अहसास दर अहसास

2अहसासों को अंजुली में भरकर रखा नहीं जाता ये तो पल-प्रतिपल बदल जाते हैं। ये अहसास, ये भावनाएं हाथ से रेत की मानिंद फिसलते हैं तो रोक लेने होते हैं यह सदा के लिए। क़ैद करना होता है इनको इन कोरे काग़ज़ों पर। लेकिन हर बार शब्द साथ नहीं देते। कई बार जाने शब्द क्यूं नहीं मिल पाते कहां खो जाते हैं। कभी खूबसूरत शब्दों के क़ाफ़िले मन मस्तिष्क पर आते हैं तो उनको पिरोने के लिए अहसास नहीं मिलते। शब्दों का क़ाफ़िला यूं ही भटकता रहता है।

यदि अपनी बातों को अपने अहसासों को ब्‍यां करने के लिए खूबसूरत शब्दों का जामा पहनाया जाए, खूबसूरत शब्द जड़े जाएं तो यक़ीनन खूबसूरत भाषा विचारों को दूसरों के मन मस्तिष्क तक पहुंचाने में आसान करेगी। एक अच्छे लेखक होने का मतलब है कोई नई दिशा ढूंढ़ना। कुछ नया करने की आकांक्षा। लेकिन हर बार नया ही हो यह भी ज़रूरी नहीं।

कभी-कभी लिखने के बाद लगता है ये बातें तो पहले भी कही जा चुकी हैं इनमें अपना क्या जोड़ा। पर ऐसी बहुत-सी बातें हैं जो पहले कही जाने के बाद फिर फिर कही जानी आवश्यक होती हैं। कुछ इस ढंग से कि कोई समझ पाए। कुछ इस खूबसूरती से कि वो भी मानने को विवश हो जाएं जो अड़े हुए हैं।

यूं भी कोई दिशा बनाने के लिए बहुत से हाथों की ज़रूरत होती है। एक अकेला दूर तक नहीं जा सकता। जिस तरह हम चाहते हैं हमारे साथ बहुत से हाथ जुड़े रहें। उसी प्रकार और लोगों की तरफ़ हम अपना हाथ बढ़ा पाएं यह भी तो ज़रूरी है।

हर तकलीफ़ को जानने के लिए उसका दर्द महसूस करने के लिए यह ज़रूरी नहीं होता कि वो आप पर भी बीते। यदि आपकी संवेदनाएं मरी नहीं तो आप वो सब महसूस कर सकते हैं जो किसी और ने झेला हो। कहते हैं कि कहानीकार, उपन्यासकार या अन्य लेखक तो अपने हर पात्र का दु:ख शिद्दत से महसूस करते हैं। क्योंकि लेखकों को अति संवेदनशील माना गया है।

कभी-कभी लगता है कि ऐसे बहुत से दु:ख दिलों पर दस्तक देकर गुज़रे हैं जो वास्तव में कभी हमारे रास्तों से भी नहीं गुज़रे। कई ऐसी बातें महसूस होती हैं जो यदा-कदा और लेखकों को महसूस करते हमने देखा पढ़ा होता है। हम सामाजिक प्राणी हैं। अकेले नहीं चल सकते। एक दूसरे के दु:खों को जी पाते हैं।

दूसरों के दु:खों को महसूस करते हैं कोमल मन। मन की धड़कनों की आवाज़ सुनो ज़रा। मन की धड़कन कहती है-

मैं हर उस बेटी के साथ-साथ चलना चाहती हूं जिसे भगवान् ने ख्वाहिशें तो दीं पर पैरों में समाज की, घरवालों की पहनाई हुई ज़ंजीरें हैं।

मुझे हर उस बच्चे के आंसुओं के दर्द का अहसास है जिसका मासूम बचपन मज़दूरी, ग़रीबी, लाचारी में खो गया।

मैं हर उस स्त्री द्वारा झेली आंच की पीड़ा महसूस करती हूं। जो दहेज़ के लालचियों ने जला दी। हर उस मां का दु:ख सहती हूं जिसका बच्चा छिन गया।

हर उस बाप, उस भाई का दर्द झेलती हूं। जिसका ग़रूर घर न लौट पाया।

हर उस पति का जिसका हमसफ़र रौंदा गया।

और रौंदी जा चुकी औरत के हर ज़ख़्म का दर्द। तन और मन पर लगे हर घाव की ताब।

कई बार हम ऐसी घटनाओं को महसूस किए बिना भी लिख पाते हैं। पर ऐसे में शब्द फड़फड़ाते हैं। खूबसूरत शब्दों के लिए अहसास का होना भी ज़रूरी हैं। तभी तो कहते हैं कि दिमाग़ से नहीं मन से लिखो।
लेखक ने, साहित्य कार ने ही नए दीप जगाने होते हैं। सब से आगे बढ़कर आने वाले अंधेरे से लोगों को सुचेत करना होता है। साहित्य ही लोगों के अंदर नई राहों के ख़्वाब जगाता है। हालांकि हर व्यक्ति को शांत रहने के लिए, संतुष्ट रहने के लिए सिखाया जाता है। पर यदि ग़ौर से देखेंगे तो पाएंगे कि लेखक होने का अर्थ है असंतुष्ट होना। जब सामाजिक दबाव और घुटन महसूस होती है तो खूबसूरत साहित्य जन्म लेता है। एक सन्तुलित जीवन जीने के लिए संतोष चाहिए पर अत्यधिक संतुष्ट व्यक्ति ठहर जाता है और ठहरा हुआ तरक्क़ी नहीं कर सकता। गिरना बुरा नहीं यदि फिर से उठ सको। ठहरना बुरा है। ज़िन्दगी की सफलता के लिए ऊबड़-खाबड़ रास्तों से हो कर गुज़रना ही पड़ता है। लेखन का कार्य भी बिखरे, ऊबड़-खाबड़ रास्तों की तरह है जिसके लिए एकाग्रता चाहिए। जो लिखना हो निश्चय कर लिखें, स्वयं स्पष्ट हो कर लिखो। निराशा को आशा में बदलो।

ज़िन्दगी को हमने जैसा पाया है वैसा ही नहीं छोड़ जाएंगे, कुछ नया जोड़ेंगे।
आओ हम मिल कर उन बग़ीचों में भी फूल उगाएं जहां फूल नहीं उगते।
हर दर्द की मरहम बने। नया करने की हिम्मत जुटाएं।
नए सपने सजाएं
अपने लिए औरों के लिए भी।

-सिमरन

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