-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

किसानों की समस्याएं:-  वैसे तो पूरा भारत ही विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। परन्तु पंजाब का निवासी होने के कारण मैं पूरे भारत की बजाए अपने पंजाब की समस्याओं पर ही केन्द्रित रहूंगा। पंजाब जो कभी खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक था। जिसके बारे में किसी पंजाबी शायर ने कहा था:-

सोहने फूलां विचों फूल गुलाब नी सइयाे, सोहने देसां विचों देस पंजाब नी सइयाेे

इसका भावार्थ यह था कि पंजाब सारे भारत के प्रान्तों में सर्वोपरि था। इसके बाग़-बग़ीचों में बहारें थी। फल और सब्ज़ियों का भण्डार था। इसके अन्न-भण्डार के कारण दूसरे राज्यों को अनाज, दालें और गन्ना निर्यात होता था। इसकी अमृत बांटती नदियां लहलहाती हरी फसलों को सींचती थी। पंजाब की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण यह भारत का सरताज कहलाता था। पंजाब के वीर योद्धे, ऋषि-मुनि, नानक, कबीर, रविदास अपनी ईश्वरीय सत्ता के नज़दीक माने जाते हैं। पंजाब से ही हरी क्रांति का आरम्भ हुआ था। इस हरी क्रांति ने सारे भारत में तहलका मचा दिया था। लुधियाना की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी केे हाईब्रिड बीज, बढ़िया क़िस्म की खादें, कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग से किसान वर्ग बहुत खुशहाल था। यहां दूध की नदियां बहती थी। परन्तु कुछ समय से मेरे पंजाब पर संकट का काला साया मंडरा रहा है। किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी, बेहतर क़िस्म की खादें, बीज तथा रासायनिक पदार्थों की कमी आ रही है। मंडियों में उनका अनाज सड़ रहा है। उनको अपनी जिंस के उचित दाम नहीं मिल रहे। गन्ने का भुगतान नहीं हो रहा। दूध का उचित मोल नहीं मिल रहा। बाज़ार में जो आलू बीस-तीस रुपये किलो मिलता है वह भी रुपये के भाव से ख़रीदेे जा रहे हैं। प्याज़ के मामले में भी यही हाल है। किसान सड़क पर दूध बिखेेर रहे हैं। आलू प्याज़ फेंक रहे हैं। खेती के लिये लिया कर्ज़ उनसे चुकाया नहीं जा रहा। अपनेे बच्चों की पढ़ाई और शादियों का ख़र्च वे उठा नहीं सकते। कर्ज़ में डूबे हुये किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कितने दुर्भाग्य की बात है कि पंजाब का अन्नदाता आर्थिक बोझ तले अपनी जान गंवा रहा है और उसका परिवार बेसहारा होकर बिलख रहा है। 

सरकार को किसानों की समस्या का समाधान करना चाहिये, उन्हें उनकी फ़सल का उचित दाम देना चाहिये। कर्ज़ा माफ़ कर भी दें तो जिस प्रकार की समस्या बनी हुई है क्या वे दोबारा भी इस शिकंजे में नहीं फंस जाएंगे। सरकार को सूखा-ग्रस्त होने पर और बाढ़ से फ़सल बर्बाद हो जाने पर उचित मुआवज़ा देना चाहिए। छोटे किसानों केे लिए पैंशन योजना लागू करनी चाहिये। आढ़़तियों के शोषण से उन्हें बचाना होगा। नये बीज, नये यंत्र और उपजाऊ खाद सस्ते में देकर उनका उत्साह बढ़ाना होगा। जय जवान जय किसान का सिर्फ़ नारा लगाकर बात नहीं बनती। किसानों के लिये कोई ठोस सुविधाएं प्रदान करनी होगी तभी उनका जीवन सुरक्षित रह सकता है। किसान समाज का धुरा है जिसके फलस्वरूप देश की भूख मिटती है।

