उत्तर आधुनिकता हई! शावा!!

-बिपन गोयल

संगरदास घुमक्कड़ हैं। घुमक्कड़ प्रवृत्ति वैसे इन्हें पसंद नहीं है, पर करें क्या? बाबा फ़रीद की भीग कर भारी हुई कंबली की तरह यह प्रवृत्ति भी इन्हें चिपक गई है। संगरदास इन्हें छोड़ना तो नहीं चाहते हैं पर मजबूर हैं क्योंकि यही घुमक्कड़ी प्रवृत्ति नशेड़ी की अफ़ीम की तरह इनकी रोज़ी रोटी बन चुकी है। यदि इस तरह न घूमें तो दैनिक अख़बारों के साप्ताहिक कालमों का पेट कैसे भरे? अख़बारों की पेट-पूजा करने के लिए ही इन्हें आवारा सुअर की भांति इधर-उधर मुंह मारना पड़ता है। इस तरह गली मुहल्लों में मुंह मारने के बाद ही एक आर्टिकल के चार सौ रुपए मिलते हैं। यही उनकी मजबूरी है, आख़िर सात बच्चों का पेट जो भरना है। संगरदास का दृढ़ विश्वास है, ‘कालम-नवीस, एक राजनीतिक नेता की तरह किसी का मित्र नहीं होता।’ बात भी ठीक है यदि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? कालम नवीस को तो इधर की उधर उड़ानी ही होती है फिर वह चिऊंटी अपने तो काट नहीं सकता। वह कोई कुत्ता थोड़े है, जो अपनी गर्दन घुमाकर, लंबी जीभ के साथ अपनी पूंछ के पास भी खुजली कर लेगा। उसकी नज़र में दोस्ती की गहराई में दुश्मनी छिपी होती है। इसी दोस्ती और दुश्मनी की पतली तारों से ही, वह कालम की रचना करके अख़बारों को परोसता है। इस तरह वह कालम-नवीस के साथ-साथ पत्रकार का पद भी हथिया लेता है।

संगरदास को किसी भी प्रकार के समागम का पता लगना चाहिए। बस, वे वहां पहुंचे बिना रह नहीं सकते। इन्हें साहित्यिक समागमों से सामाजिक अधिक पसंद है क्योंकि सामाजिक समागमों में इनकी पूछ अधिक होती है। मुफ़्त की शराब के अलावा जेब ख़र्च के लिए पैसे भी मिल जाते हैं। इसलिए अक्सर कहते है, ‘साहित्यिक समागमों में काले रंग की कड़वी ‘नाइजीरियन’ चाय के अलावा मिलता ही क्या है? बेचारे भूखे लेखक अपना ही पेट भर लें, बहुत है… बाक़ियों का पेट क्या भरेंगे?’

परन्तु पिछले कुछ समय से इनकी विचारधारा बदल गई है। पता नहीं क्यों और कैसे? पहले वाले संगरदास अब कहते हैं, ‘आज का लेखक अमीर है, अपनी खोटी नीयत के कारण ही खुद को ग़रीब दिखाता है। दो कनाल की कोठी का मालिक होने के बाद भी तथाकथित पांच हज़ारी इनामों के पीछे भागता फिरता है… बेचारा लेखक…।’

दयाल सिंह दुखी, संगरदास को आड़े हाथों लेते हुए कहता है, ‘संगरदास अपनी भूख की तृप्ति के लिए ही दूसरों पर दोषारोपण करता है, चोरों को सारे नज़र आते हैं चोर…।’

ऐसी कटु आलोचना के कारण जब विरोधी पार्टियों की भांति कीचड़ उछाली की जाती है, तब दुश्मनी की तारें, मोटी रस्सी बनकर एक दूसरे को लपेटना शुरू कर देती हैं। इसी रस्साकशी से साहित्यिक त्रासदी शुरू हो जाती है। क़ामयाब त्रासदी लिखने के लिए, इनके लिए यह एक रिहर्सल की तरह होता है। डॉ. पिपलेत्तर सिंह ने हिसाब लगाया, ‘कुल अठारह हज़ार ख़र्च हो चुके हैं।’ दोस्तों की बधाइयों के फ़ोन लगातार आ रहे हैं, जिसका फ़ोन नहीं आया, उसे वे स्वयं फ़ोन करके पूछ रहे थे।

संगरदास के टेलीफ़ोन की घंटी बजी। कालम-नवीसी के चक्कर से मुक्त होकर उन्होंने रिसीवर उठाया- ‘हैलो…?’

