योजना एक सीरियल बनाने की

-बलदेव राज भारतीय

लिखे साहित्य को पढ़ने का समय ही किसके पास है? आजकल लोग अख़बार ख़रीदते हैं वो सिर्फ़ ये देखने के लिए कि इसमें उनका नाम कहां छपा है? साहित्य की पुस्तकों की बिक्री…? बस, बात ही न करें तो अच्छा है। प्रत्येक व्यक्ति समय की बचत चाहता है। वह तीन घंटे की फ़िल्म को भी आधे घण्टे में देखना चाहता है। टी. वी. धारावाहिक ही नॉन स्टॉप साहित्य परोसते जा रहे हैं। धारावाहिक के माध्यम से निर्माताओं ने लोगों को वह सब परोस दिया जो पचाने के आदी थे या नहीं थे। लोगों की पाचन शक्ति भी बढ़ गई। उन्होंने वह सब कुछ देखा जो उन्हें दिखाया गया।

अब लेखन में बचा ही क्या था? सो हमने भी एक टी. वी. चैनल के लिए धारावाहिक निर्माण की बात सोच ली। सोच ली तो कोई बुरा नहीं किया। सोचने में ख़र्च ही कितना होता है? मुसीबत यह थी कि धारावाहिक का नाम क्या रखा जाए?

मेरा एक मित्र है … बीरबल। अकबर के ज़माने का है। कुछ फ़िल्मों में भी काम किया है। उनमें से एक फ़िल्म तो ‘कालिया’ थी। जिसमें उसके नाम से सारा शहर कांपता था। गली में कुत्ते भौंकना बंद कर देते थे। दूसरी फ़िल्म थी पहलाज निहलानी की ‘आंखें’। इस फ़िल्म में उसने गोविन्दा (गौरीशंकर) के दोस्त ‘बिरजू’ का चरित्र निभाया था। मैंने उसके अनुभव का फ़ायदा उठाने के लिए उससे धारावाहिक के नाम के लिए सलाह लेने का निश्चय क्या किया … जोखिम उठा लिया।

मैं उसके डॉलीवुड स्थित निवास पर पहुंचा। उसे अपने मन की बात बताई और धारावाहिक के लिए कुछ नाम सुझाने को कहा। उसने बड़ी नम्रता से मुझे ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर तक देखा और कहा, ‘लगती तो नहीं पर हो भी सकती है।’

मैंने पूछा, “क्या लगती है और क्या हो सकती है?”

कहने लगा, “तुम्हारी उम्र साठ की लगती तो नहीं पर हो भी सकती है।”

“मैं और साठ साल का…? तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है। मैं स्कूल में तुम्हारा सहपाठी रहा हूं और तुम कह रहे हो मैं साठ साल का…।” मैंने कहा।

“भई, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? मैंने तो इसलिए कह दिया था कि आदमी अक्सर साठ साल की उम्र में ही सठियाता है।” उसने कहा।

“हां-हां, तुम तो चाहोगे ही कि मैं तरक्क़ी न करूं। सच क्यों नहीं कहते कि तुम मुझे देखकर जलते हो। इसलिए कोई नाम नहीं सुझाना चाहते।” मैंने कहा।

“अच्छा बोलो, कितने वाली सलाह चाहिए? दस हज़ार वाली, बीस हज़ार वाली, पचास हज़ार वाली या एक लाख वाली?” उसने पूछा।

“यह दस, बीस, पचास या एक लाख वाली मतलब?”

“मतलब साफ़ है दोस्त। मायानगरी में बिन माया के कोई काम नहीं होता। यहां सलाह चाहिए तो उसके भी पैसे लगेंगे।” उसने कहा।

“वाह मेरे दोस्त! खूब दोस्ती निभा रहे हो। नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी सलाह। मैं स्वयं ही कोई अच्छा-सा नाम तलाश लूंगा।”

“चलो, तुम्हारे लिए कुछ छूट दे दूंगा। तीनों नामों के साथ एक नाम फ्री बता दूंगा।”

“अरे, मैं तुम्हें अपना दोस्त मानकर जहां आया था। पर तुम तो निरे दौलत के पुजारी निकले। यदि पैसे देकर ही सलाह लेनी है तो तुमसे क्यों, किसी और से न ले लूंगा।”