पानी की समस्या: पंजाब पांच दरियाओं की धरती थी। जेहलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान को चले जाने के कारण अब रावी, ब्यास और सतलुज पर निर्भर है। पंजाब में पानी की कमी क्यों बढ़ी है? वही पंजाब जो गांव-गांव, शहर-शहर पानी की छबीलें लगवाता था अब प्यासेे मरने की नौबत आ गई है। पंजाब का पानी अपने लिये तो काफ़ी है। परन्तु दूसरे राज्यों हरियाणा, उतर प्रेदश और राजस्थान को पंजाब का पानी चला जाता है जिससे दिन प्रतिदिन पानी की मात्रा घट रही है। अब बीस या तीस रुपये मेें बोतल मेें बंद पानी मिलता है। पानी प्रकृति का नायाब तोहफ़ा है, इसके अभाव में ज़िन्दगी पटरी से उतर रही है। हमारे जल स्त्रोत सूख रहे हैंं। कुओं, ट्यूबवेेलों में पानी नहीं आ रहा है। सूखा हमारे देश को रेगिस्तान बना रहा है। मगर क्यूं? क्योंकि हम वर्षा का पानी संभालते नहीं। उसको व्यर्थ में गंवा देते हैंं। ज्वार या बाजरे की बजाए हम धान की खेती को पंजाब में अधिक तरजीह देते हैं। धान के लिये पानी की अधिक ज़रूरत पड़ती है। नदियां, नाले सूखे पड़े हैं तो पानी कहां से उपलब्ध हो। पंजाब में पानी का लेवल बहुत निचले स्तर पर पहुुंच गया है। पानी की समस्या इस कारण भी है कि हम पानी को ज़रूरत से ज़्यादा बहाते हैं। नल के नल खुले छोड़ देते हैं।

प्रदूषण: पंजाब की एक अन्य समस्या प्रदूषण की भी है। प्रदूषण कुुुुुदतर का क़हर नहीं बल्कि हमारी अपनी गुस्ताखियों का परिणाम है। हमने जंगल, वन, उपयोगी वृक्ष काट कर अपने लिये मुसीबत मोल ले ली है। वायु में ऑक्सीजन की कमी के कारण सांस लेना दूभर हो गया है। घनी आबादी में फैक्टरियां लगाकर उसके काले धुएं से आकाश और धरती को दूषित कर दिया है। शहरों के गन्दे नाले जब नदियों में गिरते हैं तो नदी के पानी को दूषित कर देते हैंं। हम कूड़ा कर्कट जहां मर्ज़ी फेंक देते हैं, उससे वायु विषैली हो जाती है। पशुओं को नदी-तालाब में जाकर नहलाते हैं, कपड़े भी नदी तालाब या कुएं की मुंडेर पर धोते हैं, सारी मैल शुद्ध पानी में बिखेेरते हैं। कोयले की भट्टियों और ईंट के भट्टों की चिमनियों का धुआं हवा में प्रदूषण फैलाता है।

शहर के बीचों-बीच उद्योग और कारखाने धुआं फैलाते हैं, यही कारण है कि पंजाब का लुधियाना शहर पंजाब का सबसे प्रदूषित शहर है। अमृतसर, बटाला, जालन्धर, पटियाला, बठिंडा भी प्रदूषण की और बढ़ रहेे हैं।

स्थान-स्थान पर लगे गन्दगी के ढेर वायु, पानी को प्रदूषित कर रहे हैं। मोटर गाड़ियों में प्रयोग होने वालेे डीज़ल, पैट्रोल धुएं को अंजाम दे रहेे हैं। खुले में शौच भी एक समस्या बनी हुई है। झुग्गी, झोंपड़ी वालों के पास शौचालय न होने से उनके द्वारा शरीर का मल खुले में बिखरता है।

सफ़ाई कर्मचारी भी शहर केे कचरे के यहां-वहां ढेर लगा देते हैं और वातावारण में दुर्गन्ध फैलाते हैं। किसान फ़सल काटने के बाद फ़सलों के अवशेष जलाकर धुएं का प्रकोप बढ़ा देते हैं जिससे शुद्ध वायु गन्दी हो जाती है। पर्यटक पार्कों और दर्शनीय स्थानों पर फलों के छिलके, कुल्फियों के खोल, आईसक्रीम के खोल और मूंगफली आदि के अवशेष का ढेर लगा देते हैं। पार्क में लगे हुये कूड़ेदानों को प्रयोग नहीं करते। सिगरेट के छल्ले बनाकर वायु में कालिमा भरते हैं। प्लास्टिक और पॉलीथीन के थैलों का प्रयोग भी प्रदूषण का एक और कारण बनता है। हमारी गन्दी आदतें भी प्रदूषण को बढ़ावा देती हैं। जहां चाहे कहीं भी खड़े होकर गली नुक्कड़ पर पेशाब से निवृत्त हो जाते हैं। स्थान-स्थान पर थूक देते हैं। हम पशुओं के गोबर को खाद के रूप में प्रयोग नहीं करते बल्कि गांवों के लोग उससे उपले बनाकर जलाते हैं और हवा को दूषित करते हैं। पर्यावरण बचाने के लिये नये पौधे बहुत कम मात्रा में लगाये जाते हैं। कड़ाके की गर्मी-सर्दी भी वातावरण में कठोर परिस्थिति पैदा कर रही है। यदि प्रदूषण के काले धुएं से ओजोन की परत पतली हो गई तो हम कई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग होगी और ग्लेशियर पिघलेंगेे और नदियों में बाढ़ आ जाएगी। प्रदूषण के कारण ऐतिहासिक भवन और अन्य शहरों की खूबसूरत बिल्डिंगे स्याह काली हो जाएंगी।

