-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

अच्छे बच्चे देश की विरासत हैं, शान हैं और बिगड़ैैल बच्चे देश समाज के लिए घातक समस्या हैं। बच्चे देश का धन हैं तथा बच्चे ही शिक्षित होकर देश का भविष्य संवारते हैं। आज के बच्चे कल के कर्णधार हैं जिन पर देश को प्रगति पथ पर ले जाने का उत्तरदायित्व है। बच्चे कोरी सलेट की माफ़िक़ हैं उन पर जो अंकित किया जाता है वे वैसे ही बन जाते हैं। प्रकृति ने मानव को एक जैसा नहीं बनाया। जैसे हाथ की पांच उंगलियां बराबर नहीं होती वैसे ही मनुष्यों में भिन्नता पाई जाती है। हर बच्चे का अपना आई क्यू होता है। कुछ बच्चे अति जीनियस कुछ इंटेेलिजेेंट कुछ सामान्य बुद्धि वाले कुछ निम्न स्तर की बुद्धि वाले और कुछ डल और जड़बुद्धि वाले होते हैं। आमतौर पर जन्मजात इन बच्चों में माता-पिता के गुण पाये जाते हैं परन्तु ये नियम कोई ठोस या पक्का नहीं है। कई बार देखा गया है कि साधारण परिवारों में पैदा होने वाले बच्चे भी बहुत प्रतिभाशाली होते हैं। धोबी, नाई और मोची के बच्चे भी आई.ए.एस बन जाते हैं और कुछ सभ्य परिवारों के बच्चे भी नीच हरकतें करते हैं। इसमें दोष कई बार माता-पिता का ही होता है ख़ासकर जन्म देने वाली मां का। कोई स्त्री जब गर्भवती बनती है तो निरन्तर अपनेे चेेकअप की अवहेलना करती है। डॉक्टर केे परामर्श की ओर ध्यान नहीं देती, संतुलित आहार की परवाह नहीं करती। जिससे बच्चा कमज़ोर पैदा होता है। आजकल तो ऑपरेशन द्वारा डिलीवरी करवाई जाती है। कई स्त्रियों को कहते सुना है कि “अड़िए चंगी चीज़ (अच्छी चीज़) उत्पन्न हो जाए तो ऑपरेशन का दर्द भूल जाता है।” चंगी चीज़ यानी अच्छी चीज़ का संबंध लड़के से है। लड़की पैदा करना स्त्री स्वयं नहीं चाहती। ऐसी अवस्था में जब लड़की के प्रति हीन भावना होगी तो स्वयं लड़की सन्तान में आक्रोश नहीं भरेगा क्या? लड़की यह समझने को मजबूर हो जाती है कि उसका जन्म बेकार ही इस घर में हुआ है। क्या वह माता-पिता के प्रति स्नेह और आदर रख पाएगी? उसके पैदा होने पर न तो शहनाई गूंजी न मिठाई बांटी गई न भांड और हिजड़े आये और न ही बधाई देने वालों का तांता लगा। हर तरफ़ मायूसी और मातम क्यूं?

क्या समाज यूं ही इस घिसी पिटी परम्परा को खींचता रहेगा। कहीं कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि आजकल की कुछ मॉडर्न बीवियां बच्चे को अपनी छाती का दूध नहीं पिलाती, एक महीने के बाद ही दूध की बोतल मुंह के साथ लगा देती हैं। क्यूं कि उनकी सुन्दरता नष्ट होने का भय रहता है। वह अपने मातृत्व का कर्त्तव्य भी नहीं निभाती, युवा बनी रहने की तमन्ना उसमें इस कदर पाई जाती है। कहते हैं कि दूध पर बुद्ध होती है। अब सोचो ज़रा कि गाय, भैंस का दूध पीने से क्या बच्चा गाय, भैंस की तरह हुंकार नहीं भरेगा? क्या लड़ने-भिड़ने को तैयार नहीं होगा। बहुत से परिवारों में मां बाप एक साल के बच्चे को नौकरानी के हवाले करके स्वयं काम को निकल जाते हैं। ऐसे में बच्चे की सहानुभूति, प्रेम और सहयोग खून के रिश्तों से दूर होकर क्या नौकरानी से ही नहीं जुड़ जाएगा? मां के दूध में बड़ी ताकत होती है। हमने तो मां का दूध डेढ़ दो साल पिया। इसलिये रोगों से वंचित रहे। तब न काली खांसी का टीका होता था न पोलियो का न टी.वी का। सिर्फ़ एक चेचक का टीका होता था।

