सुंदरता या ग्लैमर बदले मायने

-ज्योति खरे

“राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला” – इस गीत के साथ जुड़े कृष्ण जी का अपनी माता से राधा की तरह गोरे होने की ज़िद्द करना या किसी फ़िल्मी पर्दे पर हीरो का हीरोइन को यह गाकर हिदायत देना “धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाए” या रास्ते में किसी सुंदर चेहरे को देखकर सहज आकर्षित होना आम-सी बात है।

आख़िर सौंदर्य में ऐसा क्या जादू है कि दुनिया का हर व्यक्ति चाहे सुंदर हो या न हो परंतु कल्पना करता है एक लुभावने चेहरे की। अतः सौंदर्य से जुड़े कई प्रश्न हमारे सामने उभर आते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण सिने अभिनेत्री माधुरी दीक्षित व मीनाक्षी शेषाद्रि हैं। माधुरी मुंबई विश्वविद्यालय से माइक्रो बॉयलोजी में शिक्षा ग्रहण कर रही थी कि एकाएक फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध को देख कर अपने महत्वपूर्ण कैरियर तक को त्याग दिया। यही हुआ दक्षिण भारत से आई मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ। ‘मिस इण्डिया’ बनने के बाद सब कुछ भूल कर फ़िल्मों में दौड़ी चली आई। यह तो वे लड़कियां हैं जिन्हें कुदरत ने खूबसूरत चेहरा दिया है जिससे प्रेरित होकर ये किसी की परवाह किए बिना ग्लैमर की दुनिया में आ जाती हैं। क्या यही निर्णय कोई साधारण शकल की लड़की ले सकती है? और यदि ले लेती है तो कहां तक सफल रहेगी?

इसी पहलू को जानने के लिए मेरी मुलाक़ात कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं से हुई। एक सुंदर छात्रा का कहना है, “मुझे इस बात का आभास है कि मैं सुंदर हूं, और हर सुंदर चीज़ मन को लुभाती है, पर यदि मेरे पास इतना सुंदर चेहरा है तो इस पर इतने सवाल क्यों?” मैं यह भी नहीं कहती कि साधारण लड़की कुछ नहीं कर सकती। ऐसे कई कार्य हैं जो मैं नहीं कर सकती। इसका तो मुझे कोई फ्रस्ट्रेशन नहीं है। अंग्रेज़ी साहित्य की छात्रा का कहना था कि भई, सुंदरता में ऐसी कोई ख़ास बात तो होगी ही जो कवियों ने इससे उत्साहित होकर ढेरों कविताएं लिख डालीं। रचना यादव विश्वविद्यालय के विज्ञान वर्ग की छात्रा को बेहद अफ़सोस है कि आज व्यक्तित्व की परिभाषा बदल चुकी है। फिर भी मेरा यह मतलब नहीं कि सुंदरता कोई ज़हर है। चेहरा व्यक्तित्व का आईना है। यदि कोई युवती क़रीने से कपड़े पहनती है, मृदुभाषी, सभ्य व शिष्ट है तो मैं उसे ही सुंदरता के दायरे में कहूंगी।

इसके विपरीत साधारण दिखने वाली लड़कियों के विचार एकदम भिन्न थे। एक लड़की का कहना था- “उसने हमेशा खुद को अपनी बहनों के सामने हीन ही समझा। जब कभी हम किसी के घर जाते थे तो मुझे लगता था कि वे कुछ मिनटों में ही लोगों का दिल जीत लेती थीं। कई बार तो मैंने लोगों को यह कहते सुना कि तुम और तुम्हारी बड़ी बहन इतनी अलग क्यों है। इस बात का मेरी शिक्षा व व्यवहार पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। मैं लोगों से कतराने लगी और पढ़ाई में दिन-प्रतिदिन पीछे होती गई। दूसरी लड़की का कहना था “बचपन से रिश्तेदारों का कहना था कि आपकी छोटी बेटी के रिश्ते में कोई परेशानी नहीं होगी पर… और यही हुआ भी। जो लड़का मुझे देखने आया वही छोटी बेटी को पसंद करके चला गया। इससे मेरे आत्मविश्वास को बेहद ठेस पहुंची। एक दिन गुस्से से मैंने अपनी भौंहें काट डालीं। अब बोल कर तो देखे कोई मुझे बदसूरत, “कहते हुए वह हंस दी।” इसी तरह अनेक युवतियों से बातचीत करने के बाद पाया कि महानगरों में पढ़ी-लिखी लड़कियां जिनका ऊंचा स्टेटस व अच्छी शक्ल-सूरत है, सुंदरता की परिभाषा को केवल मनोवैज्ञानिक ढंग से देखती हैं। शायद कहीं उन्हें इस बात पर आत्मविश्वास है कि वे सुंदर हैं। वे इस पूरी समस्या को साधारण समझ कर भूल सकती हैं, परंतु व्यावहारिक जीवन में क्या वे अपना स्टेटस गिरा पाएंगी। लड़कियों पर होते अत्याचार देखकर सबको बुरा लगता है परंतु यदि लड़की सुंदर है तो अकसर सुनने में आता है कि बेचारी इतनी सुंदर लड़की थी ऐसा क्यों हुआ उसके साथ।