‘हां… मैं डॉ. पिपलेत्तर सिंह…।’

‘नमस्कार सर…।’

‘क्या बात थी? कल आप जल्दी चले गए थे…।’

‘नहीं जी… मैंने पूरा फ़ंक्शन अटेंड किया था जी…।’

डॉ. पिपलेत्तर सिंह के प्रश्न मंत्री की तरह रौबदार थे और संगरदास के उत्तर सेवादार की तरह ‘यस सर’ थे।

‘सर, फ़ंक्शन की सफलता का क्रेडिट तो भाभी जी को जाता है… शी वाज़ सो मैंटली एंड फिज़ीकली इन्वाॅल्व्ड… इक्सेप्शनेबल…

संगरदास ने अंग्रेज़ी में झूठी तारीफ़ की। वे समझते हैं जब साधारण आदमी ने झूठ बोलना होता है, वह बिना शराब पीए अंग्रेज़ी में बातें करना शुरू कर देता है।

डॉ. पिपलेत्तर सिंह एक लेखक के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी हैं। लेखन की लत उन्हें आज से 14-15 वर्ष पहले पड़ी थी। तब वे डिवीजनल मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त थे। स्थानीय लेखक साहित्य सभा के प्रधान ने अपने परिचय का दायरा बढ़ाने के लिए और फ़ालतू के काम निकलवाने के लिए, इनसे मुख्य अतिथि बनने के लिए निवेदन किया था। सभा के प्रधान ने एस. डी. एम. साहिब की तहसील का मालिक होने के नाते, ज़बरदस्त प्रशंसा कर दी।

‘सर, आप बहुत मीठा बोलते हैं… आपकी भाषा में रवानगी है। सर, आप बहुत बढ़िया कविता लिख सकते हैं।… आपके मुंह से शब्द तो झरने की तरह बहते हैं…।’ और भी बहुत कुछ अनाप-शनाप बोलकर मक्खनबाज़ी की। एस. डी. एम. साहब ने उसी दिन एक कविता की रचना कर दी। साहित्य सभा के उस प्रधान को उसी शाम, सरकारी कोठी पर बुलाया गया। प्रधान जी को उनके एक अदद चम्मचे सहित, साहब की कोठी के बाहर तैनात गनमैनों के द्वारा लॉन में बैठे साहब के सामने परोस दिया गया। अंग्रेज़ी की वाहवाही के बाद देसी श्रोता, विदेशी पैग लगा कर अपने घर लौट गए। निकट बैठे चमचे ने कोहनी मारकर कहा भी, ‘क्यों, हिन्दी में ही, अंग्रेज़ी वाली बातें कर रहे हो।’ बस फिर क्या था, एक बार सिलसिला शुरू हुआ तो चल निकला। कुत्ते को हड्डी के स्वाद की तरह डॉ. पिपलेत्तर सिंह कविता पर कविता लिखने लगे। हर समागम में मुख्य अतिथि और सााथ ही कविता पाठ भी। उनकी कविताओं का ऐसा स्वागत हुआ कि उनका नाम बड़े-बड़े कवियों पर भारी पड़ने लगा। अब किसी छोटे-छोटे आलोचक की बिसात नहीं थी कि वह उनके नाम को उखाड़ फेंके। जैसे-जैसे इनका पद ऊंचा होता गया, रचना प्रक्रिया की सृजन-पीड़ा भी अमरबेल की भांति बढ़ती गई। जब वे ज़िले के डिप्टी कमिश्नर बने, साहिब उच्च कोटि के कवि होने के साथ-साथ कहानीकार भी बन गए। जब कमिश्नर बने, साहिब हास्य व्यंग्यकार भी बन गए। तीनों विधाओं में उच्च कोटि के रचनाकार।

‘अख़बारों, कॉपियों किताबों की रद्दी बेच दो… ख़ाली बोतलें-गत्ता, प्लासटिक बेच दो…’ गली में साइकिल पर एक बिहारी भईए की आवाज़ ने संगरदास की तंद्रा को भंग कर दिया। बड़े मूड में बैठे, सुबह से वे अख़बार का एक-एक अक्षर चाट रहे थे। अर्द्धनग्न तसवीरों को तो वे बड़े ध्यान से देखते। इन तसवीरों में उन्हें एक मज़ेदार रस मिल रहा था। ज्यों ही उन्होंने टेढ़ी आंख से देखा कि उनकी पत्नी उनकी तरफ़ देख रही है, वे तुरंत चिल्लाए, ‘कैसा समय आ गया है? देखो, कैसे औरतें कपड़े उतारती जा रही हैं…। शरीर पर रह ही कुछ नहीं गया…।’ ‘वे अपना चश्मा ठीक करते हुए पत्नी की तरफ़ झांके।’

‘जब मैंने देख लिया, तब आप भी बोल पड़े…। आप भी तो कितनी रीझ से देख रहे थे इन्हें…।’ पत्नी के यह शब्द तलवार की तरह तीखे थे। पर वे शांत स्वभाव से बोले, ‘भाग्यवान… एक वह भी वक़्त था जब शरीर का कोई भी अंग नंगा नहीं दिखाई देता था… अब कोई भी ढका हुआ दिखाई नहीं देता…। तुझे तो पता ही है…।’ पत्नी की हां सुने बिना बोलते ही चले गए। ‘फिर औरतें चीखती हैं, भई! हम कोई भोग की वस्तु नहीं हैं…। उनसे पूछो भला यदि वे स्वयं को इस तरह परोसती फिरेंगी, तब आदमी क्या उनकी पूजा करेगा?’