मां का दूध आदमी को शेर बना देता है। कई बार जब कोई आंख दिखाये तो कहावत बोली जाती है कि अगर मां का दूध पिया है तो निकल बाहर कर मुक़ाबला। कहने का भाव यह है कि बच्चे केे लिए मां का दूध अमृत है।

आधुनिक युग में बच्चे को दो-अढ़ाई साल में ही प्री नर्सरी स्कूल में भेज दिया जाता है। इससे बच्चा रोता, बिलखता और चिढ़-चिढ़ा हो जाता है, उसका मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित होता है। छोटे बच्चे का दिल कोमल फूल की भांति होता है। अध्यापक की डांट फटकार उसके मन में घर कर जाती है और अध्यापक के प्रति नफ़रत से भर देती है। प्राइमरी स्टेज तक तो बच्चे केे साथ डांट फटकार की भी जा सकती है परन्तु ज्यूं-ज्यूं बच्चा बड़ा होता है, उसके साथ प्रेम और उदारता बनाए रखनी चाहिये। मां बाप को ध्यान हो कि बच्चे को छोटा समझकर उससे सिगरेट, शराब नहीं मंगवानी चाहिये। न तो उसके सामने इन वस्तुओं का सेवन करना चाहिये, नहीं तो आपका बच्चा भी चोरी छिपे इनका सेवन करेगा।

उसकी आदतों को बिगाड़ने में आप खुद ज़िम्मेदार होंगे। प्राइमरी स्टेज के बाद सीनियर स्टेज की पढ़ाई के समय उसकी ज़रूरतें भी बढ़ जाती हैं। कई मां-बाप इतने कंजूस होते हैं कि उनको ज़रूरत मुताबिक़ पैसे नहीं देते। ऐसी स्थिति में बच्चा या किशोर अपने साथियों की पुस्तकें या अन्य सामग्री चुराने लगता है। उस पर मालिक का नाम मिटाकर अपना नाम लिख लेगा या रद्दी वाले को बेच कर मूूंगफली, रेवड़ियां, समोसे खायेगा। पकड़े जाने पर जब पिटाई होगी तो पक्का चोर बन जाएगा।

माता-पिता को जवान बच्चे के साथ मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए। धर्म शास्त्र कहते हैं “प्राप्ते तु शोडषे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्।।” अर्थात सोलह वर्ष के लड़के और कन्या के प्रति एक दोस्त और मां को सहेली के रूप में कार्य करना चाहिये। ज़माना बदल गया है, आपको बदलाव में विश्वास रखना चाहिये, परिवर्तन कुदरत का नियम है। आप को चाहिए कि समयानुसार नई पीढ़ी की बातों को समझें और ज़माने के बदलाव को अपनाएं। आप उन्हें बात–बात पर डांटकर शर्मिंदा न करें। उनको अंडर एस्टीमेट मत करें।

उनके अच्छे कार्य के लिये उन्हें शाबाशी दें। यदि लड़की ड्राइंगरूम संवारती है तो उसे यह ताना मत दें कि आज कौन तुझे देखने आ रहा है। पास-फेल कुदरत का खेल है। फेल हो जाने पर उनको भला बुरा मत कहें। कई बार देखा गया है कि युवक आत्मग्लानि में आत्महत्या कर लेते हैं या घर से भाग जाते हैं। किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं। लड़कियों केे मासिक धर्म का आना स्वभाविक है। लड़कों में स्वप्न दोष (night fall) कभी-कभी हो जाता है। ऐसी अवस्था में मां को चाहिए कि पुत्री को मनोवैज्ञानिक के भांति गाईड करेे और पिता द्वारा युवक को समझाया जाना चाहिये। नहीं तो बच्चे ग़लती का शिकार हो जाएंगे। बच्चों में अपोज़िट सैक्स के प्रति भी आकर्षण होता हैैै, वे किसी अनुचित कार्य के शिकार न हो जायें। उन्हें धार्मिक और महान पुरुषों की गाथाएं सुनानी चाहिये और अच्छी बातों के लिए प्रेरित करना चाहिए। घर ही पहला स्कूल है और माता-पिता उसके प्रथम गुरु हैं।

