नए वर्ष का प्रवेश द्वार

 

-बलदेव राज भारतीय

समस्त जगत एक अबूझ, अनजानी और अंतहीन दौड़ में शामिल है। इस अबूझ दौड़ में उसे रोज़ एक नए दिन में प्रवेश करना पड़ता है। एक नया दिन, एक नया सप्ताह, एक नया महीना और एक नया साल। कुछ न कुछ उसके जीवन में नया होता ही रहता है। हर नई चीज़ की वह खुशी मनाता है। नए वर्ष को ही ले लीजिए। प्रत्येक व्यक्ति नए वर्ष का स्वागत पूरे धूम-धड़ाके से करता है। ऐसा नहीं कि मैं इसका स्वागत नहीं करता या मुझे इसके आने की खुशी नहीं होती। परंतु मुझे नव वर्ष और बीते हुए वर्ष में कभी कोई ख़़ास अंतर नज़र नहीं आया। मुझे कभी नहीं लगा कि एक वर्ष से दूसरे वर्ष में प्रवेश करते हुए कुछ अलग ही अनुभूति होती है। ख़ैर छोड़िए इस बात को, बात करते हैं बाईस दिसंबर की। उत्तरी गोलार्ध में यह सबसे छोटा दिन होता है। यही छोटा सा दिन इस तुच्छ प्राणी का जन्मदिन है। दो-चार लेखक मित्रों और साहित्य प्रेमी सज्जनों के साथ मिलकर घर पर ही मैं अपना जन्मदिन मना लेता हूं। दिन भर की व्यस्तता के कारण रात को नींद जल्दी ही अपनी आगोश में ले लेती है। अब की बार भी ऐसा ही हुआ। कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। मानसपटल पर दिन भर की बातें एक चलचित्र की भांति आ-जा रही थी। कुछ नई रचनाएं बार-बार दस्तक देती और लौट जाती। सपनों की श्वेत-श्याम दुनिया में एक बड़ा सा रंगीन द्वार नज़र आया। मैंने उस द्वार पर भारी भीड़ देखी। कौतूहलवश मेरे क़दम उसी ओर बढ़ गए। लोग उस बड़े से द्वार में घुसने के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे। द्वार पर लिखा था- नए वर्ष का प्रवेश द्वार। परंतु धक्कामुक्की करके भी कोई इस द्वार में प्रवेश नहीं कर पा रहा था। तभी एक बड़े काले रंग के हाथी पर सवार होकर एक मोटा व काला विशाल दानवाकार व्यक्ति वहां पहुंचा और द्वार से अंदर प्रवेश की कोशिश करने लगा। वहां खड़े द्वारपाल ने उसे रोका और उसका परिचय पूछा।

‘तुम मुझे नहीं जानते? मैं….भ्रष्टाचार, कलयुग ही है मेरा आधार। जब तक रहेगा कलयुग, तब तक रहेगा मेरा प्रसार। नहीं छीन सकता कोई मुझसे, अब मेरा अधिकार। जी हां, सबकी रग-रग में बस चुका, मैं हूं भ्रष्टाचार। नववर्ष में भी बढ़ेगा अभी मेरा परिवार। झट से खोलो द्वारपाल, मेरे लिए नववर्ष का द्वार।’ भ्रष्टाचार का परिचय पाते ही द्वारपाल की कंपकंपी सी छूट गई। उसने कांपते हाथों से नववर्ष के द्वार भ्रष्टाचार के लिए खोल दिए।

अभी भ्रष्टाचार ने द्वार में प्रवेश किया ही था कि भड़कीले कपड़े पहने, अपने चेहरे को गहरे रंग से पोते हुए एक नारी नववर्ष में प्रवेश पाने को आगे बढ़ी। द्वारपाल ने उसे रोका तो वह उस पर भड़कते हुए बोली, ‘नहीं जानते कि मैं कौन हूं? मैं हूं बेईमानी….आप सबकी जानी-पहचानी। भ्रष्टाचार अगर राजा है तो मैं हूं उसकी रानी। मेरे बिना अधूरी रहेगी सदा उसकी कहानी जाने दो मुझे अंदर, नहीं तो….। नहीं तो याद दिला दूंगी तुम्हें नानी।’ इतना सुनते ही द्वारपाल ने बेईमानी के लिए झट से द्वार खोल दिया। वह उससे कोई पंगा नहीं लेना चाहता था।

