अशोक दर्द

बर्फ और पहाड़ की कविता

ऊंचे देवदारों की फुनगियों पर फिर सफे़द फाहे चमकने लगे हैं सफे़द चादार में लिपटे पहाड़ फिर दमकने लगे हैं। पगडंडियों पर पैरों की फच फच से उभर आये हैं गहरे काले निशान

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काश! आप हमारे होते..

चांद मुट्ठी में, क़दमों में सितारे होते इस ज़मीं पर जन्नत के नज़ारे होते काश! आप हमारे होते उगता सूरज ड्योढ़ी पर राही अन्धेरों से हारे न होते

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मगर

वो शोख़ हवाएं वो पत्तों की सरसराहट फूलों की भीनी-भीनी खुशबू वो भौंरो की गुनगुनाहट मेरा चौंक जाना सुनकर किसी की पदचाप वो पहाड़ की पगडण्डी के किनारे तुम्हारा छोटा सा घर

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शब्द चितेरा

ग़र होता मैं शब्द-चितेरा, कोई बात न्यारी लिखता होरी की दुख गाथा लिखता, धनिया की लाचारी लिखता बाप-बेटे या भाई-भाई में, रिश्ते आख़िर बिखरे क्यों धन-बल-सत्ता की ख़ातिर, क्यों हो रही मारामारी लिखता

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मैं सृष्टि हूं

मैं सृष्टि हूं यह जानते हुए भी मेरे अस्तित्त्व को झुठलाया गया महारथियों की अर्धांगिनी होते हुए भी भरी सभा में मुझे लज्जित करवाया गया।

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कवि और क़लम

बारुद के ढेर पर बैठी दुनियां इनको समझा कवि नफ़रतें सब धुल जाएं प्रेम गीत सुना कवि जंग की तैयारी में बन रहे हथियार नये-नये जंग से हथियार छुड़ा, सौहार्द पकड़ा कवि क्यूं अधीर हुए बैठी है युद्ध के लिए दुनियां दास्तां बर्बादियों की इसको सुना कवि

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नये दौर की कहानी

ज़हरीली हवा घुटती ज़िंदगानी दोस्तो यही है नये दौर की कहानी दोस्तो पर्वतों पे देखो कितने बांध बन गए जवां नदी की गुम हुई रवानी दोस्तो

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अपने अपने दुःख

मैं भी उस बहती नदी के तट पर आकर उनकी पीड़ा में शामिल हो जाना चाहता हूँ परन्तु जैसे ही उन्हें मेरे पुरुष होने का एहसास होता है वे अपनी पीड़ा अपने भीतर छुपा लेतीं हैं

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