरकिनार कर तुमसे मुखाग्नि का हक़ छीन रहा हूं। वह इसलिए क्योंकि तुम तो मुझे कब का दुःख और अकेलेपन की आग में जला चुके हो। बस, शरीर को जलाने की सामाजिक औपचारिकता से तुम्हें वंचित कर रहा हूं। आशा है तुम मेरी इस अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए इसे अमल में लाओगे।

मैंने अपने जीवन की सांझ को बहुत कष्टों में गुज़ारा है। आप दोनों को कभी यह मौक़ा न आए। ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं और अपने लिए भी ईश्वर से यह दुआ मांगता हूं कि अगले जन्म में मुझे कोई औलाद न दे। इसी जन्म में ही औलाद के सुख से मेरा जी भर गया है। मेरे बच्चो, मेरी बातों का बुरा मत मानना। शायद हो सकता है कि तुम्हारा बाप अकेलेपन और दुःखों की मार से कड़वाहट से भर गया हो। मुझे माफ़ करना।

तुम्हारा अभागा बाप

बसंतु

चिट्ठी को पढ़ कर अमित और सुमित के चेहरे पर अजीबो-गरीब भाव तैर रहे थे। ग़ुस्से से चिट्ठी के टुकड़े-टुकड़े कर के अमित और सुमित ज़ोर-ज़ोर से रो पड़े।

आंगन ख़ाली था। एक-एक करके सभी लोग बसंतु की अंतिम यात्रा में शामिल हो चुके थे।

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