-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

दीक्षा को सरकारी नौकरी का बहुत चाव था। वह अध्यापिका बनकर समाज की सेवा करना चाहती थी। बच्चों का भविष्य संवारने के लिये यह व्यवसाय बड़ा सार्थक था। आम के आम और गुठलियों के दाम। इस व्यवसाय में तफ़रीह ज़्यादा उपलब्ध थी। गर्मियों और सर्दियों में सिर्फ़ छ: घंटे ही पढ़ाना होता है। समर वेकेशन और विंटर हॉलीडेज़ की व्यवस्था बनी हुई है। साल भर में रविवार और गज़टिड छुट्टियों को मिलाकर कुल छ: महीने ही स्कूल खुले रहते हैं। मेेडीकल लीव अलग से मिल जाती है।

डिलीवरी होने पर छ: महीने का वेतन रेेगुुलर मिलता है। इतनी सारी सुविधाएं देखकर दीक्षा का दिल अध्यापिका की नौकरी पाने को मचल रहा था। समाज में इस पेशे में काम करने वाले कर्मचारियों का बड़ा सम्मान है। शिष्य गुरु के पांव छूते हैं। उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने बी.एस.सी की। इसके उपरान्त एम.एस.सी मैथ की। अब उसने अध्यापक बनने के लिये बी.एड का कोर्स भी पूरा कर लिया था और यूनिवर्सिटी में डिसटिंक्शन कर, कॉलेज का नाम भी रोशन किया था।

अध्यापक बनने के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना ज़रूरी था। इसके बिना चुनाव असम्भव था। लिहाज़ा इस परीक्षा के लिये नियत फॉर्म उसने भर दिया था। परीक्षा की तैयारी उसने मन लगाकर कर डाली थी। उसको विश्वास था कि वह इस इम्तिहान में सफल हो जाएगी। परन्तु परिणाम आया तो क़िस्मत उसे धोखा दे गई। निर्धारित क्राइटीरिया से उसके दो नम्बर कम आए थे। वह हाथ मलकर रह गई थी। अब उसने नये सिरे से तैयारी आरम्भ कर दी थी। दूसरी बार अपीयर होने पर भी नतीजा वही ढाक के तीन पात ही निकला था। वह बहुत दु:खी हुई थी। शायद अध्यापक बनना उसकी क़िस्मत में नहीं था। एक दो बार बैंक में प्रोबेशनरी ऑफ़िसर के लिये भी एग्ज़ाम दिया था परन्तु असफलता ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। रिश्वत और कोई बड़ी सी सिफ़ारिश उसके पास नहीं थी। हाथ-पैर मारने के उपरान्त जब उसकी दाल नहीं गली तब उसने बच्चों के पढ़ाने के लिये ट्यूूशन सैंटर घर में ही खोल लिया था। पहले-पहल तो एक दो विद्यार्थी ही आये थे परन्तु जब शहर वासियों को पता चला कि वह अच्छा पढ़ाती है तो उसके पास काफ़ी सारे छात्र आने लगे थे। वह पन्द्रह, बीस हज़ार प्रति माह कमाने लगी थी। अब वह अपने माता-पिता की आर्थिक सहायता भी करने लगी थी। अच्छी कमाई के बावजूद सरकारी नौकरी पाने की क्रेज़ मिटी नहीं। लायक़ होते हुए भी सरकारी नौकरी उसे प्राप्त नहीं हो सकी थी।

एक बार पुन: उसने टीइटी पास करने की ठान ली थी। इस बार जो प्रश्न पत्र आया उसके सारे सवालों को वह आठवीं, दसवीं और प्लस टू के विद्यार्थियों को रोज़ाना पढ़ाती थी। पेपर सैंट परसैंट अच्छा हुआ और वह टीइटी के अच्छे अंक लेकर पास हो गई।

उसे अपॉइंटमेेंट लैटर भी मिल गया। उसे बठिंडा के एक प्राईमरी स्कूल में हाज़िर होना था।

उसके ऑर्डरों पर साफ़ लिखा था कि दो वर्ष के लिये केवल दस हज़ार वेतन फिक्स मिलेगा। दो वर्ष प्रोबेशनरी पीरियड बीत जाने के बाद पूरा वेतन तीस हज़ार मिलेगा। दीक्षा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थी। वह जाॅॅॅइन करे या न करे। इतनी दूर यदि वह पेईंग गेेस्ट रही तो दस हज़ार तो उसको देने पड़ेंगे। घर आने-जाने का और कपड़ों का ख़र्च अलग से। पन्द्रह, बीस हज़ार गंवाना और दस हज़ार की नौकरी करना कोई अक्लमंदी नहीं थी। लेकिन जब उसने मम्मी-डैडी से बात की तो उन्होंने सरकारी नौकरी को जाॅॅॅइन करने का ही परामर्श दिया था। दीक्षा ने मां-बाप की आज्ञा के आगे सर झुका दिया था। उसने सरकारी सर्विस जाॅॅॅइन कर ली थी।

इधर उसने सरकारी नौकरी संभाली रिश्ते आने आरम्भ हो गये थे। पढ़ी लिखी सरकारी नौकरी वाली लड़की की लोगों में बड़ी डिमांड थी। हर कोई चाहता था कि उनको कमाऊ बहूू मिले। कई लोग तो नौकरी वाली बहूू मिल जाने पर जन्म कुंडली मिलाना भी उचित नहीं समझते। कमाऊ बहूू न हो तो कई नख़रे करते हैं, लड़की मंगलीक है हमारा लड़का मंगलीक नहीं है, लड़की का रंग काला है, क़द छोटा है, मोटी है या ज़्यादा ही पतली है। नौकरी वाली सरकारी वेतन पाने वाली के सारे दोष गौण हो जाते हैं।

एक जे.ई लड़के को दीक्षा काले रंग की होने के बावजूद भी पसंद आ गई थी। दीक्षा अभी शादी नहीं करना चाहती थी, मगर मां-बाप ने जे.ई लड़के का रिश्ता मिलने पर खुशी अनुभव की थी। यह सरकारी नौकरी का करिश्मा था कि दीक्षा को इतना अच्छा वर मिल रहा था। अत: दीक्षा की शादी धूम-धाम से बिना दहेज के हो गई थी। दीक्षा की सरकारी नौकरी उसके लिए अच्छा ख़ासा वरदान सिद्ध हुई थी।

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