भ्रष्टाचार:– पंजाब में भ्रष्टाचार की समस्या बड़ी भयानक रूप धारण कर गई है। भ्रष्टाचार जितना सरकारी कार्यालयों में है उतना प्राईवेट सैक्टर में नहीं है। जब शासन को चलाने वाले ही भ्रष्ट हैं तो अन्य लोगों पर क्या शिकवा किया जाए। राज्य की सारी मशीनरी भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द घूम रही है। तहसील, कचहरी से लेकर पुलिस विभाग के अफ़सर तक भ्रष्टाचार में डूबे हुये हैं। रिश्वत के बिना सरकारी दफ़्तर में कोई फ़ाईल सरकती नहीं। सड़क हो या बिल्डिंग की कन्स्ट्रक्शन का काम हर महकमा कमीशन मांगता है। कमीशन देते-देते ठेकेदार भी तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं। सरकारी पैसे का दुरुपयोग होता है। राजीव गांधी ने ठीक ही कहा था कि ऊपर से एक रुपया गांव के निर्माण के लिए पहुंचते-पहुंचते 10-15 पैसे रह जाता है। बाक़ी घूसख़ोरी में चला जाता है। ऐसे में ठेकेदार लोग घटिया मटीरिअल का इस्तेमाल न करें तो क्या करें? यही वजह है कि पुल बनता पीछे है टूटना पहले ही शुरू हो जाता है। बेईमानी, रिश्वतख़ोरी का यह हाल है कि हर साधारण आदमी का दम घुट रहा है। सरकारी हो या प्राईवेट हर नौकरी के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। सभी अधिकारी लोगों का खून चूस रहे हैं और कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। भ्रष्ट राजनीति ने न्याय को भी अपनी जेब में डाल रखा है।

नशाख़ोरी:- पंजाब पांच दरियाओं की धरती में अब छठा दरिया नशे का बह रहा है। पंजाब में नशाख़ोरी ने सारे पंजाब को जकड़ रखा है। परिवार का कोई न कोई सदस्य चोरी और नशे का आदी है। घर के घर और परिवार के परिवार उजड़ रहे हैं। जब भी कोई सरकार सत्ता में आती है तो पंजाब से नशाख़ोरी मिटाने का वादा करती है। नशे के तस्करों और व्यापारियों को जेल में पहुंचाने का वचन देती है। परन्तु सत्ता प्राप्त हो जाने पर अपने हाथ खड़े कर देती है। पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और तालिबान से अफीम, कोकीन हेरोईन तस्करों द्वारा लाई जाती है और बॉर्डर को क्रॉस करके पंजाब को सप्लाई की जाती है। पुलिस और सुरक्षा बल के कर्मचारी पैसे के लालच में अपराधियों से मिले हुये हैं। कई राजनेताओं के बेटे और सम्बंधी इस धन्धे से जुड़े हुये हैं। यहां तक के जेलों में भी यह धन्धा ज़ोरों पर है। स्थान-स्थान पर शराब के ठेके भी नशाख़ोरी केे लिये ज़िम्मेदार है। पंजाब के नौजवान नशे में डूब कर बरबाद हो रहे हैं। पुरखों द्वारा मेहनत से बनाई ज़मीन भी नशे की लत में बेच कर माता-पिता को कंगाल बना रहे हैं। नशा सभी अपराधों का जन्मदाता है। चोरी, डाकेे, बैंक डकैती, बलात्कार और हत्याएं नशे के कारण ही हो रही हैं। पंजाब के नवयुवकों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। सरकार को इस ओर ध्यान देने की ख़ास आवश्यकता है।

