भारद्वाज गुरू जी

‘लो, चाय पी लो जी।’ कहते हुए चम्पा ने गरमागरम चाय का गिलास अपने घर में पधारे अजनबी की ओर बढ़ाया। अंगीठी सेंकते हुए अजनबी सिर झुकाए सोच में डूबा हुआ था। सुरीली, खनकती आवाज़ सुनकर चौंका। इस बार उसने ग़ौर से चम्पा की ओर देखा। जो बिजली की चमक से ज़्यादा सुंदर लग रही थी। उसने पहाड़ी ढंग का लिबास पहना हुआ था। गिलास पकड़ते हुए उसने पूछा था, ‘आप, घर में अकेली ही हैं। बाक़ी लोग?’ ‘हां जी अकेली ही हूं।’ चम्पा ने उत्तर दिया। आगे उस ने कुछ नहीं कहा। उसके इस प्रश्न पर चम्पा ने पहली बार अजनबी को गहरी नज़रों से देखा। उसे एक झटका-सा लगा। अजनबी उसे जाना-पहचाना सा चेहरा लगा पर वह आश्वस्त नहीं हो पाई पहचान को लेकर।

अजनबी ने बाहर की ओर देखते हुए कहा, ‘बर्फ़बारी ज़ोरों से हो रही है। ऐसे में तो….।’ 

‘हां, जी अब तो लगता है खूब गिरेगी।’ उसने जवाब दिया। अजनबी की बातचीत के लहज़े को देखकर अचानक उसके मुंह से निकला, ‘हैं, भारद्वाज गुरू जी। हो बाबा मेरेया!’ उल्टे पांव वह रसोई में लौट आई। चूल्हे के पास बैठ गई। पर मन में हलचल सी मच रही थी। कहीं मुझे ग़लतफ़हमी तो नहीं हो रही है पर नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अपने अध्यापक को कौन भूल सकता है? फिर भारद्वाज जैसे टीचर को तो कोई भी नहीं। लेकिन चम्पा का अनुमान यक़ीन में नहीं बदल रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके चेहरे-मोहरे और बोल-चाल में इतना बदलाव आ जाएगा। उसके मानस पटल पर तो वही पच्चीस साल पुरानी तसवीर छाई हुई थी। इस समय तो वह खुद भी चालीस की हो गई है। गुरू जी ने तो उसे बिल्कुल पहचाना तक नहीं शायद। वैसे भी इतने सालों बाद क्या याद रह पाता है पर मैंने तो पहचान लिया है। मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं। बुलाऊं या नहीं? वह भावुक हो उठी। उसे देर तक रुकना कठिन लग रहा था पर यदि गुरू जी न हुए तो? ऐसी बर्फ़बारी और रात के समय अजनबी को घर से निकालना क्या ठीक होगा? है तो कोई मुलाज़िम ही। तब भी रात भर ठहराना? अगले घर भी थोड़ी दूर ही हैं। अपनी पहचान को पुख़्ता करने के लिए चम्पा गिलास उठाने के बहाने बाहर आई। वह कहना तो चाहती थी कि गुरू जी, आपने हमें पहचाना या नहीं, लेकिन सामने आने पर कुछ और ही कह गई, “ठंड बहुत बढ़ गई है। आप थोड़ा रिलैक्स हो जाओ तब तक मैं दाल-भात बना लेती हूं।” रिलैक्स शब्द सुनकर अजनबी कुछ चौंका, तो ये पढ़ी-लिखी है। मैंने तो अनपढ़ पहाड़न समझा था। यकायक वह खड़ा हो गया। उसने सिर पर ओढ़ी टोपी को उतारा और कोट के बटन खोलते हुए कहा, ‘अंगीठी के सेंक से थोड़ी जान आई।’

चम्पा बोली, ‘पहाड़ में रोटी के बग़ैर तो रह सकते हैं पर आग के बिना नहीं।’

हंसते हुए अजनबी बोला, ‘सच्ची बात है। अच्छा अब मैं चलता हूं। आप मुझे रास्ता बता दो।’

‘कहां जाएंगे जी?’ चम्पा ने चौंकते हुए पूछा।

‘अपनी मंज़िल की ओर।’

‘पर बाहर इतनी बर्फ़बारी और रात….।’

वह कुछ सकपकाया, ‘आप अकेली…. और मेरा रुकना….। कुछ अच्छा नहीं लगता। हम चले जाएंगे।’