कई बुद्धिजीवियों का मानना है सौंदर्य का क्षेत्र इतना संकुचित नहीं। यदि महिला देखने में सुंदर है किन्तु पढ़ी-लिखी न हो तो वह सुंदरता फीकी पड़ जाती है। सुंदरता तो देश-प्रदेश के साथ अपनी परिभाषा बदलती रहती है। भारतीय समाज चाहकर भी अश्वेतों को सुंदर नहीं मान सकता। यदि बात इतनी सरल होती तो विवाह के बाज़ार में पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ भिन्न-भिन्न आकार प्रकार की लड़की की इच्छा न की जाती। यदि पुराने ज़माने की ओर नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि उस समय यह सब इतना आवश्यक न था। आज भी कई ऐसे वृद्ध जोड़े देखने में आते हैं जिनमें काफ़ी असमानता पाई जाती है। परंतु आज के युवा में ये बातें मुश्किल से देखने में आती हैं। शादी देखभाल कर की जाती है किन्तु फिर भी बेचारों में मेल नहीं जबकि पुराने समय की अशिक्षित महिला अपना वैवाहिक जीवन कितनेे सुखमय व शांतिपूर्ण ढंग से बिता लेती थीं, बावजूद इसके कि उसका विवाह बिना उसकी स्वीकृति के किया जाता था तथा वह परिपक्व भी नहीं होती थी। क्या मैं सुंदर हूं? आज यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि लड़के व लड़कियां अपने जीवन साथी का चुनाव कई बार इसी दृष्टि से करते हैं।

ऐसी अनेक सौंदर्य प्रतियोगिताएं हैं जिसमें भाग लेने के लिए अनेक सुंदरियां आती हैं। सोचिए क्या इतनी ज़रूरी होती हैं ये प्रतियोगिताएं कि सरकार इनके आयोजनों में लाखों रुपए लगा देती हैं। ऐसी कितनी लड़कियां हैं जो इन प्रतियोगिताओं में ग़रीब परिवारों से आती हैं। समय के साथ इस तरह के शौक़ अमीर परिवारों का ‘क्रेज़’ बन चुका है। जहां कुछ ही घंटों में एक “मिस इंडिया” या “मिस वर्ल्ड” समाज व अपने बीच में एक गहरी खाई बना देता है। यह प्रश्न विवाद का नहीं संवेदनाओं का है।

इस बारे में एक मनोवैज्ञानिक का कहना है कि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो नैन-नक्ष आदमी की अपनी या ईश्वर की बनाई संपत्ति नहीं। यदि कोई कहता है कि सुंदरता में ऐसी कोई ख़ास बात ही है जिससे उत्साहित होकर कवियों ने अनेक कविताएं लिख डालीं तो शायद एक सच यह भी  है कि जब कवि सौंदर्य के पुल बांध कर थक गया तो उसकी क़लम ने अपने आसपास में हो रहे शोषण, अत्याचार के ऊपर भी लिखा। कोई चीज़ सुंदर तभी तक है जब तक आप उसे महसूस कर सकें। सुंदरता अपने में कोई हथियार नहीं। यदि ऐसा ही मानना है तो क्यों नहीं लोग गांव की सुंदर लड़की से ब्याह रचा लेते हैं। आज भाग-दौड़ की ज़िंदगी में लोग इस क़द्र फंस चुके हैं कि शायद ही किसी के पास इतना समय हो कि दो मिनट विचार कर सके कि मैं चाहता क्या हूं। ठीक उसी तरह जिस तरह लोग चॉकलेट खाते हैं क्योंकि वह अच्छी है, खाने में और उसकी पैकिंग बढ़िया होती है। यदि उससे अच्छे स्तर की चॉकलेट अख़बार में पैक कर के दे दी जाएं तो शायद कोई उसे देखे तक न। देखना तो दूर कोई यह भी विचार नहीं करेगा कि एक बार खोल कर तो देख लूं कैसी है। आज वही आडम्बर इतना बढ़ चुका है कि आधी जनता शायद कोई काम इसलिए करती है क्योंकि क्रेज़ है, फ़ैशन है। शायद सुंदरता से जुड़ा ग्लैमर भी इसी क्रेज़ का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोग कहते हैं, हमें हीनता का अनुभव होता है, आख़िर हीनता किस बात की। दुनिया में ऐसा कौन नहीं जो पूर्ण न हो। पर आत्मविश्वास होना चाहिए।

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