बेरोज़गारी:- पंजाब में बेरोज़गारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। पढ़े लिखे युवक हाथों में डिग्रियां लेकर सड़कों की धूल चाट रहे हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, प्रोफ़ेेसर सरकारी नौकरी के लिये तरस रहे हैं। हड़तालें और आन्दोलन भी करते हैं। उद्योग धन्धों की कमी के कारण पढ़ा लिखा भी बेकार है और अनपढ़ भी परेशान है। पंजाब के युवक यहां रोज़गार न मिलने के कारण विदेशों में भाग रहे हैं। कुछ युवक तो विदेशों में अपना मुक़ाम हासिल कर लेते हैं लेकिन कुछ एजेन्टों द्वारा ठगे जा रहे हैं, कुछ विदेशों में बन्धक का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बहुत लोगों ने विदेशों की नागरिकता हासिल कर ली है, यह एक क़िस्म का पलायन ही तो है। यदि शिक्षा और रोज़गार का प्रबन्ध ठीक हो जाए तो नवयुवक अपनी ज़मीन को गिरवी रखकर या बेचकर क्यूं विदेशों का रुख करें। यह पंजाब के लिये चिन्ता का विषय है सरकार को इसकी ओर ध्यान देना चाहिये।

महंगाई:- पंजाब में महंगाई भी सिर चढ़ कर बोल रही है। खाद्य पदार्थ, दूध, सब्ज़ियों के भाव आसमान को छू रहे हैं। हर वस्तु में मिलावट और गिरावट है मगर महंगाई कमर तोड़ रही है। सोना-चांदी, कपड़े, बर्तन ख़रीदना आम जनता की पहुंच से बाहर है। दिहाड़ीदार अपने परिवार का पेट कैसे भरे उन्हें शिक्षित कैसे करे। दवाइयां और संतुलित भोजन कैसे जुटाये। ग़रीब आदमी के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। लग्ज़री सामान तो क्या रोज़मर्रा की वस्तुएं निम्न स्तर का आदमी ख़रीदने में असमर्थ है। ऐसे हालात को देखकर गाने के बोल याद आते हैं- “सखी सईयां तो खूब ही कमात है महंगाई डायन खाए जात है।”

सूखे और बाढ़ का कहर:- यदि बरसात न आये या बहुत कम आये तो सूखा पड़ने का ख़तरा रहता है। तेला, सुुंडी और फ़सल भक्षी कीड़े खेतीबाड़ी को चाट लेते हैं। सबसे भयानक स्थिति उस वक्त आती है जब पंजाब की नदियां अधिक मानसून के बरसने से किनारों से उछल जाती हैं। सतलुज और ब्यास की बाढ़ से गांव के गांव और शहर के शहर डूब जाते हैं। भाखड़ा डैम से छोड़ा हुआ पानी पंजाब के आधे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेता है। पंजाब में सन् 1988 की बाढ़ ने काफ़ी क्षति पहुंचाई थी। जान-माल और खेती को बर्बाद कर दिया था। परन्तु पंजाब की सरकार ने अब तक बाढ़ से प्रभावित इलाकों केे लिए कोई बाढ़ रोकने की नीति नहीं अपनाई। जिसकेे परिणाम स्वरूप वर्ष 2019 में भी बाढ़ के नुक़सान ने पंजाब के कई इलाके तहस-नहस कर दिये। पशु, जानवर बह गए। सभी फ़सल नष्ट हो गई। सरकार को चाहिये कि बाढ़ रोकने का उचित प्रबन्ध करे।

कन्या भ्रूण हत्या:- सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी कन्या भ्रूण हत्या बन्द नहीं हुई यह समस्या ज्यूं की त्यूं बनी हुई है। भ्रूण टैस्ट करवाना निषेध और गैर-कानूनी है परन्तु कलीनिकों, लैैैैैबों और अस्पतालों में यह काम धड़ल्ले से हो रहा है। निजी अस्पतालों में पैसे के लालच में इस प्रक्रिया को बढ़ावा मिल रहा है। महिलाओं की जन्म दर पुरुषों के मुकाबले अब भी कम है। महिलाओं पर इस प्रकार का अत्याचार सरकार के ध्यानार्थ है परन्तु सरकार के प्रयत्न अभी अधूरे हैं। महिला आयोग को इस विषय में सख़्त एक्शन लेने की ज़रूरत है। यह भली-भांति ज्ञात होना चाहिये कि यदि कन्याओं की संख्या कम हुई तो अधिकांश पुरुष कुंवारे रहेंगे। आज तो लड़कियों ने पुरुषों को पछाड़ दिया है, इसलिये इनका संरक्षण ज़रूरी है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा खोखला है जब तक इसको कठोरता से लागू न किया जाए। बहू चाहिये तो कन्या वध रोकिये और महिलाओं के जीवन को भी सुरक्षित बनाइये। संविधान मेें दिया गया लड़का-लड़की समानता का अधिकार तभी पूर्ण होगा यदि समाज बेटी को देवी मानकर स्वीकार करेे और लड़कियों के प्रति उदारता की नीति अपनाये।