चम्पा अधीर हो उठी। अपनी पहचान को पुख़्ता करने के लिए इतना समय और बात काफ़ी थी। अब उस अजनबी के भारद्वाज गुरू जी होने में कोई शक नहीं रह गया था। अब तो उसका मन उत्साह से भर गया।

उसने फटाफट बिस्तर साफ़ किया। नयी रज़ाई और पट्टू निकाल कर रखते हुए बोली, ‘गुरू जी अब आप लेट जाइए ठंड बहुत है। मैं तब तक खाना तैयार करती हूं। ये लो भुनी मक्की चबाते रहो।’

‘गुरू जी’ शब्द सुनकर अजनबी को झटका सा लगा। इससे पहले कि वह कुछ सफ़ाई देता चम्पा झट से रसोई में लौट आई और चूल्हे पर बर्तन रख दिये। साथ ही यादों की बर्फ़ भी पिघलने लगी।

आज से कोई पच्चीस साल पहले दसवीं में पढ़ती थी। सरकारी स्कूल था। दूरदराज़ के पिछड़े से पहाड़ी गांव में क़ुदरत ने दिल खोल कर रंग बिखेरे थे। एक दिन सुबह प्रार्थना सभा में अध्यापकों की गिनती बढ़ गई थी। एक नया चेहरा था। सारे बच्चों की नज़रें उनकी ओर थीं। एक लम्बा, पतला, आकर्षक से चेहरे वाला युवक। चेहरे से ज़्यादा आकर्षक वेश-भूषा। गोरे चेहरे पर काला चश्मा और राजसी ठाठ सी चाल। यही कोई चौबीस-पच्चीस की उम्र होगी। चम्पा को वह दिन ऐसा याद है मानों कल की ही बात हो। लड़कों ने कहा था, ‘टैंथ वालों को इंग्लिश पढ़ाएंगे।’ अंग्रेज़ी में हम सब चालू थे लेकिन इन्हें देख कर हमें लगता था कि अंग्रेज़ी भी कितना अच्छा विषय है। दूसरे दिन पता चला कि इनका पूरा नाम आर. पी. भारद्वाज है। पहली नियुक्ति हुई है। कहीं दूर गांव के हैं।

ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस स्कूल के इलाके में सर्दियों में खूब बर्फ़ गिरती और बरसात में अच्छा पानी बरसता था। उन दिनों सड़क एक दूर का सपना था। बाहर के इलाके से मास्टर इधर आना पसंद नहीं करते थे। स्कूल था कि नियमों की बजाय मनमर्ज़ी से अधिक चलता था। कई बार मास्टरों के होते हुए भी पूरा दिन बिना किताब छुए निकल जाता था लेकिन भारद्वाज सर के आने के बाद सब कुछ बदलने लगा था। पढ़ाई ढंग से होने लगी थी। स्कूल का रंग-रूप निखरने लगा था। पढ़ाने का ढंग इतना अच्छा कि पूछो मत। हंसमुख चेहरा सलीक़े की बातचीत। सभी विद्यार्थियों पर एक रंग चढ़ने लगा था। भारद्वाज गुरू जी का कभी न उतरने वाला रंग। मेहनत, लगन, ईमानदारी और सच्चे कर्म-भाव का रंग। हम में से बहुत से साथियों ने अध्यापक का ऐसा रंग-रूप पहली बार ही देखा था। अब स्कूल आना और पढ़ना अच्छा लगने लगा था। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा था। मैं सबसे पहले घर आकर इनका ही होमवर्क करती थी। मुझे चम्पा देवी नहीं चम्पाकली कहकर बुलाते थे और भी कितना कुछ याद आने लगा। एक पूरी किताब बन जाए। अक्सर कहते थे, ‘तुम पहाड़ की लड़कियां सीधी, सरल, सपाट कविता सी। सरलता और सुंदरता के सुमेल पर तुम्हारे हिस्से में सिर्फ़ काम ही काम है, चूल्हा-चौका, लकड़ी, घास, पानी, खेत, डंगर पशु की रखवाली। कब पढ़ती हो तुम? इस पढ़ाई का तुम्हारी ज़िन्दगी से क्या ताल-मेल? इसके बाद झट से ब्याह-शादी का झंझट।’ लगता था इन्होंने उस समय पहाड़ की ज़िन्दगी के कड़वे सच चखे थे। चूल्हे की लकड़ियां बुझ गई थीं। चम्पा ने फूंक मार कर सुलगा दीं। एक-दो और साथ डाल दी। बाहर बर्फ़ की चादर मोटी होती जा रही थी। अंधेरा घिर आया था। फिर एक नज़र रज़ाई में दुबके अपने पुराने अध्यापक पर दौड़ाई जो सिगरेट सुलगाए हुए सोच में डूबे नज़र आ रहे थे। चम्पा के मन में फिर ज्वार उठा। मुझे पहचाना या नहीं? आज इतने सालों बाद। आप कैसे हैं? कहां हैं? लेकिन उसके मुंह से फिर कोई शब्द नहीं निकले। बस उनके चेहरे की ओर देखती रही जो अब बुढ़ापे का गवाह बन गया था।

