क्या यही प्यार है

-आकाश पाठक

विख्यात चित्रकार पिकासो की पेंटिंग ने एक युवती को इतना अधिक प्रभावित किया कि वह आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सकी और पिकासो से प्रेम करने लगी। युवती की मां को पता लगा तो वह भी प्रतिस्पर्धा में शरीक हो गई। कहा जाता था कि पिकासो समलैंगिक था इसलिए मां-बेटी में टकराव की स्थिति नहीं आई, दोनों के संबंध बरक़रार रहे।

ऐसा नहीं है कि पिकासो ही सिर्फ़ चर्चा का विषय रहा हो। चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन और विख्यात सितार वादक रविशंकर पर भी हर उम्र की युवतियां फिदा रहती हैं।

इस सम्मोहन, आकर्षण, प्रेम की वजह क्या है? इस संदर्भ में प्रत्यक्ष रूप से एक या कुछ शब्दों की पर्यायवाची श्रृंखला लिखने या कहने भर से यह बिल्कुल साफ़ नहीं हो पाएगा कि आख़िरकार इन नामी-गिरामी शख़्सियतों के प्रति स्त्रियों के आकर्षण की वजह क्या है? आख़िर क्या ढूंढ़ती है स्त्री पुरुष में?

मिसाल के तौर पर फ़िल्मी नायकों में सलमान खान, सन्नी दयोल की पुष्ट उभरी हुई “मसल्ज़” में औरत सेक्स अपील खोजती है। चलिए यहां इस तथ्य को माना जा सकता है मस्तिष्क पटल पर फ़िल्मी पर्दा बहुत हद तक प्रभावी रहता है पर क्रिकेटरों के साथ भी ऐसे प्रसंग होते रहते हैं। नीना गुप्ता-रिचर्ड्स के अलावा अज़हरुद्दीन-संगीता बिजलानी प्रकरण पुराने हो चुके हैं। यहां यह बात ग़ौर करने लायक़ थी कि दोनों पक्षों का अपना स्तर था और सहमति थी।

फ़िल्म तारिकायें भी प्रेम का खुलकर ढोल पीटकर बख़ान करते देखी जा रही हैं। कुछ युवतियां तो इन चर्चित चेहरों की इतनी दीवानी हो जाती हैं कि फ़ोटो से शादी करना आम बात हो गई है या इनके ख़्यालों में सब्ज़बाग बुनते हुए चर्चित होना शुरू कर देती हैं। हालांकि इस प्रकार की हरकतों से युवतियां अपने कैरियर को दांव पर लगा देती हैं देव आनंद से लेकर शाहरूख ख़ान तक इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त हज़ारों युवतियों के हज़ारों पत्र, ई-मेल में साफ़ झलकता है कि प्रेमपाश की कितनी उम्दा पकड़ है क्योंकि इन पत्रों में विवाह का प्रस्ताव भी होता है।

सम्मोहन और आकर्षण में लिप्त प्रेम आख़िर चाहता क्या है? एक अध्ययन के मुताबिक़ निम्नवर्ग और मध्यम वर्ग की युवतियां इस तरह की गोपनीय चाहत अवश्य रखती हैं। चूंकि समाज का भय आकर्षण को बेड़ियां पहनाये रखता है इसलिए धीरे-धीरे सम्मोहन की धुंध हट जाती है।

मॉडल्ज़ और फ़िल्मी पर्दे की अदाकाराएं या रईस वर्ग जिनमें कि ‘बोल्ड’ शब्द ही संस्कृति का सूचक है की युवतियां ख़ासतौर पर अपने प्रेम का बिंदास रूप में स्वागत करती हैं।

