सुविधाशुल्क चालीसा

-विजय उपाध्याय

आज के ज़माने में कहीं भी कोई काम बिना किसी सेवा के नहीं होता। सुविधा सम्पन्न इस युग में चारों ओर सेवा भाव ही अपना आधिपत्य जमा रहा है। लोगों में शालीनता, सभ्यता बढ़ती ही जा रही है। सेवा के बावजूद अगर आप कहीं रिश्वतख़ोर, घूसख़ोर, बेईमान कपटी आदि असभ्य शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो परिणाम प्रतिकूल ही होगा। ज़माने की नज़ाकत को देखते हुए समझदारी तो इसी में है कि ऐसे शब्दों को अब अपने शब्दकोष से बाहर फेंक दिया जाए। इन्हीं शब्दों का पर्यायवाची लेकिन मर्यादित और सुसभ्य शब्द सुविधाशुल्क (रिश्वत, घूस) आजकल प्रचलन में है।

हनुमान चालीसा और शिव चालीसा के पठन से जिस आध्यात्मिक शान्ति की प्राप्ति होती है उसी तरह वर्तमान समय में ‘सुविधाशुल्क चालीसा’ के पठन, श्रवण व इसका अनुसरण करने वालों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। किसी भी काम को मूल्य पर अपनी मर्ज़ी अनुसार करवाना ‘सुविधाशुल्क चालीसा’ का ही प्रसाद है।

एक ज़माना था जब अपना काम करवाने के लिए ‘सुविधशुल्क चालीसा’ का भोग लगाया जाता था मगर इसका दूसरा पहलू भी उभर आया है। आजकल ‘कुछ नहीं’ करने का भी सुविधाशुल्क लिया व दिया जा रहा है। मसलन, बिना कुछ किये क्रिकेट मैच हराने, अदालत में सरकारी वकील के मुंह से सिर्फ़ ‘नो ऑब्जेक्शन बुलवाने, हवाई अड्डे से आंखें मूंदकर किसी तस्कर को जाने देना आदि कई उदाहरण भरे पड़े हैं।’

आप जानने के लिए उत्सुक होंगे आख़िर ‘सुविधाशुल्क चालीसा’ का रहस्य क्या है? हम ने इस आधुनिक महाकाव्य को सिर्फ़ चार आसान खण्डों में बनाया है। इस के पठन, श्रवण पर अमल करने वाला सदैव सुख प्राप्त करता है। इस आधुनिक महाकाव्य के चार खण्ड हैं- नज़राना, शुक्राना, मेहनताना और हर्ज़ाना।

नज़रानाः यह सुविधाशुल्क का प्रथम अध्याय है। आप किसी का कोई काम उदारवादिता से कर देते हैं तथा वह व्यक्ति बिना किसी की नज़र में आए कोई उत्तम भेंट पर्दे से दे जाये उसे नज़राना कहते हैं। नज़राना अर्पित करने से भविष्य में संबंध मधुर रहते हैं। नज़राना अर्पित करने वाला समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है तथा दोबारा फ़ोन या चिट पर भी अपना काम निकलवाने का सामर्थ्य रखता है। इसका साइड इफेक्ट कोई नहीं है।

शुक्रानाः आप किसी का काम अपनी व्यस्तताओं के बीच भी समय निकालकर कर देते हैं उससे खुश होकर कोई भेंट दे जाए उसे शुक्राना कहते हैं। शुक्रिया सहित शुक्राना अर्पित करने से भी सम्बन्ध मधुर रहते हैं तथा दोबारा जाकर अपना कोई भी काम करवा सकते हैं। इस के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं। शुक्राना न देने पर दूसरी बार आपका काम साहब की व्यस्तताओं के बीच फंस सकता है जब तक आप शुक्राना अर्पित नहीं करते।

मेहनतानाः आप किसी का काम देर-सवेर कर रहे हैं। उसके बदले में खुश होकर जो भेंट अर्पित की जायेगी उसे मेहनताना कहते हैं। मेहनताना विभिन्न सरकारी कार्यालयों में अक्सर ठोक-बजाकर लिया जाता है। किसी अपरिचित व्यक्ति से काम निकलवाना हो तो उस का मेहनताना काम से पहले ही अर्पित किया जाना चाहिए। समय और धन की बचत होगी। मेहनताना न दिये जाने पर इसके भयंकर साइड-इफेक्ट झेलने पड़ते हैं। इसके बग़ैर दूसरी बार तो दूर, पहली बार भी अपना काम नहीं करवाया जा सकता।

हर्जानाः जो व्यक्ति नज़राना, शुक्राना, मेहनताना दिये बग़ैर किसी तरह से काम निकालकर ले जाये, यह अध्याय उनके लिये है। आप एक बार काम निकाल लेने के बाद जब दूसरी बार उस कार्यालय में संयोगवश जा फंसेंगे, तब आपको न चाहते हुए भी पिछले तीनों अध्यायों से गुज़रना पड़ेगा अन्यथा आपका काम कभी नहीं होगा। इस ‘कभी नहीं’ के चक्कर में आप जो भेंट न चाहते हुए भी मजबूरी में भेंट करेंगे उसे कहते हैं- हर्जाना। ‘सुविधाशुल्क चालीसा’ का यह चौथा अध्याय सम्पूर्ण रूप से साइड-इफेक्ट्स से भरा पड़ा है।

इस अध्याय से गुज़रने के बाद सिर्फ़ ‘न’ रह जाता है जिसका मतलब हर आदमी बड़े आराम से समझता है।

‘सुविधाशुल्क चालीसा’ द्वारा कोई भी काम आज असंभव नहीं है। चाहे मैच फिक्सिंग हो या फिर गेहूं घोटाला, यूरिया घोटाला, टेलकॉम घोटाला या बोफोर्स घोटाला – सब को टाला जा सकता है। तभी तो आज तक कोई भी आयोग या समिति अपनी सही रिपोर्ट आम जनता के सामने नहीं रख पाई। यह सब सुविधाशुल्क की ही महिमा है कि सब पर्दे के पीछे है। उन की सात पीढ़ियां भी सात समुन्दर पार मज़े करेंगी, आप भी कर सकते हैं, इस ‘सुविधाशुल्क चालीसा’ के गुण गाते जाइये और खाते जाइये बस खाते ही जाइये।

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