वह फिर से पुराने दिनों में खो गई।

पांच-छः महीनों में ही भारद्वाज गुरू जी का जादू पूरे स्कूल पर सिर चढ़कर बोलने लगा था। क्लास रूम हो या खेल का मैदान, कल्चर प्रोग्राम हो या पिकनिक पार्टी, भारद्वाज गुरू जी सब से आगे। ऊपर से बनते फबते ऐसे थे कि देखने वाले देखते रह जाते। बच्चों के साथ मिलकर बच्चे बन जाते। पर क्लास में आते ही इनके सारे रंग ढंग बदल जाते थे। फिर बस एक पढ़ाई होती थी और कोई लिहाज़ नहीं। फिर एक नया दौर चला था। महीने में एक बार स्कूल के आस-पास के क्षेत्रों में घुमाने के लिए ले जाते। कहते थे क़ुदरत को जानो पहचानो और मानो। देखो यहां कितना आनन्द है शांति है। हमारे लिए एक नई बात थी। झरनों के पानी से खेलते रहते कविता सुनाते कभी चुटकले।

उस रोज़ पिकनिक थी। देवदारों से घिरा एक मैदान। लड़के-लड़कियां नाच गा रहे थे। कुछ सहपाठी खींचकर ले आए। गुरू जी नाटी हो जाए। भई मैं नहीं नाचता। फिर नाटी तो मुझे आती ही नहीं। पर जब शुरू हुए तो सब हैरान रह गए। फिर गाने बजाने का दौर शुरू हुआ। पूरे स्कूल ने आनन्द लिया। कई दिनों तक इसकी चर्चा होती रही थी।

पर आज चम्पा को जिस बात पर अत्यधिक दुःख और हैरानी हो रही थी, वह था गुरू जी का सिर से पांव तक बदला हुलिया। उसने खुद से ही कहा, ‘गुरू जी या तो आप मिलते ही नहीं या फिर उसी रूप में मिलते जिसमें हम आप को छोड़ आए थे।’ उसका मन इस सच्चाई को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि भारद्वाज जैसा युवक गंजा भी हो सकता है, नपा तुला शरीर बेढंगा हो सकता है, आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ सकता है, मोती से दांत काले हो जाएं और नशे से दूर रहने वाला नशाखोर हो जाए।

नहीं, यह बड़ा अनर्थ है, ऐसा नहीं हो सकता। परेशान सी वह रसोई से बाहर आ जाती है। दाल पक गई है। चावल के लिए पानी रखकर साथ वाले कमरे में आ जाती है। लकड़ी की अलमारी के ऊपर रखे हुए फ़ोटो को उतार कर हाथों में थाम लेती है। जमी हुई धूल साफ़ करती है। कितने सालों बाद इसे देख रही हूं, मायके से साथ ले आई थी। दसवीं क्लास का ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो। फ़ोटो के ऊपर लिखा है, ‘समय बीत जाता है, बस यादें रह जाती हैं।’ नीचे एक काग़ज़ को चिपका कर उसने अपने हाथों से लिखा था, ‘जाने किस मोड़ पर मुलाक़ात हो।’ चम्पा की आंखें छलछला गईं। आंखें फ़ोटो पर जम गईं। वह खुद कितनी पतली थी पहाड़ी चिड़िया सी। फिर आंखें भारद्वाज गुरू जी के चित्र पर चिपक गईं। एकदम युवा, तरोताज़ा, कोट-पैंट और टाई पहने हुए। सब से अलग नज़र आ रहे हैं। सच, समय बड़ा बलवान होता है। उसके मुंह से अस्पष्ट से शब्द निकले। एक बार फिर से फ़ोटो को ग़ौर से निहारने के बाद रख दिया।

