नाज़ुक व प्यारा-सा रिश्ता दोस्ती

-सतबीर

ज़िंदगी यूं भी कभी आसां नहीं होती। फिर इस पर यदि ज़िंदगी का सफ़र अकेले काटना पड़े तो यह और भी उलझ जाती है। अकेलापन ही सज़ा बन जाता है और लगता है कोई तो होता जिसे हम अपना कह सकते। कोई तो होता जिससे लिपट कर आंसुओं का बोझ हलका कर लेते। हंसकर खुशियां बांटते, ढेर सारी बातें करते। कुछ उनकी सुनते कुछ अपनी कहते। शायद इन लम्हों को बांटने के लिए मित्रता को जीवन हेतु निहायत ज़रूरी माना गया है। यह एक ऐसा पवित्र रिश्ता है जिसकी मिठास से जीवन खुशनुमा बन जाता है परन्तु इस रिश्ते की डोर काफ़ी नाज़ुक होती है। ज़रा-सी ढील दे दिए जाने पर अब टूटी अब टूटी के कगार पर पहुंच जाती है।

एक अच्छे मित्र में समर्पण, त्याग, दृढ़ विश्वास व कठिनाइयों से जूझने की क्षमता होना अति ज़रूरी है। इन्हीं गुणों के कारण ही इस रिश्ते में आत्मीयता व प्रगाढ़ता बनी रह सकती है। एक ऐसे दोस्त की तलाश हर एक को होती है जो उसे मन से अपनत्व दे, उसकी भावनाओं की चंचल लहरों के साथ-साथ चल सके, उसे थाम सके। कहना ही क्या दोस्ती ऐसा रिश्ता है जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन ही नहीं है।

एक अच्छा मित्र वही है जो सच्चे मन से अपने मित्र को चाहे, सराहे। उसकी भावनाओं को पूर्ण रूप से समझे, उसे सहयोग दे। हमेशा अपनी बात को ही महत्त्व न दे बल्कि अपने मित्र की बात भी सुने। कई बार ऐसा होता है कि आपको आपकी सखी की कोई बात अच्छी नहीं लगती या कोई आदत पसंद नहीं होती तो दूसरों के सामने इसको लेकर उसका मज़ाक न उड़ाएं। आपको चाहिए कि आप अकेले में उसे उसकी कमियों का एहसास कराएं। एक सच्चे मित्र की पहचान ही यही है कि वो एकांत में दोस्त को उसकी कमियों के लिए डांटता है और सभी के समक्ष उसकी प्रशंसा करता नहीं थकता। अगर आपके मित्र की अनुपस्थिति में कोई उसके लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग करे तो उसकी बातों का खंडन अवश्य करें या फिर वहां से उठ जाएं जिससे यह प्रतीत हो कि आपको आपके मित्र के विरुद्ध कुछ भी सुनना गवारा नहीं।

हर इंसान का सामर्थ्य व आर्थिक स्तर समान नहीं होता। इसी कारण अपने मित्र से कभी भी अधिक अपेक्षा न रखें। उपहार इत्यादि मौक़े व सामर्थ्य के अनुसार ही दें व लें। हर व्यक्ति की अपनी मजबूरियां होती हैं जिनके कारण काफ़ी बातों को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है।

एक अच्छी सहेली अपनी सहेली की राज़दार होती है। वह अपना हर दुःख-सुख उससे बांटती है। अपनी परेशानियों का समाधान पूछती है, सलाह मांगती है। इसलिए आपको चाहिए कि आप अपनी सखी को सभी महत्वपूर्ण बातों से अवगत कराएं। अगर वो ऐसी बातें आपकी बजाए किसी और से सुनेगी तो उसके दिल को ठेस पहुंचनी लाज़िमी ही है। इससे संबंधों में दरार उत्पन्न नहीं होगी तो और क्या होगा?

अपनी सखी के स्वाभिमान को कभी भी ठेस न पहुंचाएं अगर आपकी सखी के स्वाभिमान को आपकी किसी ग़लती के कारण ठेस पहुंची हो तो अपनी ग़लती को स्वीकार कर लें और दोबारा वही ग़लती कभी न करें। आपस में कभी ग़लतफ़हमी या तकरार हो जाने पर इसका ढिंढोरा न पीटें क्योंकि इससे हर कोई आप दोनों से लाभ उठाने की कोशिश करेगा। बातचीत से इसे दूर करने का प्रयत्न करें। होना तो ये चाहिए कि अगर आपकी आपस में किसी बात पर तकरार हो गई है तो भी लोगों के सामने बिलकुल वैसा ही व्यवहार करें जैसा पहले करते थे। उनको पता ही न चले कि आप लड़े हुए हैं।

आप दोनों में कितनी भी तकरार क्यों न हो जाए, भले ही आप अलग हो जाएं पर अपनी सहेली का राज़ किसी और के सामने न खोलें। हर राज़ को सीने में छिपाए रखें।

आपको अपनी सहेली के दुःख-सुख परेशानी आदि में उसका सही मार्गदर्शन कर उसका साहस बढ़ाना चाहिए। अगर वह अस्वस्थ हो तो उसकी यथासंभव देखभाल करें। सप्ताह में दो-तीन बार उसके घर जाकर उसका हाल पूछें अगर घर जाना संभव न हो तो फ़ोन के माध्यम से ही उसका हालचाल अवश्य पूछें।

अगर वह आपसे कुछ समय के लिए जुदा हो तो उसे भावनाओं से सराबोर पत्र लिखें या कार्ड डालें जिससे उसे आपकी मौजूदगी का एहसास होता रहे। समय-असमय फ़ोन भी कर सकते हैं।

कई बार यह होता है कि अगर एक सहेली प्रतिभावान है तो दूसरी ईर्ष्या करने लगती है। ईर्ष्या करने की बजाय उसकी उपलब्धियों पर खुशी व्यक्त करें व दूसरों के समक्ष भी इसका ज़िक्र अवश्य करें। आप भी उसकी प्रगति में रुचि लें, अपनी प्रगति करें।

कभी भी अधिक सहेलियां न बनाएं इससे आपके पास किसी एक के लिए भी समय नहीं बचेगा और आप भावनात्मक रूप से उनके प्रति समर्पित नहीं हो सकेंगी इसलिए एक या दो ही अच्छी सहेलियां बनाएं।

एक अच्छी सखी, सहेली का जीवन में बहुत महत्त्व है और हर एक व्यक्ति के जीवन में ये होती है। कोई इस रिश्ते की अहमियत को समझता हुआ इसे बरक़रार रखता है और कोई इसे फालतू बोझ समझता हुआ अपने से दूर कर देता है। पर एक बात है यारो! दोस्ती बड़े काम की चीज़ है।

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