-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियां लंगोट लगा कर वोटर अखाड़े में एक दूसरे को चित्त करने के लिये तैयार हो जाती हैं। क्योंकि जो पार्टी चुनाव जीत जायेगी वह पांच वर्षों के लिये सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हो जाएगी इसलिये हर राजनीतिक दल साम-दाम दण्ड-भेद छल-कपट और हर प्रकार के मिथ्य दावों का ढिंढोरा पीटता है। हर विरोधी पार्टी दूसरी पार्टी को नीचा दिखाने का प्रयास करती है। एक दूसरेे पर छींटाकशी तो करती ही है गाली-गलौज और अभद्र भाषा के प्रयोग का प्रचलन भी आरम्भ हो गया है। महिलाओं को बेइज़्ज़त करने से भी नेतागण बाज नहीं आते। जनता के साथ बड़े-बड़े वादे किये जाते हैं। रोटी, कपड़ा और मकान देने के वादे, आतंकवाद से छुटकारा दिलवाने के वादे, बेरोज़गारी ख़त्म करने के वादे, गरीबों को घर देने के वादे, शौचालय बनाने के वादे, राम मन्दिर बनवाने के वादे, 370 तोड़ने के वादे, पैंशन देने के वादे, किसानों केे कर्ज़ माफ़ी के वादे, बेरोज़गारों की पैंशन के वादे। सभी तरह के वादे किये जाते हैं ताकि राज सत्ता की कुर्सी मिल जाये और पांच वर्ष मनमानी करके धन के अम्बार लगाये जाएं। बंगले, कारें और बेनामी सम्पत्ति ख़रीदी जा सके। काला धन स्याह सेे सफ़ेद किया जा सके। अब राजनीति दूसरे व्यवसायों की तरह धन कमाने का ज़रिया बन चुकी है। इस व्यवसाय से लाखों, अरबों ख़रबों का धन कमाया जा सकता है। अब राजनीति पुश्तैनी परम्परा बन चुकी है। पहले गांधी परिवार पर आरोप लगाया जाता था। जवाहर लाल, इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी को लपेटे में लिया जाता था परन्तु अब सभी पार्टियों में कुुनबा परवरी हो रही है। लालू का नाम लोगे या चौटाला का, बादल का, फारूख का, मायावती का, शरद पवार का, देवगौड़ा का, या दिग्विजय का, राम विलास पासवान का या शिवसेना के नेताओं का, भाजपा, कांग्रेस राजग या नैशनल कांफ्रेंस और पी.डी.पी सभी अपनी विरासती जागीर को बचाने में लगेे हैं। अपनी क़ामयाबी के लिये चाहे लूट-पाट-हत्या और अमर्यादित तरीक़ेे क्यों न अपनाने पड़ें, दंगे क्यूं न फैलाने पड़ेें सभी प्रकार के हथकंडे प्रयुुक्त किये जाते हैं। झूठा प्रोपेगंडा करके जनता को झूठे वादों में उल्झाया जाता है, लच्छेदार भाषणों और जुुमलों से भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाकर विश्वासघात किया जाता है। जहां तक मेरा ख़्याल है परिवारवाद का रोना बंद कर देना चाहिए, क्योंकि संविधान के 84 अनुच्छेद के अनुसार भारत का वह नागरिक जिसकी आयु 25 वर्ष की है, लोकसभा का चुनाव लड़ने का अधिकार रखता है। परिवारवाद का लांछन उचित नहीं है। चुनाव जनता ने करना है। लोकमत जिसके पक्ष में होगा चुना जायेगा। परन्तु चुनाव का व्यवसायीकरण घातक है। जब सांसद को कार, बंगला, तनख़ाह और पांच वर्ष की अवधि पर पैंशन का व्यवधान है फिर इतनी लोलुपता क्यूं?

 हिन्दु मुस्लिम और जात-पात के दंगे उचित हैं क्या? सिर्फ़ व्यवसाय के लिये चिपके रहने के लिये ही तो। क्योंकि मंत्री या विधायक बन जाने पर लूट और भ्रष्टाचार का लाईसैंस मिल जाता है। देश-विदेश में पर्यटन का अवसर प्राप्त हो जाता है। नौकर शाही और पुलिस से मिलकर ग़ैर कानूनी धन्धों से धन अर्जित करने का परमिट मिल जाता है। देश की अवनति का ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ कर अपना उल्लू सीधा किया जाता है। गड़ेे मुर्दे उखाड़ने में ही वक़्त गुज़ार दिया जाता है। अपने शासनकाल से अच्छे दिन ला सकते हो तो लाने चाहिये। पिछली गई गुज़री बातों से अवाम ने क्या लेना है, मौजूदा सरकार को अपना दायित्व निभाना चाहिये। असली मुद्दे हैं शिक्षा, स्वास्थ्य, लोगों के जान-माल की रक्षा, स्त्रियों-महिलाओं को समाज में न्याय, देश की सुरक्षा। परन्तु यहां तो हिन्दुत्व, राष्ट्रीय-गान और बन्दे मातरम् पर भूचाल मचा रहता है। आतंकवाद और नक्सलवाद और पाकिस्तान की गोलाबारी से नागरिक मरते रहते हैं और सत्ताधारियों के कानों पर जूं नहीं रेंगती। अब आप अनुमान लगाओ जिस उम्मीदवार ने करोड़ों रुपये चन्दा देकर उम्मीदवारी प्राप्त की है वह घोटाले नहीं करेगा क्या? वह मंत्री बनकर देश का क्या संवारेगा? अपने विभाग में हेरा फेरी से पैसे नहीं कमाएगा क्या? इस लोकतन्त्र में गांव का सरपंच, ब्लॉक का चेयरमैन, विधायक और मंत्री सब अपनी झोलियां भरते हैं।