दरवाज़े के पास दस्तक से वह चौंक उठी। चम्पा के गुरू जी थे। काफ़ी थके और बेहाल से लग रहे थे। काफ़ी सोच-विचार के बाद वह इस निर्णय पर पहुंचे थे कि अकेली औरत के घर टिकना ठीक नहीं है। कई बातें हो सकती हैं। वह अपने निर्णय की सूचना देते हुए बोले, ‘अच्छा अब जा रहा हूं। मुझे थोड़ा आगे का रास्ता बता दो।’ ‘पर आप जाना क्यों चाहते हैं ऐसे में?’ इस बार चम्पा ने एक भरपूर दृष्टि उन पर डाली। गुरू जी ने भी पहली बार आंखों में एक प्रश्न सूचक भाव से उसे देखा। चम्पा की साफ़ चमकीली आंखों में उन्हें बड़ा अपनत्व सा लग रहा था। उत्तर में वे बोले, ‘जाना ही ठीक रहेगा। आपके घर में कोई….।’ सहज भाव से चम्पा कहने लगी, ‘ऐसी कोई बात नहीं है, आप का ही घर है। आप खाने के लिए हाथ धो लें।’

‘नहीं, खाना नहीं खाऊंगा।’

चम्पा का धैर्य जवाब दे ही गया, ‘शायद आपने नहीं पहचाना हो। पर मैं आपको पहचान गई हूं।’

सुनते ही वह बुरी तरह चौंक उठे, ‘पहचान गई हो?’

‘हां’ चम्पा कुछ शरमा सी गई। ‘आप भारद्वाज गुरू जी नहीं हैं?’

सुनते ही चारपाई पर बैठ गए हैरान-परेशान से। कुछ क्षणों बाद कांपती आवाज़ में बोले, ‘तुम मुझे जानती हो। यानी मेरी स्टूडेंट हो?’

बड़े नरम स्वर और सम्मान भाव से चम्पा ने कहा, ‘हां, गुरू जी आपने हमें पढ़ाया है। तभी तो मैंने आपको रोक लिया। पहले तो मैं भी पहचान नहीं पाई थी।’

अपना टोप उतारते हुए गुरू जी ने कहा, ‘कुछ याद नहीं आ रहा।’ चम्पा तो मानों इंतज़ार कर रही थी। दौड़कर ग्रुप फ़ोटो की कॉपी उठा लाई। गुरू जी चश्मा चढ़ा कर देखने लगे। मुरझाया सा चेहरा किसी ताज़ा फूल-सा खिल उठा। चम्पा उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ती रही। एक लम्बा सांस छोड़ने के बाद बोले, ‘ओह, अब याद आया। तुम मास्टर राम लाल की भांजी हो। बीस-पच्चीस साल बाद देख रहा हूं। कैसे पहचानता एकदम। तब तो तुम गुड़िया सी थी। लेकिन इतनी दूर कैसे?’

‘मेरी ससुराल है।’ चम्पा ने हौले से कहा।

गुरू जी फ़ोटो पकड़कर बैठ गए। अब तो एक-एक का हाल पूछने लगे। ये बिमला कहां है? शीला का पता है? कांता और मीरा मिलती हैं या नहीं और ये लड़के? कुछ ख़बर है? चम्पा को लगा कि एकाएक गुरू जी पच्चीस साल छोटे हो गए हैं। उन्हें सब कुछ याद है। स्कूल के बाद एक लड़की का उस समय कुछ लफ़ड़ा हो गया था। उसके बारे में भी पूछने लगे।

बड़े भावुक स्वर में चम्पा बोली, ‘गुरू जी, ज़िन्दगी की भाग दौड़ में कुछ याद ही नहीं रहता। अब उस इलाके की ओर जाना ही नहीं होता। आपको पता ही है औरत की ज़िन्दगी और कोल्हू का बैल। बहुत जी करता है कि कभी जाकर एक-एक से मिलूं। आज क़ुदरती आप मिल गए तो कितना कुछ याद आ गया। सच मैं बहुत ही खुश हूं। सपने में भी नहीं सोचा था ऐसा। पहले तो मैं आपको पहचान ही नहीं पाई।’

