दिन बुज़ुगों के मान सम्मान का

-मनजीत कौर

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे मनुष्य के जीने के तौर तरीक़े भी काफ़ी परिवर्तित होते जा रहे है। इन बदलते तौर तरीकों में आधुनिकता के नाम पर समय बुज़ुर्गों के मान-सम्मान को भी पीछे धकेलता ही जा रहा है। ग़ौरतलब है कि 30 सितंबर महीने में बुज़ुर्गों के मान सम्मान का दिन मनाया जाता है। बड़े अफ़सोस की बात है कि बात यहां तक आ पहुंची है। पहले-पहले तो परिवार बड़े समूहों में हुआ करते थे, जिसमें भाई चाहे जितने भी हैं पर चूल्हा एक जलता था। सभी एक जगह अपने रसोई घर में लंबी क़तार में साथ मिल बैठ भोजन किया करते थे। एक-दूसरे के लिए प्रेम-भावना होती थी। घर में छोटों से बड़ों तक को अपने बड़े बुज़ुर्गों द्वारा ही शिक्षा दी जाती थी। धर्म-कर्म का काम भी उन्हीं के हाथों से होता था सभी एक दूसरे के प्रति प्रेम भावना रखते थे। सच तो यह है कि समाज में सभी एक-दूसरे से बंधे हुए होते थे। इन परिवारों में बुज़ुर्गो की बात कोई भी टालने की हिम्मत नहीं करता था। इसमें उन्हें भी बड़ा संतोष मिलता था। अब भी जब बड़े-बुज़ुर्गों से कोई सलाह मशविरा लिया जाता है तो वह कितने खिल उठते हैं। हालांकि अब पहले वाली बात नहीं रही, जब सारे कामों के फ़ैसले घर-परिवार के मुखिया ही लेते थे।

सब कुछ इतनी जल्दी बदल जाएगा किसी ने सोचा भी नहीं था, लड़के-लड़कियों की तुनक मिज़ाजी से घरों में आपसी झगड़े मनमुटाव और सभी के दिलों में एक दूसरे के लिए ईर्ष्या-द्वेष प्रवेश करती जा रही है। इसी कारण परिवार कांच की तरह अब टूटते दिखाई दे रहे हैं। इसे तो फ़ैमिली का ‘न्युक्लियर कंसेप्ट’ ही कहा जाएगा। अगर देखा जाये तो महंगाई भी घरों को तोड़ने में पीछे नहीं रही है और उसी अनुपात से अब लोगों में सहनशीलता भी दिन ब दिन घटती ही जा रही है। कोई भी किसी की बात सुनने को तैयार नहीं, कोई किसी को कुछ कह दे तो दूसरा उसे काटने की तरफ़ दौड़ता है।

तीसरा कारण लड़कियों की निजता भी है और चौथा चैनल रोग का। इन कारणों से लोग अब अलग-अलग रहना पसंद करने लगे हैं। अब परिवारों का बोंसाईकरण आ चुका है। जीने और सोचने के तौर तरीकों में भी काफ़ी बदलाव आ चुका है।

बच्चे घर में माता-पिता द्वारा झगड़ा देखते हैं जिससे उनका मानस बहुत गहरे से प्रभावित हो रहा है। इस कारण बच्चों में नयी-नयी बुरी आदतें प्रवेश करने लगी हैं। आज कोई भी पहले की तरह पुराने रीति-रिवाज़ों, संस्कारो और परंपराओं को नहीं मानता वो दिन गये जब घरों में सभी धर्मों का आदर हुआ करता था। जिससे बच्चों पर अच्छा प्रभाव पड़ता था और उनका आचरण अच्छा होता था अब न तो दिल पहले जैसे, न लोग और न ही पहले जैसा प्यार ही एक दूसरे के लिए है। दिनों-दिन लोगों के आचरण में भी गिरावट आनी शुरू हो चुकी है। भारतीय संस्कृति मान सम्मान सब पीछे छूट गया है हम इस दौड़ में जितना आगे जा रहे हैं उतना ही इन्हें भुलाते जा रहे हैं।

