धर्म और राजनीति

-शैलेन्द्र सहगल

>आज के बदलते समय में धर्म और राजनीति के पारस्परिक सम्बंधों की चर्चा करते हुए सबसे पहले एक सवाल स्वयों के समक्ष आकार लेना आरम्भ करता है और वो यक्ष प्रश्न है कि धर्म क्या है? और इसका मौजूदा दौर में एक आम आदमी के जीवन में क्या स्थान है? धर्म ग्रन्थों में भले ही निहित है मगर उस पर आचरण करना ही अगर धर्म का पालन करना है तो हम यह कहेंगे कि धर्म की कसौटी पर कत्तई खरे नहीं उतर पा रहे हैं। धर्म अगर दया और उपकार का दूसरा नाम है तो हम आज उस से दूर हो चुके हैं। धर्म को अगर राजनीति से जोड़ कर देखा जाए तो चहूं ओर राजनीति का बोलबाला ही नज़र आता है और आज की राजनीति का कोई धर्म नज़र नहीं आता। धर्म के अनुशासन में बंधने की बजाय आज राजनीति ही धर्म पर भारी नज़र आती है। धर्म के नाम पर समकीर्ण साम्प्रदायिकता ने धर्म को अधर्म के चक्रव्यूह में फंसा रखा है। साम्प्रदायिकता कट्टरवाद ने दूसरे साम्प्रदायों के प्रति इस कद्र घृणा पैदा की है उस घृणा की कोख से आतंकवाद ने जन्म लिया है और संकीर्ण कट्टरपंथी लोगों ने आतंकवाद को उसी घृणा की भट्ठी में तपा कर आतंकवाद को एक नया और खौफ़नाक आत्मघाती चेहरा प्रदान कर दिया है। दूसरे के विध्वंस के लिए आत्मघात द्वारा आत्मविध्वस के लिए तत्पर होने के ख़तरनाक जुनून को अगर कोई किसी धर्म की पहचान देने की कोशिश करे तो उसे राजनीति की किस श्रेणी में रखा जाए? आज की भ्रष्ट और वोट की राजनीति ने धर्म मार्ग को किस प्रकार अवरुद्ध कर रखा है उसकी मिसाल देनी हो तो साम्प्रदायिक दंगों से लेकर आतंकवादी वारदातों का घिनौना लम्बा इतिहास देखना होगा। धर्म से जुड़ी राजनीति की अनुसरणीय मिसाल देनी हो तो अकबर और महाराजा रणजीत सिंह के राज की मिसाल से ले कर राम राज तक की मिसाल दी जा सकती है वहीं राजनीति से प्रदूषित धर्म की बात करते हुए हम मुगल राजाओं के साम्प्रदायिक अत्याचारों से लेकिन पाकिस्तान के इस्लामिक बम तक का बखान कर लकते हैं। धर्म को राजनीति से और राजनीति को धर्म से अलग तो किया ही नहीं जा सकता क्योंकि दोनों ही मानवीय आचरण का अभिन्न अंग हैं जो राजनीति में है। उसके लिए धर्म का आचरण और भी अनिवार्य हो जाता है और जहां तक धर्म का सवाल है वह राजनीति को शांति और लोकहित के मार्ग पर चलाए जाने के लिए परमावश्यक है। दोनों के उत्थान में महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। धर्म से हटा राजनेता पूरे राष्ट्र को पतन के गर्त में पहुंचा सकता है वहीं एक धार्मिक आस्थावान राज नेता राष्ट्र और कुल की खुशहाली और ख्याति को चार चांद लगा सकता है। ऐसे में सवाल है तो दोनों के सदुपयोग या दुरुपयोग का! जो राजनीति और धर्म का दुरुपयोग करता हो वो पतित और पापी बन कर ही उभरता है वो धर्म और राजनीति दोनों को कलंकित करके अपने अंजाम को प्राप्त होता है जो दोनों का सदुपयोग करता है वो यश और कीर्ति को हासिल करता है धर्म और राजनीति का परिणाम अगर दुखद, भयावह और विध्वंसकारी निकलता हो तो उसे अधर्म और अत्याचार की संज्ञा ही दी जाएगी, धर्म हो या राजनीति सकारात्मक परिणामों के लिए सदाचार अनिवार्य है। राजनीति का आधार अधर्म अन्याय, असमामता और अत्याचार कभी नहीं हुआ मगर जब-जब सत्ता दुराचारियों के हाथ में आई तब-तब धर्म की हानि हुई। जब-जब भी धर्म की हानि हुई तब-तब ईश्वर ने अधर्म और पाप के साम्राज्य का अन्त करने के लिए अवतार लिया। अतः धर्म और राजनीति के उत्थान के लिए दोनों की सत्ता का नेक हाथों अनिवार्य है।

 

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