‘हां, बेटी वक़्त सदा एक-सा नहीं रहता। बड़ा बेरहम है, इंसान के साथ कई प्रकार के खेल खेलता है।’ वे गम्भीर स्वर में बोले।

चम्पा उनके लहज़े से समझ गई थी कि वक़्त ने गुरू जी के साथ वफ़ा नहीं की है। अब तो वह भी अधेड़ हो गई है। इसलिए गुरू जी से पूछना उसे ठीक ही लगा। थोड़ा सकुचाते हुए पूछ ही लिया, ‘आपका परिवार उस समय तो आप….।’

‘हां, चम्पा तुम्हारे स्कूल के समय तो कुंवारा ही था। वहां के बाद मैरिज की थी। तीन बच्चे हैं अभी पढ़ रहे हैं कॉलेज में। मिसिज़ गुज़र गई हैं। खुद भी बीमार सा रहता हूं।’ गुरू जी ने अपनी कहानी का सार-सा सुनाया।

चम्पा ने सवाल किया, ‘पर इधर कैसे?’

‘ट्रांसफर हुई है।’

‘कहां? हमारे गांव में?’

गुरू जी ने स्कूल का नाम लिया। सुनते ही चम्पा चौंक उठी, ‘ये तो यहां से काफ़ी दूर है। अढ़ाई घंटे का पैदल रास्ता है चढ़ाई वाला। अब तो बर्फ़ भी काफ़ी होगी।’ बड़े दृढ़ स्वर में गुरू जी ने उत्तर दिया, ‘कोई बात नहीं सब ठीक है। तुम्हें पता है भारद्वाज कैसा टीचर था। फिर बेटी ये मेरी अच्छी सेवा का फल है। मैंने ड्यूटी को ही सबसे बड़ा धर्म माना है और मानता रहूंगा। बच्चे मेरी सब से बड़ी दौलत हैं। इसलिए पांच साल में ये मेरी तीसरी ट्रांसफर है। वे मुझे ईमानदारी और सच्चाई से रोकना चाहते हैं।’ गुरू जी जैसे अब उबल जाना चाहते थे। उनका चेहरा एक दम कठोर और आवाज़ में विद्रोह का भाव था। फिर एकदम पासा बदलते हुए बोले, ‘ख़ैर, बेटी छोड़ो ये सब कुछ। ये तो चलता ही रहता है। ये तुम भी जानती हो आज सच्चे सुथरे को धक्के और तिकड़मबाज़ों को सलाम है। पर तुम अपने घर परिवार की तो सुनाओ। ये अकेली….।’

चम्पा हंसते हुए बोली, ‘अकेली ही रहती हूं। ऐसा जानो।’

‘सच….?’

वह फिर मुस्कुरा पड़ी। ‘गुरू जी मैं तो आगे पढ़ना चाहती थी। मेरी बड़ी इच्छा थी पर ये पहाड़ की ज़िन्दगी बस, पूछो मत! दो बच्चे हैं। लड़की तो ब्याह दी है। लड़का बाग़वानी देखता है। आज मेहमान गया है। घर वाला पंचायत प्रधान है।’

‘तब तो ठीक है।’ गुरू जी ने जवाब दिया।

‘अब तो ठहरोगे या….?’ चम्पा ने पूछा।

‘यहीं ठहरूंगा। अब तो मन शांत है।’ गुरू जी ने कहा।

‘तो खाना तैयार है। आप को भूख लगी होगी। इतनी दूर से आए हो।’ कहते हुए रसोई में चली गई।

चम्पा खाना ले आई। ‘ये लो राजमाह की दाल, इधर पहाड़ के हैं ये सेब का मीठा और गुच्छी की सब्ज़ी। गुरू जी खट्टा नहीं बनाया मैंने …. ठंड है।’

‘सब ठीक है।’ कहते हुए आसन ग्रहण किया।

खाना खाते समय चम्पा फिर उनके पास बैठ गई। एक कटोरी में कड़कड़ा घी ले आई। ‘देसी गाय का है ठंड में अच्छा लगता है।’ कहते हुए थाली में उड़ेल दिया। थोड़ी देर बाद बोली, ‘गुरू जी, ठाकुर साहब से बात करूं ट्रांसफर रुकवाने की। वहां आप बड़े तंग होंगे।’

‘कौन ठाकुर साहब?’

