महिला सशक्तिकरण

महिला सशक्तिकरण में अविवाहित महिलाओं की अहम भूमिका

यह अहिंसावादी आन्दोलन है जो पुरुष वर्ग को झिंझोड़ देगा। सोचने पर मजबूर कर देगा कि नारी की इस प्रतिक्रिया के पीछे छिपा मन्तव्य क्या है।

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आत्मसम्मान ही सम्मान का पर्याय है

–संजीव चौहान आज की नारी के सामने पुरुष से बराबरी का अधिकार, पुरुष प्रधान समाज द्वारा दमनकारी नीतियों का कार्यान्वयन, सम्मान आदि प्रश्न मुंह उठाए खड़े हैं। क्या समाधान है इनका? क्या नारी बिना किसी वाद-विवाद के अपना उचित स्थान क़ायम कर सकती है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो ……. आज के युग में नारी को स्वयं ...

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नारी कल्याण में भ्रमण की भूमिका

चौका, चूल्हा, चारदीवारी! ‘च’ की इस परिधि में महिला को युगों-युगों से क़ैद रखा गया, जिससे वह ‘कुएं के मेंढक’ की तरह अपने घर को ही सब कुछ मानकर उसके प्रति समर्पित रही है, भले ही उसके इस समर्पण के बदले में उसे दुत्कार, प्रताड़ना और शारीरिक शोषण सहन करना पड़ता हो। इस परिधि में रहते हुए स्त्री की स्थिति ...

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अकेले हैं तो क्या गम है

-माधवी रंजना बदलते समाज में कई तरह की पुरानी मान्यताएं टूट रही हैं। किसी ज़माने में औरत को हमेशा किसी पुरुष के साथ ही संरक्षण की ज़रूरत होती थी। अब वह ज़माना नहीं रहा। इक्कीसवीं सदी में नारी की छवि मज़बूत होकर उभरी है। रोज़गार के कई नए क्षेत्रों में प्रवेश ने उसके आत्मसम्मान को बढ़ाया है। ऐसे में समाज ...

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ख़ाबों की तसवीर

जो रात को सोते में देखते हो तुम, उन सपनों के कोई मायने ही नहीं होते। सपने तो दरअसल वो होते हैं जो सोने नहीं देते तुमको। सभी के सपने सच नहीं होते पर फिर भी सभी सपने सजाते तो ज़रूर हैं। अपनी हसरतों के, अपनी आकांक्षाओं के, अपनी मुरादों के सपने। यह सपने ही तो हैं जो जीने की ...

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नहीं अब और नहीं

चलना है इसलिए चल दिए हैं, उठना है इसलिए उठ पड़े हैं। यूं बेमक़सद-सा चलते जाना क्‍यूं ज़िन्दगी का दस्तूर हुआ। आशा से भरी निगाहें लिए मन में ढेरों सपने सजाए कब से चल रहे हैं पल भर पलट कर देखें, सोचें क्या बदला, क्या पाया। उम्मीद के उस छोर से हम कितनी दूर। आशा थी हमें कि औरत को ...

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उड़ान के लिए फड़फड़ाते पंख

   अरमां मचले तो थे तड़प कर रह गए।    होंठ हिले तो थे पर  शब्द दम तोड़ गए। वो तड़पती हुई मुसकराती गई पर उफ़ न की –    वह औरत थी। इज़्ज़त का सवाल है।  दोनों कुलों की लाज है वो। बदनामी होगी…. श……..श……… ये फ़र्ज़ हैं तेरे, ये कर्त्तव्य हैं तेरे। औरत मां है, बेटी है, बीवी है। ...

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बदलते मौसम

परिवर्तन संसार की रीत है। इतिहास साक्षी है जब-जब भी परिवर्तन हुए हैं इनके आगे रुकावटें भी आती रही हैं, तोहमतें भी लगती रही हैं पर परिवर्तन तो हो कर ही रहे हैं। कोई खोज अंतिम नहीं, कोई सच अंतिम नहीं। प्रयत्न भी होते रहेंगे, परिवर्तन भी होते रहेंगे। थके-हारे व्यक्ति ही पुराने विचारों के साथ जुड़े रहते हैं। कमज़ोर ...

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टूटती ज़ंजीरें

जो लिखा है वही होना है तो फिर किस बात का रोना है। क़िस्मत का रोना कमज़ोर आदमी की अलामतें हैं। यदि उस लिखने वाले के ज़िम्मेे ही सब कुछ छोड़ दिया जाए तो हमारे करने को तो कुछ बचेगा ही नहीं। तदबीर से तक़दीर बनती है हमेशा, इक बार आगे तो बढ़ के देख। आज़मा ले इक बार अपने ...

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