Geeta Dogra

samlangik

अमेरिका में समलैंगिकों के हक़ में लड़ाई लड़ने वाले पंजाबी उर्दू व अँग्रेज़ी के रचनाकार इफ़्तिकार नसीम इफ़्ती की ख़्वाहिश ही नहीं, माँग थी कि भारत व पाकिस्तान सरकार अपने-अपने देशों में समलैंगिकों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए और भारतीय दंड विधान की धारा 377 में संशोधन भी हो। कारण स्पष्‍ट है कि इन दोनों देशों में समलैंगिकों की स्थिति बद से बदतर है। न तो समलैंगिकों को समाज पचा पा रहा है और न ही सरकार।

11040923_900511933331896_698505455466897431_nपाकिस्तान में समलैंगिकता को घृणित अपराध क़रार दिया गया था और इसके लिए सज़ा का प्रावधान था जबकि ऑस्ट्रेलिया में वर्षों की लामबंदी के बाद राजधानी कैनबरा में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला विधेयक पेश किया गया था। और फिर बाद में कई देशों में समलैंगिक विवाहों को मान्यता मिलने की ख़बरें आई।

इधर भारत में पैसा कमाने के लिए युवक समलैंगिक संबंध बनाने के लिए इस गोरखधंधे में कूद रहे हैं। संचार क्रांति के इस दौर का फ़ायदा जहाँ ऐजूकेशन और इंडस्ट्री में किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इंटरनेट के माध्यम से युवकों को इस गोरखधंधे में लाने के लिए विज्ञापन भी दिए जा रहे हैं। इस विज्ञापन में महानगरों के बेरोज़गार युवक या इस प्रवृत्ति के युवक एक बार फँसते है तो उबरने का कोई रास्ता ही नहीं बचता।

सबसे अहम सवाल यही है कि क्या ऐसे संबंध उचित हैं? स्त्री वेश्यावृत्ति अब गए ज़माने की बात हो गई, पुरुष वेश्यावृत्ति पुरुष के साथ एक ऐसा अध्याय है जिस पर इतनी चर्चाएं होने के बावजूद सही-ग़लत का फ़ैसला ही नहीं हो सका।

पुरातन काल में एक राजा की सैंकड़ों रानियां अपनी कामवासना शान्त करने के लिए दासियों या अन्य रानियों से संबंध बनाती थी। पर-पुरुष से संबंध बनाना उनके बस में था नहीं। वह पाप था पर समलैंगिक संबंध बनाना किसी अपराध में शामिल ही कहाँ था? सेक्स प्रकृति का अनुपम उपहार है काम पिपासा शान्त करने का अर्थ यह क़तई नहीं कि उसका घिनौना रूप प्रस्तुत किया जाए।

भारतीय संस्कृति की परम्परा ने एक स्त्री+एक पुरुष रिश्ता क़ायम किया, दो पुरुषों की परिभाषा बेशक नहीं दी पर समलैंगिक संबंधों की बात कहीं है ही नहीं, ऐसा भी नहीं है। यह रिश्ते भी इसी समाज में पनपे और फल-फूल रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय संस्कृति समृद्ध इतिहास लिए है। उसमें खोखले रिश्तों का कहीं कोई आधार नहीं, पर इसके बावजूद यह संबंध बढ़ रहे हैं, आकर्षण है या मात्र काम पिपासा शान्त करने का माध्यम। दोनों ही दृष्‍टियों में अब इस पर कई विचार आए पर निष्कर्ष कुछ भी नहीं निकला। समाज ने इसे घृणित अपराध क़रार दिया है, पर साम्य समाज की परिकल्पना भी आज कहाँ है?

इस आज़ाद मुल्क में भारतीय नागरिक अपनी काम पिपासा शान्त करने के लिए किसे चुनता है, यह उसकी पसंद है इस ‘पसंद’ को अपराध की दृष्‍टि से नहीं देखा जाता बल्कि किसी की इच्छा के विरुद्ध सेक्स करना अपराध है। हां, स्वास्थ्य की दृष्‍टि से तो दोनों पहलुओं पर विचार करना होगा। वे सामान्य संबंध हो या समलैंगिक।

हमारी बदल रही जीवन शैली इन संबंधों की नींव है। हालांकि असुरक्षित यौन संबंध, एड्स जैसी बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इसका भरपूर प्रचार-प्रसार हो रहा है पर पंजाबी गबरू कहाँ समझ रहा है?

सच तो यही है कि ऐसे संबंध पनपते हैं तो वे ज़्यादा देर तक नहीं टिकते, भारत में पंजाब में विशेष कर पिछले दिनों समलैंगिकों की शादियों का प्रचार-प्रसार करने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई, बढ़ावा मिला तो फिर नए संबंध समाज के समक्ष आए, पर टिके कहाँ! कुछ भी हो, कुदरत के ख़िलाफ़ जब-जब कोई क़दम उठाएगा, उसका हश्र तो अच्छा न होगा।

-गीता डोगरा

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