सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

3परम पिता परमात्‍मा ने जब इस लोक को बनाने का तसव्वुर किया तो हर यत्न, हर प्रयत्न से एक खूबसूरत जहां बना डाला। बेशक वो अपने रचना कौशल पर गौरवान्वित हुए बिना न रह पाया होगा। कहते हैं भगवान् को अपनी बनाई दुनिया से बेहद प्रेम है।

किसी भी रचयिता को अपनी खूबसूरत रचना को देखकर वैसी ही अनुपम आनंद की अनुभूति होती है जैसी सृष्टिकर्त्ता को सृष्‍टि को रचकर हुई होगी। एक चित्रकार अपनी पेंटिंग्स से प्रेम करता है। एक मूर्तिकार अपनी मूर्तियों को बनाने के बाद उनसे बेहद लगाव महसूस करता है। उसी प्रकार एक लेखक अपने सुन्दर लेखों के प्रकाशित होने की खुशी अनुभव करता है। किसी का भी एक खूबसूरत तसव्वुर को हक़ीक़त का जामा पहनाने के बाद आनंद विभोर होना लाज़िम-सी बात है।

किसी भी रचयिता के हाथों में कृति को खूबसूरत बनाने का कौशल होता है। किसी भी बुत की खूबसूरती पत्थरों को तराशने के कौशल पर ही निर्भर करती है। हम अपनी रचना पर गौरवान्वित तो अवश्यर होते हैं शर्त यह है कि वो सच में अच्छी हो।

मन में कुछ करने की तमन्ना हो, तसव्वुर में खूबसूरत कल्पना और हाथों में क़लम हमें बढ़िया लेखन के लिए बाधित करते हैं। कोई भी अच्छे विचार तब तक क़ाबिले तारीफ़ नहीं होते जब तक लिखने का हुनर न हो। जो भी तुम कहना चाहते हो यदि तुम जानते हो कि कैसे कहना है तो तुम वो सब कर पाओगे, कह पाओगे, लिख पाओगे जो तुम चाहते हो।

इस लिए कवियों ने सुन्दर-सुन्दर कल्पनाएं कर के ग्रन्थ पर ग्रन्थ रच डाले।

पर कब तक ?

कब तक ‘घटा-सी ज़ुल्फ़ों’, ‘झील-सी आंखों’ की सुन्दर-सुन्दर कल्पनाएं ही करते रहेंगे। सुन्दर लिखने का अर्थ यह नहीं कि हर बुराई देख कर आंखें मूंद लो। आंखें मूंद कर सुन्दर ख़्वाब देख कर सुन्दर लिख डाला। न तो असलियत से मुंह मोड़ कर लेखन अच्छा हो पाता है न ही हर चीज़ में बुराई ढूंढ़ने से हम उमदा, दृढ़ विचारों वाले लेखक बन सकते हैं।

जहां लेखक का काम है सुन्दर रचना प्रस्तुत करना वहीं उसका फ़र्ज़ है समाज को समाज की असलियत से वाक़िफ़ कराना। एक लेखक, एक साहित्यकार – किसी फ़ोटोग्राफ़र, पेंटर या मूर्तिकार की तरह केवल वस्तु स्थिति के चित्र ही प्रस्तुत नहीं करता वरंच उसके कारण ढूंढ़ता है साथ ही नए रास्ते भी तलाश करता है। भविष्य के लिए अन्धकार से निकलने वाली रोशनी प्रज्वलित करता है।

जब-जब किसी भी बुराई ने जन्म लिया है। क़लम ने सबसे आला भूमिका निभाई है। लेकिन आज इन्टरनेट का, केबल का ज़माना है। विदेशी चैनलों के साथ-साथ अश्‍लीलता, हिंसा, नग्नता का मुक़ाबला करते हमारे चैनल युवाओं पर हावी हैं। ऐसे में साहित्य में भी परिवर्तन आना अवश्यंभावी-सा हो गया है। आज साहित्य पथप्रदर्शक नहीं पथभ्रष्ट करने वाला हो गया है। साहित्य का काम दिशा दिखाना नहीं रहा बल्‍कि साहित्य बिकाऊ हो गया है। केबल संस्कृति की चकाचौंध का मुक़ाबला करने वाले साहित्य की मांग बढ़ गई है। और समय के साथ चलने का तर्क देकर दिशा को भटकाने का काम किया जा रहा है। जो इस नई संस्कृति के साथ अपने क़दम नहीं मिला पाते उनको समयानुकूल नहीं माना जा रहा। जहां अच्छे विचारों के लिए लिखने के कौशल की आवश्यकता है। वहीं अच्छा लिखने वालों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे सही दिशा में लिखें। तर्कवाद का सहारा लेकर युवाओं को भटकाने का काम वे कदापि न करें। शिकायत है तो उन अच्छे लेखकों से, उन लफ़्ज़ों के खिलाड़ियों से जो अपने कौशल का दुरुपयोग करते हैं। अच्छेे विचार हों पर लिखने में दक्ष न हों तो शायद नुक़सान इतना नहीं होता। लेकिन सुन्दर क़लम और ग़लत विचारों का असर बहुत दूरगामी होता है। जिनका लेखन दिलो-दिमाग़ पर असर छोड़ता है। उनको ज़रूरत है वो ज़रूर संभल कर लिखें। आने वाली पीढ़ी के लिए सशक्‍त मार्ग तैयार करें।

याद रखें जो तराशेंगे तो उसी पत्थर को भगवान् भी बना सकते हैं और शैतान भी बना सकते हैं। लेखक का फ़र्ज़ है वक़्त की नज़ाकत को जाने लफ़्ज़ों की नफ़ासत को पहचाने।

-सिमरन

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