वर्तमान समय की तह बाद में खोलेंगे, यदि प्राचीन काल में प्रवेश करें तो दो नाम उभर कर आते हैं शकुंतला और दुष्यंत। दुष्यंत के प्रति शकुंतला का प्रेम, आकर्षण किन आधारों पर टिका हुआ था यह कहना वाक़ई बहुत मुश्किल है क्योंकि शकुंतला, दुष्यंत को जानती तक नहीं थी। हो सकता है कि यह टेलिपेथी हो या ध्यान या योग की कोई अवस्था। जिसके द्वारा आकर्षण जन्म ले सका, यह विवाद का विष्य नहीं यहां केन्द्र बिन्दु आकर्षण है। जो उस काल में भी विराजमान था।

एक बेहद अटपटी उदाहरण रहे हैं अटल बिहारी बाजपेयी जोकि न तो फ़िल्मी नायकों जैसी कद-काठी के मालिक थे और न ही पं. रविशंकर जैसा हुनर रखते थे। हां, राजनीति में बेहतरीन हस्तक्षेप रखते थे, यह बात जुदा है कि कवि, लेखक जैसे पद की गरिमा को बनाये रखे। यह कहना अधिक प्रभावशाली है कि यह भारत के प्रधानमंत्री थे और चर्चित शख़्सियत और यक़ीनन यही कारण रहा है कि उम्र के इस पड़ाव पर ऐसी युवतियों की लम्बी फेहरिसत थी जो उनसे विवाह की इच्छुक थी।

किन्तु इस तथ्य से भी विमुख नहीं हुआ जा सकता कि वर्तमान समय में आज की युवतियों का आकर्षण व्यवसायिक होता जा रहा है।

एक ख़ास वर्ग से अध्ययन के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला गया कि युवतियों का रुझान ऐसे शख़्सों की ओर शीघ्रता से और आसानी से हो जाता है जो किसी न किसी शख़्सियत के मालिक होते हैं अर्थात जो अन्य व्यक्तियों से अलग होते हैं। ज़ाहिर है ऐसे व्यक्ति ‘जीनियस’ बुद्धिमान के क्रम में आते हैं। इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता है कि यह वजह भी होती है लगाव की, आकर्षण की, प्रेम की।

पर व्यवसायिक युग में, यह सवाल अपनी उसी जगह पर खड़ा है कि आख़िर आकर्षण एवं प्रेम की ज़मीन वर्तमान समय में क्या है? यहां वर्तमान समय पर इसलिए ज़्यादा बल दिया जा रहा है क्योंकि आज की युवती के आकर्षण की ज़मीन चाहे सुन्दरता मानों या वैभव। प्रेम, प्यार की ज़मीन संवेदना होती है जो कि प्रायः कम ही देखने को मिल रही है।

चलिये यहां इस तथ्य को अपवाद के रूप में मान लिया जाये कि आकर्षण होता है। वर्तमान युवतियां भी हक़दार हैं पर इस बात को भी मानना पड़ेगा कि सम्मोहन की एक निश्चित अवधि “एक टाइम पीरियड” होता है। स्पष्ट है सम्मोहन की अवधि समाप्त हो जाने के पश्चात् व्यक्ति जागरूक अवस्था में आ जाता है। इसके साथ ही स्वार्थ या व्यवसाय दिमाग़ पर हावी हो जाता है लिहाज़ा युवतियां आंकलन में जुट जाती हैं।

यह आंकलन या मापदंड दो प्रकार की पृष्ठभूमि पर टिका होता है-

यश कमाने की लोलुपता – बिंदास जीवन शैली का अनुसरण करने वाली युवतियां प्रायः यश की तलबगार रहती हैं। इसलिये यह कोशिश होती है आकर्षण, प्रेम को भुनाने की।

भौतिक सुख की पिपासा – वर्तमान में प्यार, चाहत या आकर्षण भौतिक सुख की ज़मीन पर ही पनपते देखे जा रहे हैं।

अतः ज़ाहिर होता रहा है कि युग-युगान्तर तक अपनी अलग पहचान बनाये रखी प्रेम, प्यार ने चाहे वह सीता जी-राम जी का हो या लैला-मजनूं के क़िस्से हों। पर अब सब कुछ बदल रहा है क्योंकि हर आदमी अर्थ के चश्मे पहने हुआ है।

 

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