• ज़िम्मेदारियां, फ़र्ज़ जैसे बहुत शब्द सुनते रहे हैं अपने हिस्से के सभी फ़र्ज़ सदा निभाते रहे हैं। अब हम अपने हक़ों की बात करेंगे। जो हक़ हैं हमारे वो ले के रहेंगे।

  • अहसासों को अंजुली में भरकर रखा नहीं जाता ये तो पल-प्रतिपल बदल जाते हैं। ये अहसास, ये भावनाएं हाथ से रेत की मानिंद फिसलते हैं तो रोक लेने होते हैं यह सदा के लिए। क़ैद करना होता है इनको इन कोरे काग़ज़ों पर।

  • साहित्यकार के ख़्वाब ने, सत्य के प्रति निष्ठा ने आने वाले पड़ावों को विजय करते हुए भविष्य के स्वप्न-संसार को साकार करना है। हम इस दुनिया में सपने देखने और सोते रहने के लिए नहीं आए। जो भी होता है, उसे यूं ही नहीं होते रहने देना। कठोर परिश्रम से नए आयाम बनाने हैं। हमें अभी लम्बा संघर्ष करना है।

  • मनुष्य बना ही है संघर्ष करने के लिए। संघर्ष न करे तो जीवन बोझिल हो जाए। कभी भी ज़िंदगी के सुख, खुशियां परोस के नहीं मिल सकते। इन के लिए खुद संघर्ष करना पड़ता है। कोई दूसरा हमारे अधिकारों के लिए संघर्ष क्यूं करे।

  • “खुद को अफ़साना बना, आंच में तपा, खुद तरस के देख, तड़प के देख। यूं किसी के नग़मे चुराए नहीं जाते यूं किसी के नग़मे गुनगुनाए नहीं जाते। ज़िन्दगी गुज़ार न, जी के देख।’’

  • हमारे ख़ाबों में हैं बेटियों के जन्म के जश्‍न की तसवीर, बेटियों की खिलखिलाहट, उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति। आज़ाद देश की आज़ाद फिज़ा में बेटियों की आज़ाद सांसें। उन्नति के मार्ग पर पांव बढ़ाती ऐसी बेटी की तसवीर जिसकी ज़िंदगी खुद उसकी अपनी हो, जिसकी राहें उसकी अपनी हों और जिसका हर सपना, हर ख़ाब उसका अपना हो।

  • ऐसा नहीं है कि रुकावटों से बच निकलने के रास्ते नहीं होते लेकिन यदि सभी हिफ़ाज़त भरे रास्तों पर ही चल पड़ें तो इन रुकावटों को हटाएगा कौन? आख़िर किसी न किसी को तो नए रास्तों की तलाश करनी ही होगी।

  • सदियों से अपने महान होने का बोझ ढोया है औरत ने। लेकिन अब वो देवी नहीं इन्सान बनना चाहती है। वो भी अपने अधिकार मांगने लगी है। कांटों भरी डगर है, लम्बा बहुत सफ़र है, फिर भी चलना होगा।‍

अजन्मी लड़की की पीड़ा

जन्मने से पूर्व ही
मुझे मत मारो
न बजाओ शगुनी थाली
न गाओ मंगल गीत
न मनाओ जश्न बेशक
मेरे जन्मने का
पर आंखें खोलने से पूर्व ही

नारी

न पूज्य बनो न पुजारी हो तुम
नारी ही रहो, बस नारी हो तुम।
सजधज न कुन्तल बिखराओ
यह नयन चपल
मत मटकाओ।
फ़ैशन की होड़ को रोको तुम
इस अंधी दौड़ को रोको तुम।

चेहरे पर असमय आती झुर्रियां

झुर्रियां उभर आना प्राकृतिक क्रिया है और इसे पूर्णरूपेण रोका भी नहीं जा सकता है लेकिन सौंदर्य उपचार को अपनाकर इसकी रफ़्तार को कम किया जा सकता है

सिलसिला

कितनी बार टूटकर
बिखरते हैं हम
कितनी बार बिखर कर
सिमटते हैं हम
कि ये सिलसिला
एक दिन नहीं
दो दिन नहीं
ताउम्र चलता है