“अरे भई, तुम नहीं जानते? जितनी कारगर मेरी सलाह रहती है उतनी किसी और की नहीं। एकता कपूर, अरुणा ईरानी, राकेश रोशन, अधिकारी ब्रदर्ज़ सभी मेरी सलाह लेकर दौलत में खेल रहे हैं। इसलिए तो मैंने अभिनय करना छोड़ यह ‘परामर्श केन्द्र’ खोल दिया है।”

“बहुत अच्छे बीरबल भाई! दिमाग़ तो आपने खूब पाया है। इसीलिए तो आपको अकबर के ज़माने का बीरबल कहा जाता है।”

“हां भैया! इस नेक काम की शुरुआत के लिए आपसे अच्छा ग्राहक कहां मिलेगा? इसीलिए आप बता दीजिए कि आपको कितने वाली सलाह चाहिए।”

“अच्छा भैया! तुम कहते हो तो बता ही दो, एक दस हज़ार वाली।”

“भई, तुम धारावाहिक बना रहे हो! … कहानी तो लगभग सभी धारावाहिकों की एक-सी होती है। फ़र्क़ सिर्फ़ नाम और कलाकारों का होता है।” यदि आपको अपना धारावाहिक ज़बरदस्त हिट कराना है तो उसका नाम रख लीजिए। “क्योंकि छाछ भी कभी दही थी।”

“यह भी कोई नाम हुआ। छाछ और दही के नाम से मैं निर्माता कम दूध वाला या हलवाई ज़्यादा लगूंगा। कोई अच्छा-सा नाम बता।” मैंने आग्रह किया।

“तो आप अपने सीरियल का नाम ‘देश में निकला होगा सूरज’ रख दीजिए। अरुणा ईरानी के चांद के मुक़ाबले सूरज नाम ज़्यादा चमकेगा।”

“चमकेगा नहीं तपेगा और मुझे बेहद गर्मी से झुलसाएगा भी। कोई और बताइए।”

“लो फिर ‘दर-दर की कहानी’ रख लीजिए और जो भी मन में आए परोसते चले जाइए। भावनाओं से खिलवाड़ करने के लिए इससे अच्छा कोई टाइटल नहीं हो सकता।”

“मुझे तुम्हारे द्वारा सुझाए गए नामों में से एक भी नाम पसंद नहीं आया। कोई ऐसा नाम बताओ जो पैरोडी गानों की तर्ज़ पर किसी धारावाहिक के नाम की पैरोडी न लगता हो? तुम तो अच्छे धारावाहिकों के नामों को तोड़-मरोड़कर मुझे परोस रहे हो।”

“तुम कैसे नाम चाहते हो? लगता है तुम्हें बिकाऊ नाम नहीं चाहिए। भैया तुम क्या जानो यहां क्या चलता है … ‘चला मुंगेरी सीरियल बनाने।’ लो बस एक नाम और बता देता हूं तुम्हें … कौन बनेगा उसका पति। अब निकालो तीस हज़ार।”

“अरे कैसे तीस हज़ार। तुम्हारा बताया एक भी नाम हमें पसन्द नहीं आया तो तीस हज़ार कैसे दे दें?”

“अरे सलाह तो सलाह है, पसन्द आए या न आए। पैसे तो तुम्हें देने ही पड़ेंगे।”

“कोई ज़बरदस्ती है यार। तुम्हें तुम्हारे धन्धे में क़ामयाबी मिले इसीलिए मैं भी तुम्हें एक बेश-क़ीमती सलाह दे देता हूं। भविष्य में परामर्श देने से पूर्व ही परामर्श शुल्क ले लिया करो बाद में कोई नहीं देगा।”

कहकर मैं वहां से उठकर चला आया। मुझे उसने चार-पांच नाम सुझा दिये वो भी फ्री। पांचवा नाम नहीं समझे आप- “चला मुंगेरी सीरियल बनाने।” मुझे उसके बताए ये सभी नाम पसंद आ गए थे। पर उसकी व्यापार-बुद्धि देखकर मुझे भी अपनी शराफ़त छोड़ उस जैसा ही बनना पड़ा। अब शीघ्र ही मैं एक कॉमेडी सीरियल का निर्माण करने जा रहा हूं- ‘क्योंकि छाछ भी कभी दही थी।’ इसके लिए मुझे कलाकार चाहिए। यदि आप में से कोई इस धारावाहिक में काम करना चाहता हो तो मुझे लिखें। पता वही पुराने वाला।”

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