संगरदास पहले तो टेढ़ी आंख से पत्नी की ओर ताक रहे थे पर अब वह उसी तरह टेढ़ी आंख से अर्द्धनग्न तसवीरों की तरफ़ देखने लगे। देखें भी क्यों न? उत्तर आधुनिक हवा में सांस जो ले रहे हैं। यह उत्तर आधुनिकता भी बड़ी कमाल की चीज़ है, नई पीढ़ी को तो यह बहुत रास आई लगती है। अब तो जब कोई बुज़ुर्ग ग़लती से अपने पोते-पोती व दोहते-दोहती को सलाह देता है, तब उनसे डरने के स्थान पर मां-बाप से शिकायत होती है, ‘मम्मा… ग्रैंड पापा इज़ आउट्डेटिड नाउ… प्लीज़ चेंज हिम…।’

‘मम्मी क्या है… नाना जी हमारी बातों में दख़ल क्यों देते हैं?’

और मां भी बच्चों की नाराज़गी से बचने के लिए कह देती है, ‘हां बेटा…, कल इन्हें ताऊ जी के पास भेज देंगे।’

बच्चे भी खुश, मां-बाप भी खुश। उत्तर आधुनिकता के बैनर के नीचे पनप रहा समाज खुद भी खुश। संगरदास को याद है, जब पिपलेत्तर सिंह के आमंत्रण पर उनकी लंबी चौड़ी कोठी में गए थे, (घर तो मामूली आदमी का होता है, अफ़सरों की तो कोठियां होती हैं।) डॉ. साहब ने अपनी किताब के समागम के बारे में विचार-विमर्श करना था।

बैनर आपका, ख़र्चा और चर्चा हमारी।

सभी ड्राइंगरूम में बैठे चाय पी रहे थे। उनकी इकलौती बच्ची (जो इस आई. ए. एस. दम्पत्ति की प्यारी, गोरी चिट्टी, मनमोहिनी बच्ची थी) ने स्कर्ट पहने अपनी मम्मी से तपाक से कह दिया, ‘मम्मी यू आर लुकिंग सेक्सी टूडे…।’

मम्मी ने तत्काल ‘थैंक यू’ कहकर बच्ची का मुंह चूम लिया।

डॉ. साहब ने बड़े गर्व से बताया, ‘शी इज़ इन काॅन्वेंट स्कूल…।’

पल दो पल, संगरदास परेशान हो गए। इस कमेंट पर वे हंसें या रोएं? यह बात उनकी समझ से बाहर हो गई थी। उन्हें कुछ तो कहना ही था, सो कह दिया, ‘रीअली… शी इज़ इन्टेलिजन्ट…।’

संगरदास ने यह भी देखा कि जिस प्लास्टिक की गुड़िया के साथ वह बच्ची खेल रही थी, वह भी अर्द्धनग्न थी। बिल्कुल माॅडर्न पश्चिमी ड्रेस।

संगरदास ने फिर अख़बार उठाई। उसी अभिनेत्री का चित्र देखने लगे। इस चित्र में मॉडल ने ऊपर नीचे दो नाम-मात्र कपड़े ही पहन रखे थे। वही वस्त्र जिन्हें, पहले अच्छे समय में लड़कियां इनको सुखाते समय इनके ऊपर और वस्त्र डाल देती थीं परन्तु अब इन नाममात्र के वस्त्रों को पहनने वाली लड़कियों को शर्म ही नहीं आती। देखने वाले को चाहे आ जाए।

‘दादा जी, छी… छी… आप ऐसी नंगी तसवीरें देखते हैं?’ संगरदास की पोती ने जब दादा को इतने ग़ौर से अख़बार देखते देखा तो पता नहीं किस ओर से वह टपक पड़ी।

‘शर्म नहीं आती दादा जी… छोड़ो इसे…।’ पोती ने अख़बार छीनकर गोद में बैठते हुए कहा। पल-छिन के लिए संगरदास झेंप गए। लगा जैसे किसी सिपाही ने रंगे हाथों मुजरिम पकड़ लिया हो। बच्ची की बात का कोई जवाब उन्हें नहीं सूझ रहा था। उन्होंने पोती को प्यार से चूमा और उठने लगे, ‘बेटे यह लो… हम नहीं पढ़ते…।’ 

‘दादा जी, झूठ… मैं देख रही थी आप टकटकी लगाकर यही पन्ना देख रहे थे… मेरे गंदे दादा जी…।’ उन्हें लगा सचमुच हमारे घर में अभी कुछ शर्म बाक़ी है। देश का भविष्य सुरक्षित है।

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