तेरा चेहरा

दिल लुभाता है,
बड़ा भाता है
तेरा चेहरा।
दिल में समाया है,
समाया ही जाता है
तेरा चेहरा।

सही समय पर करें कैरियर का चुनाव

कैरियर का मुद्दा सीधे जीवन से जुड़ा है। अगर आप अपनी रुचि का ही कैरियर बनाते हैं तो आपका काम में मन लगेगा साथ ही आप उस क्षेत्र में बेहतर प्रगति कर सकते हैं।

युवाओं में आकर्षण का केन्द्र बनी आधुनिकता

क्या है आधुनिकता? जो युवाओं को आकर्षित करती है। आधुनिकता विभिन्न प्रकारों की होती है जैसे- आधुनिक व्यवहार, आधुनिक विचार, आधुनिक जीवन शैली, आदि।

लड़का ही क्यों लड़की क्यों नहीं

हमारे संविधान में सभी को चाहे वह लड़का है या लड़की, स्त्री है या पुरुष एक जैसे अधिकार तथा हक़ दिए हैं। लेकिन हम यदि अपने अंदर झांक कर देखें

एक बार और

इसने कहा कि तुम सिर्फ़ बीवी बनकर रह गई हो इसीलिए सब गड़बड़ है। बस, फिर मैंने अपने आप को तोला तो मुझे लगा कि बात सही है। तब से मैंने अपने आपको बदलना शुरू कर दिया।

गीले दस्ताने

एक आशंका और बलवती होती गई कि … कहीं हरेश के साथ ही तो हादसा…? थोड़ी ही देर में मेरा अनुमान वास्तविकता में बदल गया जब परेश के बाऊजी ने हौले से मुझे पूछा

अब तू डट जा नारी

द्रौपदी के बदले हुए तेवरों में ललकार थी, चुनौती थी, एक भयंकर गर्जना थी जो सिंहनी की भांति गर्ज उठी, “वह अपने बालों को गांठ नहीं लगायेगी

लफ़्जे ब्यां

एक भौंरा गुलबदन को
चूम कर फिर उड़ गया।
एक भौंरा था जो ज़िद्दी
गुलबदन पर अड़ गया।।
हम भला रोने लगे क्यों
इक मुसाफिर था गया।
वो तो झोंका था हवा का
आंख में कुछ पड़ गया।।

कबाड़ उठाती लड़कियां

पांच छ जन के
समूह मेें
जा रही हैैं वे लड़कियां
राष्ट्रीय राजमार्ग के एक ओर
रंग बिरंगे पुराने से
कपड़े पहने

क़लम की व्यथा कलम की ज़ुबानी

मैं कल तक इसी मनुष्य की उंगलियों की गु़लाम थी। इसी के ईशारों पर नाचती रही। अतः जैसा यह नचाता रहा, वैसे मैं नाचती रही।

गणेश न मिले रे पूजन को गणेश

‘गणेश जी। आप यहाँ। मैं आप को मारा-मारा फिरता हुआ कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ रहा था। कम से कम मन्दिर में तो रहा करो नाथ।‘मन्दिर में? तुम रहने दो तब न।’



कुछ फ़र्ज़
कुछ ज़िम्मेवारियां
कुर्बानियां, समर्पण, Adjustments
यही सब ?
नहीं.........
कुछ और भी तो है
जो अपनी बेटियों को बताना है।

हक
अधिकार




महिला के अस्तित्त्व को लेकर
चिंतित हुई है स्वयं महिला।
उसने जाना है अपने महत्‍व को।
अहसास कराया है अपने होने का।
मोहताज हुआ है मर्द, उसकी उपस्थिति का।
उस बिन विश्‍व बाज़ार का व्यापार अधूरा है
उसके होने से ही प्रकृति का सृष्‍टि चक्र पूरा है।








जब किसी शख्‍़स का कद बढ़ता है
तो तारीख़ उसके हाथ में आ जाती है।
जब दुनियां में वो
अपनी अलग पहचान बना पाता है तो
शख्‍़स नहीं शख्सियत हो जाता है।



