औरतें ही हैं अव्वल

-मनोहर चमोली ‘मनु’

पुरुष समाज माने या न माने लेकिन समूची दुनियां मान चुकी है औरतें पुरुषों की अपेक्षा अधिकांश क्षेत्रों में अव्वल हैं। सूचना, तकनीक और इस वैज्ञानिक युग में तो औरतों ने यह सोचने पर विवश कर दिया कि ‘आधी दुनियां’ के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

घर-परिवार, दफ़्तर और सामाजिक क्षेत्र में भी औरतों का वर्चस्व किसी से छिपा नहीं है। अपवाद स्वरूप अब कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं रह गया है जहां औरतों की भूमिका को न आंका जा सके।

विश्व भर में महिलाओं की क्षमताओं, कार्य पद्धतियों और कार्यशैलियों पर हुए विविध शोध भी महिलाओं को अव्वल सिद्ध करते हैं। मानव समाज को जन्म देने वाली औरत किस तरह से अव्वल होने का प्रमाण पत्र हासिल कर चुकी है इसे हम शोधों के अनुसार देख सकते हैं।

तनाव सहने की क्षमता औरतों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है। भारी तनाव में भी वे कई कार्य सफलतापूर्वक सम्पादित करती रहती हैं।


कामकाजी वर्ग में भी औरतें आगे हैं। वे अपने कैरियर के प्रति पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा संवेदनशील, सजग और कर्त्तव्यनिष्ठ रहती हैं।

पुरुषों की अपेक्षा औरतें सन्तुष्ट भाव को प्रमुखता देती हैं जबकि अधिकांश पुरुष रुपए को प्राथमिकता पर रखते हैं।

औरतें एक समान कार्य के लिए पुरुषों की अपेक्षा अधिक समय तक काम कर सकती हैं। यही नहीं एक समान कार्य के लिए वे कम वेतन पर भी साकारात्मक परिणाम देती हैं।

कामकाजी महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अपनी कार्य शैली में गुणात्मक सुधार करती हैं। सहयोगियों के सुझावों को सलाह के रूप में वे सहर्ष स्वीकार करती हैं जबकि पुरुष अपने कार्यों में सामान्यतः किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते।

असमंजस की स्थिति और संशय की स्थिति में पुरुष सलाह-मशविरा प्रायः कम ही लेते हैं। परिणामस्वरूप क्षति की संभावनाएं पुरुष वर्ग में अधिक होती हैं।

पुरुषों की अपेक्षा औरतें दिये गये कार्यों को ज़िम्मेदारी से करती हैं। वे अपने कार्य में समर्पित भाव को प्रमुखता देती हैं जबकि सामान्यतः पुरुष मात्र इसे औपचारिक ड्यूटी मानते हैं लेकिन कर्त्तव्य नहीं।

औरतें कामकाजी क्षेत्र में स्वयं को साबित करने के लिए काम में लापरवाही से समझौता नहीं करती, न ही वे हीन-भावना से ग्रसित होती हैं। वे यह भी चिन्ता नहीं करती कि यदि दिया गया कार्य उनकी वजह से सफलतापूर्वक न हो सका तो क्या होगा? परिणामस्वरूप धीरजता से किया गया कार्य अन्ततः सफल ही होता है।

औरतें चौबीस घण्टों को बांट कर चलती हैं, चूंकि कामकाजी महिलाओं को घर का काम भी निपटाना होता है, इसलिए वे एक पल भी व्यर्थ नहीं गंवाती।

घर का ख़र्च वे सहजता से पूरा कर लेती हैं। आकस्मिक ख़र्चों और भविष्य की योजनाओं में होने वाले ख़र्चों का संचय करना औरतें बखूबी जानती हैं।

आप माने न माने औरतों के गुण जन्मजात हैं, उनके समक्ष पहुंचना मर्दों के वश की बात नहीं।

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