आज की युवा पीढ़ी भी बड़ी आज़ाद है, उनके मेल-मिलाप, उठने-बैठने और सोचने के तौर-तरीकों में काफ़ी बदलाव-सा आ चुका है। आज के लड़के-लड़कियां एक साथ काम करते, पढ़ते, घूमते और खाते पीते नज़र आएंगे। इन सब का कारण युवा पीढ़ी की बदलती सोच उनका अपना नज़रिया और पश्चिमी प्रभाव है। युवा पीढ़ी आज अपनी किसी भी बात में घर के बड़ों का दख़ल देना पसंद नहीं करती। चाहे उनकी शादी ब्याह का ही मामला क्यों न हो। माता-पिता को तब पता चलता है जब बेटा लव-मैरिज कर घर आता है। मगर यह बात बुज़ुर्गों को क़तई नहीं भाती। वैसे तो आज भी करोड़ों परिवार हैं जहां मां-बाप की मर्ज़ी से ही शादियां हो रही हैं।

आज की नई पीढ़ी अपने मां-बाप को एक बड़ा बोझ समझती है, मां-बाप के प्रति सभी फ़र्ज़ों को भुलाती जा रही है। बड़े बुज़ुर्गों के पास उम्र भर का अनुभव होता है, हमें उसका ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना चाहिए मगर आज की इस दौड़ में दो मीठी बातें करने और बुज़ुर्गों के संग समय बिताने की फुर्सत ही किसके पास है। बच्चों के बच्चे भी आज उनसे बात करनी पसंद ही नहीं करते। बच्चों को तो बस टी.वी. देखना, घूमना-फिरना और क्लबों में, पार्टियों में जाना ज़्यादा अच्छा लगता है। ऐसी स्थिति में घर के बड़े बुज़ुर्ग अपने आपको अकेला व नाकारा महसूस न करें तो क्या करें। वे अपने बच्चों और पोते-पोतियों से एक गिलास पानी की भी उम्मीद नहीं कर सकते।

बच्चों का तो फ़र्ज़ है कि बूढ़े मां-बाप की लाठी बनें। मगर आजकल के बेटा-बहू ने सेवा तो क्या करनी उन्हें बोझ समझकर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए या तो घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं और या फिर उन्हें वृद्धाश्रम में डाल देते हैं। जो उनका आख़िरी समय बच्चों और अपने पोते-पोतियों में व्यतीत होना चाहिए वो समय अपने जैसे कई अभागे बूढ़ों के बीच गुज़ारते हैं। नम-आंखों से दिल में रोज़ एक आस की किरण लिए वह अपनों को याद करते हैं क्या पता कि कभी उन्हें हमारी याद आ जाए, कोई हमें नन्हें हाथों से इन बूढ़ी उंगलियों को पकड़ ले और दादा जी-दादी जी कहता साथ ले चले।

आज मेरा सबसे यह सवाल है कि जब मां-बाप को अपने बच्चे बोझ नहीं लगते तो बच्चों को मां-बाप क्यों बोझ लगते हैं? क्या कल हम बूढ़े नहीं होंगे? अगर आज हम अपने मां-बाप के साथ ऐसा करते हैं तो कल हमारे साथ हमारे बच्चे भी वही कर सकते हैं। हमें तो सदा इनकी ज़रूरत पड़ती रहेगी। बेशक कि हम बड़े हो चुके हैं लेकिन मां-बाप के लिए बच्चे ही थे और बच्चे ही हैं। क्या हमें उनसे दुख-सुख सांझे नहीं करने चाहिए, यदि ऐसा होगा तभी तो हमें उनका प्यार और आशीर्वाद मिल सकता है। जब वो हमारे साथ होंगे और इनका हाथ हमारे सिर पर होगा।

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