आधुनिक युग की नई नारी
बदली नारी का बढ़ता हुआ कद
नया ज़माना
नया संघर्ष
कुछ संभावनाएं, कुछ दुविधाएं
कुछ अनसुलझे सवाल
कुछ उलझे हुए जवाब

गौरतलब हैं नारी समस्याएं



महिला स्वयं में शक्तिपुंज है, पर उसे चाहिए संविधान में मिले अधिकारों का ज्ञान। उसे चाहिए उसकी योग्यता का सम्मान | मर्द के बराबर स्थान, उसकी हर ज़रूरत पर ध्यान देना होगा। तभी समाज का कल्याण संभव है।

कुछ बातें महिला सशक्तिकरण के बारे में





दया, ममता, त्या‍ग ही नहीं
साहस भी है, हिम्म्त भी है।
सीता ही नहीं रणचण्डी भी है।

चिन्तनीय ही नहीं
चर्चा के योग्य भी है
आज शक्तिस्वरूप महिला



लेखक धरती पर प्रकाश सतम्भ,
जो खराब से खराब मौसम में भी
बुझते नहीं, धुंधलाते नहीं,
खुद को जला कर रोशनी करते,
अंधेरे मिटाते, नई राह दिखाते,
उन्नति के शिखर पर ले जाते।




अक्षरों की दुनियां,
अलफाज़ों की दुनियां,
पढ़ने पढ़ाने के रिवाज़ों की दुनियां
आज इन्टरनेट युग में पढ़ने के रिवाज़ न छूटें इसलिए आईए आपका पुस्तकों से तारूफ कराएं।


शब्द मटक मटक चलें तो कहानी,
नृत्य करें तो कविता,
शब्द तीर कमान बनें तो व्यंग्य,
शब्द बिहारी के सतसयै तो लघुकथा
अपने दर्द के आईने से
सारे जहां की पीड़ा का अवलोकन
समूची मानवता का दर्पण
समाज से पाया समाज को अर्पण।




“Feminism has fought no wars. It has killed no opponents. It has set up no cent ration camps, staved no enemies, practiced no cruelties. Its battles have been for education, for the vote, for better working conditions…..for safety on the streets… for child care, for social welfare …..for rape crisis centers, women`s refuges, reforms in the laws. If someone says `Oh, I`m not a feminist, “ I ask ‘why? What`s your problem?’—Dale Spender



कोई कहे सुख का आधार, कोई माने दु:ख का अम्बार बेशक मिलते लाखों दंश इस से बढ़ता हमारा वंश, रिश्तों के धागे में बंधे, एक दूसरे के दु:ख सुख में रमे, बढ़ता जाए यह काफिला। बना रहे स्नेह सम्बन्ध। फैलती रहे नेह सुगंध।



अमूल्य शब्दों के खज़ाने जो कुदरत के शाश्‍वत मूल्य, कुदरत के रहस्य, कुदरत के सिद्धान्त, कुदरत के नियम समझें और समझायें उन नियमों पर चलना सिखाए उन के अर्थ समझाएं जीवन के दर्शन कराए जीवन को सफल बनाए। आप के लिए चुन के लाए।








जीवन रूपी रथ के सारथी की मुख्य भूमिका निभाने वाले युगल वास्तविक ज़िन्दगी में दु:ख, सुख भोगते हुए- कितने ही कवियों की कविता में,
कितने ही लेखकों की कहानियों में
स्वयं उतर आते हैं।

कुछ कही कुछ अनकही
युगलों की कहानी----



पांच दरियाओं की धरती,
पांच दरियाओं का आब,
जहां कुदरत करे कमाल,
गिद्धे भंगड़े की धमाल,
पग-पग बिखरे रंगे जमाल,
सुनहरी कनके, सतरंगी पींघें,
इस धरती के जाये-जहां जाएं छा जाएं।
जिसका जग में नहीं जवाब-
उस धरती का नाम है- पंजाब....