 एक सर्वेक्षण में यह उभरकर सामने आया था कि सबसे ज़्यादा कालाधन राजनेताओं के पास होता है जबकि स्मगलर और नौकरशाही दूसरे और तीसरे दर्जे पर हैै। जिसको कोई पार्टी कोई ओहदा नहीं देती या तो वह अपना नया दल बना लेता है या किसी अन्य पार्टी का दामन थाम लेता है। किस लिये? पैसे शौहरत और सत्ता के लिये ही तो।

 चुनाव प्रचार के लिये बड़ी-बड़ी रैलियां की जाती हैं, किराये की भीड़ जुटाई जाती है। पैसों की बरसात की जाती है, मदिरा के नल खोले जाते हैं, यह पैसा अक्सर जनता से ही तो वसूला जायेगा। यह कैसा लोकतन्त्र है जहां करोड़ों लोग रात को भूखे सोते हैं, सर्दी में सड़कों पर ठिठुरते हैं। और सत्ता के अधिकारी होटलों में महिलाओं का चीर हरण करते हैं। अब चुनाव में जीतने के लिये मन्दिर-मन्दिर, मस्जिद-मस्जिद, राम, कृष्ण, बजरंगबली को इस दलदल में घसीटा जा रहा है। अली-बजरंग बली और धर्म का ध्रुवीकरण हो रहा है। बाहुबलियों की गुंडागर्दी, मॉब लिंचिंग, गौ रक्षा, और धर्म की निष्ठा इस तनातनी में हाशिये पर पहुंच गये हैं। जो साधुु महात्मा प्रभुु सिमरन में लगे रहते थे, समाज को मानवता का पाठ पढ़ाते थे। अब वे साधु और साधवियां भी इस निर्वाचन में कूद पड़ी हैं। राजनीति में महिलाओं का प्रवेश वर्जित तो नहीं है परन्तु जिस तरह से साधवियां इस क्षेत्र में आई हैं इससे उनका धन प्रलोभन ही झलकता है। साधु साधवियों को सत्ता से क्या लेना देना उन्हें धर्म के प्रचार–प्रसार और आडम्बरों से दूर रहने का ही पल्लू पकड़ना चाहिये।

परन्तु पैसा क्या-क्या नाच नहीं नचाता, इन राजनेताओं ने संगीतकारों, कलाकारों, गायकों, खिलाड़ियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को भी अपनी-अपनी पार्टी में सम्मिलित कर लिया है। जो अभिनेता, अभिनेत्रियां, लोकप्रियता कमा चुकेे है, जिनके लाखों चाहने वाले हैं और उनकी कला के फैन हैं वे अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिये चुनाव में उतर रहे हैं ताकि चुनाव में बहुमत प्राप्त हो सके। इन कलाकारों के पास धन की कमी नहीं होती। चुनाव में ख़र्च कर सकते हैं। पैसा ख़र्चो और पैसा कमाओ, राजनीति में यह खुली छूूट है।

 अगर कोई चुनावी सदस्य हार भी जाता है तो जीतने वाली पार्टी उसको कोई बड़ा, ओहदा और विभाग दे सकती है। इसलिये फ़िल्मी कलाकार धड़ाधड़ इसमें प्रवेश कर रहे हैं।

 इसके अतिरक्ति बाहुबली अपराधी भी पार्टी की शोभा हैं क्योंकि इनके बिना गुंडागर्दी फैलाने का और कोई तरीक़ा नहीं। बूथ कैप्चरिंग इनके बग़ैैर हो नहीं सकती। ई.वी.एम. हाईजैक इनके बिना सम्भव नहीं है।

अत: पॉलिटिक्स से अच्छा कौन सा व्यवसाय है जिसमें कोई भी उम्रभर रिटायर नहीं होता। सत्ता की मलाई चाटता रहता है।

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