बेईमानी के अंदर जाते ही उसकी ओट में हिंसा, रिश्वत, सूदख़ोरी जैसी चार-पांच उसकी सखी-सहेलियां भी नववर्ष में प्रवेश कर गईं। द्वारपाल उनका परिचय पाने को उनका मुंह ताकता ही रह गया। तभी फटे-पुराने कपड़े पहने एक दीन-हीन नारी नववर्ष में प्रवेश पाने को आगे बढ़ी। उसकी हालत देखकर द्वारपाल को भी अपना रौब झाड़ने का अवसर मिला। वह इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। उसने उसे रोकते हुए टोका, ‘ए बुढ़िया! कौन हो तुम? कहां आगे बढ़ी चली जा रही हो? रुक जाओ, अपना परिचय दो।’

‘बेटा, तुम मुझे नहीं जानते?’

‘क्यों…? तुम क्या प्रधानमंत्री हो? या तुम्हारा परिचय तुम्हारे माथे पर चिपका है, जो मैं वहां से पढ़ लूंगा। पहेलियां न बुझा बुढ़िया। सीधे-सीधे बता कौन है तू?’

‘बेटा, मैं ईमानदारी हूं। मैं सत्य में निवास करती हूं और सत्य मुझमें। बिलकुल आत्मा और परमात्मा की तरह।’

‘देख बुढ़िया, मुझे तेरे प्रवचन तो सुनने नहीं। वैसे भी तू अब पुराने ज़माने की हो गई है। तेरा नए वर्ष में कोई काम तो है नहीं। फिर तुझे नववर्ष में क्यों प्रवेश दूं?’

‘अरे ओ… चौकीदार। आने दे, आने दे इसको, …. रोक मत। तू नहीं जानता, ईमानदारी ने नववर्ष में प्रवेश नहीं किया तो हम पर कौन विश्वास करेगा? हमारा वजूद ही समाप्त हो जाएगा। इस पूरे संसार में हमारा फीका पकवान ईमानदारी की ऊंची दुकान में रखकर ही बिकता है। जब दुकान ही नहीं होगी तो हमें कौन पूछेगा?’

‘मुझे समझ नहीं आता कि संसार में तुम ईमानदारी की सबसे बड़ी दुश्मन होकर भी इसे नववर्ष में प्रवेश क्यों दिला रही हो?’

‘तुम्हें इतनी समझ होती तो तुम द्वारपाल होते क्या?’

‘देखो बेईमानी रानी। तुम कुछ भी कहो मैं इसे अंदर नहीं जाने दूंगा। या तो अंदर तुम रह सकती हो या यह ईमानदारी। अब फैसला तुम्हें करना है।’ ‘अरे तू कौन हुआ इसको रोकने वाला? चल ईमानदारी बहन।’ इतने में एक विशाल काली सी दानवाकृति नववर्ष के द्वार की ओर बढ़ी।

‘अरे कौन हो तुम?’ द्वारपाल चिल्लाया। ‘मैं…? मैं हूं स्मॉग। धुंए और प्रदूषण की धुंध से मिलकर बना हूं मैं। तुम मुझे नववर्ष में प्रवेश करने से नहीं रोक सकते। मैं अंदर जा रहा हूं।’

‘अरे! तुम्हारा आकार तो काफी बड़ा है। तुम इसमें प्रवेश कैसे करोगे? यह द्वार तो छोटा पड़ जाएगा तुम्हारे लिए।’ द्वारपाल गिड़गिड़ाया। परंतु उसके कुछ कहने से पूर्व ही समॉग अंदर प्रवेश कर गया। उसकी दानव आकार से नववर्ष का द्वार चरमराकर टूट गया। मैंने अपने आपको चारपाई से नीचे लुढ़का पाया। वहां न नववर्ष का द्वार था और न ही द्वारपाल। जो कुछ मैंने देखा, वह मात्र एक सपना था। परंतु…..सच्चाई के बहुत क़रीब।

 

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