यौवनावस्था में बच्चे अपने मित्रों और सहेलियों पर ज़्यादा विश्वास करते हैं। एक-दूसरे के घर आते जाते हैं। कई अवस्थाओं में वे प्रेमी-प्रेमिका भी बन जाते हैं। बच्चों को खुली छूट उनको ग़लत रास्तेे पर ले जाती है। माता-पिता को उनके मोबाइल चैक करने चाहिये। वे किससे मिलते हैं किन लोगों से उनकी दोस्ती है सबकी जानकारी होनी चाहिये। उनके सोने के कमरों की चैकिंग रखनी चाहिए। फिर भी लाख पहरों के बाद भी चोरी-चोरी ग़ैैर धर्म या ग़ैैर जाति में प्रेम संबंध उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे में मां-बाप को चाहिये कि जात-पात के झगड़े को छोड़कर बेटे-बेटी के निर्णय को मान लें नहीं तो बच्चे विद्रोह कर देंगे। बात सिरे न चढ़े तो अपनी जान तक दे देते हैं और बाद में मां-बाप को पछताना पड़ता है।

कई बार बच्चे अपने माता-पिता के रुतबे का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। मंत्रियों, पुलिस अधिकारियों, जजों के बेटे नशे के धंधे में लिप्त हो जाते हैं। बलात्कार जैसे अपराध करते हैं और मां-बाप उनको बचाने का प्रयास करते हैं, इस तरह उनका हौसला बढ़ता जाता है और वे बिगड़ैल होते जाते हैं।

माता-पिता को न तो ज़रूरत से ज़्यादा औलाद से प्यार करना चाहिए न ही ज़्यादा सख़्त होना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति उनके बुरे कार्य पर उलाहना लेकर आता है तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बच्चा चोरी करके कोई चीज़ घर तो नहीं लाता यदि ऐसा हो तो उसको वर्जित करना चाहिये। उसकी चोरी को छिपाना नहीं चाहिये। नहीं तो उसकी चोरी की आदत बढ़ती जाएगी। कई बार लड़के लड़कियों को प्रभावित करने के लिए उन्हें कई प्रकार के गिफ्ट दे देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें पूछना चाहिये कि यदि हमने तुम्हें पैसे दिये नहीं तो अमुक वस्तु तुम्हारे पास आई कैसे। ऐसा करने से वे बुरी संगत में आने से बच जाएंगी।

स्कूल:- स्कूल या विद्यालय बच्चों को संवारने में अहम भूमिका निभाता है। बच्चा जितना अध्यापकों का कहना मानता है उतना अपने माता-पिता का नहीं। जो बच्चा घर में नहीं सुधरता वह स्कूल में जाकर सुधर जाता है। यहां पर आकर वे सही मायने में मनुष्य बन जाते हैं। अध्यापक राष्ट्र का निर्माता है। विद्यार्थियों को अच्छी प्रकार की शिक्षा देना उसका कर्त्तव्य है। सिर्फ़ पढ़ाने मात्र से उसका लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता। उन्हें अच्छा नागरिक बनाना और राष्ट्र प्रेम सिखाना भी उसका कर्त्तव्य है। अध्यापक आदर्शवादी और नैतिक गुणों से भरपूर होना चाहिए। उच्च विचार और सादा जीवन की उसमें प्रवृत्ति होनी चाहिये। बच्चे को ज्यादा दंड देना कदापि बच्चों का भला नहीं कर सकता। पिटाई से वेे ज़्यादा उद्दंड और बिगड़ैल हो जाएंगे।

नालायक बच्चों का उपहास नहीं उड़ाना चाहिये नहीं तो वे स्कूल छोड़कर चले जाएंगे और समाज के शरारती तत्व बन जाएंगे। स्कूल की प्रार्थना सभा में प्रत्येक अध्यापक को देश और समाज की भलाई के टॉपिक पर व्याख्यान देना चाहिये। प्रत्येक बालक को भी बोलने का मौक़ा देना चाहिये।