‘मेरे पतिदेव। उनकी ठीक पहुंच है। शिमला गए हैं। वैसे तो आज आने वाले हैं पर शायद मौसम….।’ चम्पा ने कहा।

‘नहीं बेटा, भारद्वाज इस बात के लिए नहीं झुक सकता। वैसे भी अच्छा नहीं लगेगा। आप को कष्ट दूं।’

‘इसमें कष्ट की कोई बात नहीं है। आप हां कह दो।’

‘तुम्हें याद है मैंने तुम्हें क्या शिक्षा दी थी?’ गुरू जी ने पूछा।

चम्पा ने रटा-रटाया उत्तर दिया, ‘झुकना नहीं अड़ना सीखो। रुकना नहीं चलना सीखो। अन्याय से लड़ो आदि।’

इस पर गुरू जी ने कहा, ‘तो फिर बस। कोई बात नहीं।’ पर चम्पा ने हार नहीं मानीं और गुरू जी को मनवा ही लिया कि ट्रांसफर कैंसल करवाने के लिए बात करें।

दूसरे दिन गुरू जी अपने गंतव्य के लिए रवाना हुए। मौसम खुल गया था। चम्पा ने सुबह ही खाना तैयार कर दिया। रास्ते के लिए भी खाना पैक कर दिया। साथ में दो जोड़े पूलों के दिए घर में पहनने के लिए। गांव का लड़का साथ भेज दिया। इस ताकीद के साथ कि जब भी आना-जाना हो तो यहीं पर रुका करना अपना घर समझ कर। शराब पीना छोड़ दें। ऐसी प्रार्थना भी की। गुरू जी ने वचन दिया कि कोशिश करूंगा। आगे की भगवान् जाने। चम्पा की आंखें भर आईं। आंसुओं की झिलमिलाहट में राम प्रकाश भारद्वाज एम. ए., बी. एड. का पच्चीस साल पुराना रंग-रूप झिलमिला रहा था। देवदार स्कूल का ग्राउंड था। चीड़, देवदार के जंगल और हंसते बतियाते अपने सहपाठी थे। एक बार फिर ग्रुप फ़ोटो उसके हाथों में थी। एक गुज़रा हुआ ज़माना और एक गुज़र रहा ज़माना। ज़िन्दगी भी क्या खेल है। उसके मुंह से मानों कविता सी फूट पड़ी।

दो महीने बीत गए। चम्पा को गुरू जी की कोई ख़बर नहीं मिली। उसने प्रयास भी किया पता चला कि ज्वाइन करने के बाद छुट्टी चले गए थे। कुछ कह रहे थे कि बीमार हैं। अलग-अलग बातें।

एक दिन चम्पा बड़ी उदास थी। बुझी-बुझी सी किसी काम में मन नहीं लग रहा था। तभी प्रधान साहब ने फ़रमाया, ‘लो आपके गुरू जी के ट्रांसफर आर्डर ले आया हूं। बड़ी हुज्जत करनी पड़ी। आज के ज़माने में चालू बनना पड़ता है। हवा का रुख देखना चाहिए।’

‘तो क्या मेहनत, ईमानदारी और लियाक़त की कोई क़ीमत नहीं? वो भी टीचर के लिए।’ चम्पा ने सवाल किया।

सुनते ही प्रधान जी दंग रह गए। बोले, ‘कहीं गुरू जी का असर तो नहीं।’

चम्पा ने कहा, ‘ऐसा ही समझ लो।’

‘अच्छा गुरू जी को ख़बर कर दे। स्कूल में आर्डर देर से मिलेंगे।’ चम्पा ने अगले दिन बेटे को गुरू जी के नये स्कूल भेज दिया। उनको साथ ही लाने को कहा। वह बहुत खुश थी। आज खूब बातें करूंगी। नये पकवान खिलाऊंगी। बेटा शाम को लौट आया अकेला ही। चम्पा के पूछने पर बताया कि पन्द्रह दिन पहले हार्ट अटैक से उनकी मौत हो चुकी है। सुनते ही चम्पा चीख पड़ी, ‘नहीं, भारद्वाज गुरू जी कभी मर नहीं सकते। वह सदा जवान और सुंदर रहेंगे। कभी नहीं मरेंगे।’

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