इन्तज़ार

                                 

-मनप्रीत कौर भाटिया

बस तेज़ चाल से सड़क पर जा रही थी। मगर अर्चना को लग रहा था कि बस धीरे और, और धीरे हुए जा रही है। उसका आज आख़िरी पेपर भी अच्छा नहीं हुआ था। मगर राकेश को निश्चित जगह पर मिलने की खुशी में वह बावरी हुई जा रही थी। आज से वह हमेशा के लिऐ राकेश की होने जा रही थी, अपना प्यार पाने के लिए घर जो छोड़ आई थी वो, क्योंकि उसके घर वाले शायद उन्हें कभी भी एक न होने देते।

तभी अचानक बस रुक गई। पता लगा कि कोई दुर्घटना हो गई है। अर्चना ने खिड़की से देखा। एक औरत बुरी तरह से ज़ख़मी हुई पड़ी थी और अपने जवान बेटे की लाश से चिपकी ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी। इस दृश्य ने अर्चना के मस्तिष्क में हलचल मचा दी।

उसके दोनों बड़े भाई भी तो एक दिन ऐसे ही एक सड़क हादसे में गुज़र गये थे। “हाय! कितना दर्द बर्दाश्त किया था हमने तब…मगर…मगर…क्या अब मेरे माँ-बाप यह सहन कर लेंगे कि मैं…। नहीं…नहीं…कभी नहीं…अब तो मैं ही उनकी जान हूँ। वो तो मर ही जायेंगे अकेले। वो सदमा तो उन्होंने भगवान की मर्ज़ी समझ कर सहन कर लिया। मगर यह सदमा…मेरी वजह से बदनामी…..क्या वह….? अर्चना घबराई…नहीं….नहीं…यह मैं क्या करने जा रही हूँ। जवानी के जोश में मैं तो यह भूल ही गई कि मुझे भगवान जैसे चाहने वाले मेरे माँ-बाप भी है।”

वह बिना कुछ और सोचे जल्दी से बस से उतरकर होस्टल की तरफ़ चल दी और सामान लेकर जैसे ही शाम को घर पहुँची। उसके इंतज़ार में आँखें बिछाए बैठी उसकी माँ उसको सीने से लगाकर बच्चों की तरह चूमने लगी।

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