कुछ बच्चे शारीरिक रूप से बड़े बलवान होते हैं, वे छोटे बच्चों को तंग करते हैं या स्कूल में तोड़ फोड़ करते हैं। ऐसे बच्चों को खेलों में लगाना चाहिये ताकि उनकी ऊर्जा नष्ट न हो सके। बच्चों को स्कूल में पौधे और छायादार पेड़ लगाने का कार्य सौंपना चाहिये। सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे नाटक, गीतों, भांगड़ा तथा गिद्दे आदि प्रोग्राम पेश करने का मौक़ा देना चाहिये। बच्चों की प्रगति या अवनति के बारे में माता-पिता को अवगत कराना चाहिये। महीने में एक बार स्कूल में बुलाकर सलाह मशवरा करना चाहिये। स्कूल में सिगरेट, शराब का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिये। बच्चे टीचर की हर हरकत नोट करते हैं। उनकी हर क्रिया को बड़े ध्यान से देखते हैं। अध्यापक चरित्र का धनी होना चाहिये। स्टाफ़ को स्कूल के समय मेें प्रेेम संबंधो से दूर रहना चाहिये। नहीं तो बच्चे चोरी से उनके नाम दीवारों पर अंकित कर देंगेे। टीचर का अनुशासन और व्यक्तित्व शिष्य पर बड़ा प्रभाव डालता है। बच्चों को निकम्मा बैठने का मौक़ा नहीं देना चाहिये। कहते हैं कि An idle man’s brain is the devil’s workshop.

एक बात महत्वपूर्ण यह है कि स्टाफ़ को आपस में लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिये। और ड्यूटी का पाबन्द रहना चाहिये।

कॉलेज:- कॉलेज में बच्चे व्यस्क होते हैं। वे अपना अच्छा बुरा जानते हैं। कॉलेज में उनकी फ़ीसों में बढ़ौतरी या जुर्माने के कारण या फिर किसी विद्यार्थी को कॉलेज से बिना वजह निकाला जाता है तो वे विद्रोह और आन्दोलन पर उतर आते हैं। छात्रों की युनियनें बनी होती हैं जो अन्याय सहन नहीं कर सकती। चाकू, छुुरियां चलने की और अध्यापकों की पिटाई की नौबत आ जाती है। राजनैैतिक पार्टियों की दख़लंदाज़ी आग पर घी का काम करती है। कॉलेज प्रंबधन और राजनेता बच्चों केे बिगड़ने में ख़ास भूमिका निभाते हैं। कॉलेज के विद्यार्थियों में हीरोशिप, और लीडरशिप की भावना अधिक होती है। उचित मार्गदर्शन उन्हें सभ्य मानव बना देता है और अनुचित मार्गदर्शन उन्हें बिगड़ैल बना देता है। कॉलेज से ही गुंडा तत्व बाहर निकलते हैं जो समाज को हानि पहुंचाते हैं। कॉलेज से क्रांतिकारी निकलते हैं। यहीं से ही उग्रवादी निकलते हैं जो आतंक फैलाते हैं।

समाज:- समाज, बच्चों को यदि संभालता है तो बिगाड़ता भी है। गांवों के लोग गांव की चौपाल पर जुआ खेलते हैं। इससे बच्चे भी जुए में हाथ आज़माने लग पड़ते हैं। समाज के लोग जब सिगरेट, शराब का उपयोग विवाह शादियों पर खुले तौर पर करते हैं तो बच्चे भी चोरी छिपे इनका प्रयोग करते-करते नशे के आदी हो जाते हैं। समाज में जब किसी प्रेमी-प्रेमिका को नंगा घुमाया जाता है अपनी सत्यता प्रकट करने के लिए गर्म तेल के कड़ाहे मेें हाथ डालने के लिए कहा जाता है वे डाकू लुटेरे बनकर बदला क्यूं नहीं लेंगे। झूठे ढोंग, आडम्बर और पंचायतों के फ़रमान उन्हें विद्रोह करने के लिये मजबूर करते हैं। वे या तो खुद मर जाते हैं या अन्याय करने वाले को गोली से उड़ा देते हैं।

प्रकृति:- प्रकृति भी अजीबोग़रीब है। प्राकृतिक तौर पर सभी मनुष्य बराबर नहीं होतेे। कोई बुद्धिमान और कोई बुद्धिहीन, कोई गोरा कोई काला। कोई गूंगा कोई बहरा और कोई अन्धा। समाज में इन लोगों के प्रति दया की भावना की कमी होती है। गंजे, काने, लूले, लंगड़े और काले व्यक्ति में आत्म हीनता पाई जाती है। समाज में कोई स्त्री या लड़की इन लोगों से स्नेेेह नहीं रखती, विवाह करवाने के लिये राजी नहीं होती। अन्दर और बाहर इनके लिये एक जैसा होता है। इसलिए ये बलात्कार करके अपराधी बन जाते हैं क्योंकि समाज से तिरस्कृत होते हैं इसलिये बिगड़ैल हो जाते हैं।

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