मां बोली के साथ सौतेला व्यवहार:- पंजाब की मां बोली पंजाबी है, परन्तु मां बोली पंजाबी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों में पंजाबी को प्रथम भाषा के रूप में नहीं पढ़ाया जा रहा। पंजाब में दो प्रकार के स्कूल हैं प्राईवेट और सरकारी। प्राईवेट स्कूलों वाले मनमर्ज़ी करते हैं और अंग्रेज़ी को ही प्राथमिकता देते हैं। बड़े धनाढ्य लोग और मिनिस्टर अपने बच्चों को इन्हीं स्कूलों में शिक्षा दिलवाते हैं। सरकारी स्कूलों में केवल निम्न वर्ग के लोग ही बच्चों को शिक्षा के लिये भेजते हैं। सरकारी दफ़्तरों का काम पंजाबी भाषा से अधिक अंग्रेज़ी में चलता है। साइंस और टैक्नॉलॉजी की शिक्षा अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। हिन्दी भी अवहेलित है और पंजाबी भी। अंग्रेज़ी पढ़े व्यक्ति को नौकरी आसानी से मिल जाती है जबकि पंजाबी पढ़े-लिखे पोस्ट गेेजुुएट और पी.एच.डी की योग्यता रखने वाले बेकार घूमते हैं। अब मां बोली को उचित स्थान कौन दिलवाये जब प्रशासन चलाने वालों के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं या कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। इस विषय को लेकर पंजाब के साहित्यकारों और केन्द्रीय पंजाबी लेखक सभा ने कई आन्दोलन किये हैं परन्तु अभी तक पंजाबी को योग्य स्थान प्राप्त नहीं हो सका। यह ज्वलंत विषय है सरकार को इसके प्रति गम्भीर होना चाहिये।

पंजाब के गांवो में खेलों और खेल स्टेडियमों की कमी:-  कितने दुर्भाग्य की बात है कि भारत गांवों का देश है। लगभग 75% आबादी गांवों में बसती है। अच्छे स्वास्थ्य के चलते, गांव के लोगों में खेलों की विशेेष योग्यता है। बड़े-बड़े पहलवान, मुक्क़ेेबाज़ और कबड्डी के खिलाड़ियों के अलावा हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट के खिलाड़ी गांवों से सम्बधित हैं। हमारे शहरों मोहाली, चण्डीगढ़, पटियाला, बठिण्डा और जालन्धर में स्टेडियम हैं परन्तु गांवों में यह व्यवस्था न होने से गांवों के युवक-युवतियां खेलों में भाग नहीं ले सकतेे। गांवों में टैलेंट की कमी नहीं है। गांवों में स्वास्थ्य और मैडीकल सेवाओं की भी कमी है। गांवों में ज्ञान की वृद्धि के लिये कोई लाइब्रेरी भी नहीं होती। इन सुविधाओं के अभाव में गांव के युवक और युवतियां खेलों में भाग नहीं ले सकतेे। पंजाब की धरती वीर योद्धाओं की धरती है इसलिये गांवों में खेलों के मैदानों की व्यवस्था होनी चाहिये।

मनोरंजन साधनों की कमी और कला-थिएटरों और फ़िल्मी उद्योग की कमी:- बड़े-बड़े शहरों में कला के केन्द्र हैं। मनोरंजन के बढ़िया साधन हैं, गांवों और छोटे शहरों में ऐसी व्यवस्था नहीं है। फ़िल्मी दुनिया के अधिकतर अभिनेता गांवों से निकले हैं। गांवों में कला संस्कृति और साहित्य की कमी नहीं है इसलिये गांवों में भी कहीं पर कला भवनों का निर्माण होना चाहिये। यातायात सुविधाएं पर्याप्त होनी चाहिये। पंजाबी फ़िल्मों के लिये यदि सम्भव हो तो फ़िल्म इंडस्ट्री का निर्माण करना चाहिये।

 

5 comments

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