भागमभाग, दौड़धूप, दु:ख तकलीफ
से चुराएं कुछ पल,
कुछ गुनगुनाएं, थिरकें,
सब कुछ भूल कर अपने में खो जाएं।
जीवन के चुनिंदा पलों में पर्व मनाएं,
उत्सव को कुछ यूं मनाएं- जीवन उत्सव हो जाए।
जीवन की सारी कड़वाहत भूल जाएं।





प्यार को वात्सल्य, इश्क, इबादत, स्नेह, मुहब्बत न जाने कितने नामों से जाना जाता है। प्रेम के जितने नाम हैं उतने ही रूप हैं। पर जो रूप सर्वमान्य है वो है पवित्र प्रेम जिसे इबादत का नाम दिया जाता है। पर आज इसके मायने बदल रहे हैं, आज पवित्रता आहत है। प्यार अपने साथ प्रश्‍न चिन्ह लिए खड़ा है।
क्या हैं ..... आज प्रेम के मायने.....???




जीवन के नियम
मनुष्य के कर्त्तव्‍य
पहले जानो- फिर पहचानो
फिर अपनाओ
कर्म योगी बन जाओ
गुरू की शिक्षा-दीक्षा लेकर
जन्म जन्म से मुक्‍त‍ि पाओ।
प्रभु को जानो- प्रभु के हो जाओ।




आज भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में रिश्ते अपने मायने खोते जा रहे हैं, अपनी मासूमियत खोते जा रहे हैं। आओ फिर से नए रास्ते तलाश करें। अखलाक की ज़मीं पर पावन, विश्‍वसनीय रिश्ते बनाएं


मुहब्बत के नए फूल खिलाएं
प्यार के दीप जलाएं....




युवावस्था की दस्तक
नए स्वपन, नई अंगड़ाइयां
तमाम रोकों, तमाम बंदिशों के साथ
अकांक्षाओं, अपेक्षाओं भरा सुहाना सफ़र

Our growing children-Teenagers




वक्‍़त के साथ दिन रात बदलते हैं,
मौसम बदलते हैं,
तन बदलते हैं, मन बदलते हैं।
जो वक्‍़त के साथ नहीं बदला
समझो वह इस दौर से पिछड़ गया,
और जो समझदारी के साथ
नहीं बदला वह भटक गया।

बदलाव की कहानी शब्दों की ज़ुबानी।








उपेक्षित महसूस करती बुज़ुर्ग पीढ़ी
हस्तक्षेप से हताहत नई पीढ़ी
तालमेल की कमी
Generation Gap

आज तेज़ रफ़तार ज़िन्दगी में बेहद व्यथित एवं असमंजस की स्थिति में हैं हमारे घर का आधार-हमारे बुजुर्ग।

प्रश्न कई हैं .....???




हर इंसान समान नहीं
सभी महिलाएं समान नहीं
सभी पुरुष व्यभचारी नहीं
बदले समय में बदलने के बावजूद
औरतों के लिए सहयोगी रवैये के बावजूद
पुरुष शंकाओं से मुक्त क्यों नहीं ?

पुरुष समस्याएं गौण क्यूं ?
कुछ सवाल, कुछ शिकायतें..........





भ्रष्टाचारी, बेरोजगारी,बाल मज़दूरी वेश्यावृत्ति, कन्या भ्रूण हत्या, मज़दूरों का, गरीबों का शोषण, लड़कियों से छेड़छाड़, बलात्कार, बढ़ती नशे की लत, प्रदूषण, बाबाओं का जाल, दहेज, लिंगभेद, जात-पात, कट्टरवाद, आतंकवाद--
मेरा हिन्दोस्तान आज इतना बीमार क्यूं है ?
मेरा हिन्दोस्तान आज इतना लाचार क्यूं है ?




बच्चे प्रत्येक देश का उज्जवल भविष्य होते हैं। यह बच्चे उस सारथी के समान होते हैं। जिन्होंने देश रूपी रथ को सही दिशा में अग्रसर करना होता है। परन्तु आज इस देश का भविष्य स्वयं शोषित हो रहा है भटक रहा है, पशोपेश में है।

आज चिन्तनीय है- बाल्यवस्था।



कोई बात जो होंठों में दबी रह गई, कोई अफसाना जो सुनाया न गया
एक कहानी जो दास्तां न बन पाई
कुछ कहना था पर कह नहीं पाए
या शायद वो सुन नहीं पाए
कितने ही अफसाने हैं जो सुनने हैं सुनाने हैं।