-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

ज़मीन में ज़हर, आसमान में ज़हर, हवा में ज़हर, पानी में ज़हर, खाद्य पदार्थों में ज़हर, पौधों में ज़हर, दवाइयों में ज़हर जो हम निगल रहे हैं, उससे हम कितनी देर जीवित रह सकते हैं। रातों-रात अमीर बनने की लालसा में हम भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का अधिक से अधिक प्रयोग करके धरती को विषैला बना रहे हैं। उससे उपजी फसल अनाज के रूप में जब हम ग्रहण करते हैं तो रासायनिक खादों के अंश हमारे अन्दर प्रवेश कर जाते हैं। हम कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। ज़हरीला चारा पशुओं की ज़िन्दगी को भी नुक़्सान पहुंचाता है। पशु मर रहे हैं, जानवर मर रहे हैं, मनुष्य तड़प रहे हैं परन्तु मानवीय बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। भूमि निर्वाह के लिये उपज तो देती है परन्तु ज़्यादा फसल प्राप्त करने के प्रलोभन में उसकी शक्ति जो उसका उपजाऊ सामर्थ्य है वो क्षीण कर दिया है। फलों और सब्ज़ियों को टीके लगाकर रातों-रात तैयार किया जाता है। केले और सेब को ज़हरीले द्रव्यों से धोकर पकाया जाता है। वही फल जब हम खाते हैं तो बीमारी का शिकार हो जाते हैं। बनावटी दूध, मक्खन, घी, दही की भरमार है। जो दूध हम पीते हैं वह ज़हरीला होता है। बच्चे-बूढ़े तो क्या जवान भी उसके सेवन से बीमार हो जाते हैं। बनावटी मिठाइयां, बनावटी मैगी, बनावटी पेय, कोका-कोला, फैंटा, लेमन, नींबू पानी तक बनावटी है। अब क्या बाकी रहा है आज तो मानव पैसे के लिए मौत बांट रहा है।

जहां तक औषधियों और दवाइयों का प्रश्न है कारखानों में धड़ाधड नकली दवाइयां बन रही हैं। बीमार व्यक्ति जब इनका सेवन करता है तो आराम कहां आता है। इस तरह हालात और भी बदतर हो जाता है। नदियों, नलकूपों, जलाशयों को हम खुद गन्दा कर रहे हैं। कूड़ा-करकट और गन्दगी उसमें डालकर पानी को ज़हरीला बना रहे हैं। दूषित पानी जब हम पीते हैं तो कई प्रकार के रोगों के कीटाणु हमारे अन्दर प्रवेश कर जाते हैं। दूषित पानी हमारी सेहत को ख़राब करता है, पेट के रोगों को बढ़ावा देता है। हम वनस्पति को काट कर शुद्ध हवा से वंचित हो गये हैं। जो पौधे हमें बहुमूल्य औषधियां देते हैं जैसे जामुन, पीपल, आंवला, नींबू, अनार आदि हमने उन्हें काटकर बर्बादी की कुल्हाड़ी खुद ही अपने पैरों पर मार ली है। तुलसी के स्थान पर हम कैक्टस और कांटेदार झाड़ियां गमलों में उगाते हैं। फूलों, उपवनों और बग़ीचों की सुन्दरता नष्ट कर दी है। दुधारू पशुओं को नशे के टीके लगाते हैं ताकि दूध की मिक़दार बढ़ जाए। पशुओं की ज़िन्दगी से तो इस प्रकार हम खिलवाड़ करते ही हैं मनुष्य मात्र को भी मौत केे फंदे में डाल देते हैं। मरी हुई मुर्गियां-मुर्गे होटल में परोसे जाते हैं, यहीं बस नहीं हम और भी क्या-क्या नहीं करते हम? धन कमाने केे लिए कुत्ते-बिल्लों का मीट भी होटलों में पकाकर ग्राहकों को दे देते हैं।

इससे बढ़कर हम तो हवा को भी ज़हरीला बना रहे हैं। इस विषैली कार्बन डाइऑक्साइड, निकोटीन भरी हवा में जब हम सांस लेते हैं, तो हम बीमारियों से कैसेे बच जाएंगे। कारखानों के काले धुएं के कारण ओज़ोन की पट्टी पतली हो रही है, जिसके कारण विषैली किरणें धरती पर पहुंच कर मनुष्यों, पशुओं और जानवरों को क्षति पहुंचा रही हैं। कैंसर और चमड़ी के रोगों को आमन्त्रण दे रही हैं।

घर में ज़हर, वातावरण में ज़हर, प्रकृति में ज़हर, मानव जाति को नष्ट नहीं करेगा तो क्या जीवन का वरदान देगा। नशे के आदी युवक-युवतियां ज़हर को निगल कर अपना जीवन तो समाप्त कर ही रहे हैं, माता-पिता को भी अन्धे कुएं में धकेल रहे हैं। स्थान-स्थान पर कूड़े के ढेर लगाकर मच्छर, मक्खियों और बीमारी के कीटाणुओं को फलने-फूलने का अवसर दे रहे हैं। डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों को हम खुद पैदा कर रहे हैं। आटे में मिलावट, दालों में मिलावट, चावलों में मिलावट, हल्दी, मिर्चों और गर्म मसालों में मिलावट का ज़हर हम अपने प्रतिदिन के सेवन में प्रयोग कर रहे हैं। नशे के लिए ज़हरीली शराब के साथ कितनी ज़िन्दगियां समाप्त हुई। अख़बार और टी.वी. चैनलों पर हम सुनते रहते हैं।

नशे के कारण जघन्य अपराध रेप, अपहरण, चोरी, डाके पड़ रहे हैं। फिर भी कुछ लोग इस ज़हर को निगल रहे हैं। दो नम्बर का धन्धा करने वालों में प्रशासन और पुलिस का साथ है इसलिए वे बाज़ार में ज़हरीली वस्तुएं बेच रहे हैं।

इस विकट समस्या का समाधान तो है लेकिन यदि प्रशासन सख़्त कानून बनाए। ज़हरीली वस्तुएं और पदार्थों को बेचने वालों को कानून के शिकंजे में जकड़े। नशाबन्दी करे तथा तस्करों को पकड़ कर जेल में डालें।

हमें खुद भी बाज़ारी खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज़ करना चाहिए। ‘थाली में ज़हर, चाय की प्याली में ज़हर।’ इस सब से बचना चाहिए। समाज सेवी संस्थाएं लोगों को जागृत करें, स्वच्छता पर ज़ोर दें तथा परोपकार की भावना पैदा करें। मानवता की भलाई के लिए अच्छे शिवर लगा कर लोगों को हवा-पानी के प्रदूषण के बारे में जानकारी दें।

हम अच्छे साहित्य पढ़ें। उन महापुरुषों, योगियों, ऋषियों और समाज सुधारकों का अनुसरण करें जो प्रकृति और जन कल्यण के अग्रदूत थे। हम आत्म चिन्तन और आत्म मंथन करें कि धन कमाने की भूख में जन जीवन की मर्यादा का उल्लंघन न करें। अपनी लालच भरी सोच और मानसिकता को जड़ से उखाड़ दें।

One comment

  1. I precisely had to appreciate you once more. I do not know the things I could possibly have gone through in the absence of the actual suggestions documented by you about my question. Previously it was the challenging scenario in my circumstances, nevertheless finding out the skilled fashion you handled that made me to cry over delight. Extremely happy for your guidance and as well , wish you recognize what an amazing job you were accomplishing teaching people today all through your web blog. I am certain you haven’t got to know any of us.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*