-गोपाल शर्मा फिरोजपुरी

रिश्ता तो उन्होंने खुद क़बूल किया था। हमने कोई मिन्नत या ज़बरदस्ती नहीं की थी। हम ग़रीब ज़रूर थे परन्तु स्वाभिमानी थे। पिता जी नहीं थे इसलिए पिता जी की ज़िम्मेदारी मां ने निभाई थी। मां ने मुझे जिन हालातों में पढ़ाया था। केवल मैैं ही जानती हूं। ज़मींदार के खेत से मूलियों का टोकरा ख़रीद लाती थी और उन्हें बेचकर घर का ख़र्च चलाती थी। मैं भी स्कूल की छुट्टी के उपरान्त कभी कभी उसके धन्धे में हाथ बंटाती थी।

मां चाहती थी कि मैं अपने पांव पर खड़ी होकर उसके बुढ़ापे का सहारा बन सकूं। इसलिए उसने मुझे प्राइमरी अध्यापिका बनने के लिये ई.टी.टी में प्रवेश दिलवा दिया था। मैं बड़े लग्न से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही थी। इसलिए ई.टी.टी की परीक्षा में मैं प्रांत भर में प्रथम रह कर उत्तीर्ण हो गई थी।

चूंकि मैरिट में मेरा पहला नम्बर था इसलिए नज़दीक के गांव में अध्यापिका के तौर पर मेरी नियुक्ति हो गई थी।

वेतन अच्छा था। मैं बड़ी सतर्कता से बजट तैयार कर रही थी इस लिये घर की आर्थिक दशा सुधरने लगी थी। पिछले दो वर्षों में मैंने एक कमरा पक्की ईंटों का बना लिया था। मेरे सर्कल में पढ़ेे-लिखे लोग थे। ऐसा करना अनिवार्य था।

उधर मां को मेरी शादी की चिन्ता सताने लगी थी। जब भी उसे मौक़ा मिलता कहती “बेटा मैं नदी के किनारे का वृक्ष हूं कब गिर पड़ूं पता नहीं, इसलिए मेरी जीते जी अपना घर संसार बसा लो।” उत्तर में मैं कहती “ऐसा क्यूं कहती हो, भगवान आपकी उम्र लम्बी करें।”

मां की व्याकुलता देख हमारी पड़ोसिन चाची रेखा ने एक लड़का हमें सुझाया था। लड़का बैंक में कैशियर था।

मां ने घर रिश्ते के लिये हां कह दी थी। लड़के वाले भी बिना दहेज़ के शादी करने को राज़ी हो गये थे। इसलिए मैं राजीव से विवाह बन्धन में बंध गई थी।

मायके से ससुराल जाते समय मुझे रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने नसीहत दी थी कि पति का घर परमेश्वर का घर होता है। भगवान् की तरह उसकी पूजा करनी चाहिये उसकी लम्बी उम्र के लिये करवा चौथ का व्रत रखना चाहिये। सास ससुर की आज्ञा में रहना चाहिये।

ससुराल में क़दम रखते ही मेरी सारी खुशी हवा हो गई थी। दहेज़ के लिये मुझे प्रताड़ित किया जाने लगा था। दाल-भाजी में नमक कम-ज़्यादा होने पर राजीव मेरी पिटाई करने लगा था। शराब पीने का वह आदी था। जब कभी भूख लगने पर भोजन कर बैठती, तो आते ही पिटाई इसलिए कर देता कि मैंने उसका इन्तज़ार क्यूं नहीं किया। जब कभी वह अपनी रंगीन महफ़िल से घर लेट लौटता तो मेरे इन्तज़ार के बदले कहता हरामज़ादी किसका शोक मना रही थी क्यूं नहीं खाना खाया, तड़ाक-तड़ाक दो थप्पड़ जड़ देता। मैं सास-ससुर से शिकायत करती तो उत्तर मिलता तुम्हारे मियां बीवी का मसला है, हम क्या करें।

पानी सर से ऊपर होता जा रहा था। वह मेरे चरित्र पर भी सन्देह करने लगा था क्योंकि मेरे पुरुष कलीग थे। एक दिन अपनी व्यथा मैंने अपने स्टाफ़ को व्यक्त कर दी थी।

मेरी बात सुनकर राघव ने उत्तर दिया था। आजकल ज़माना बदल गया है। अगर आपका शौहर आपको तंग करता है तो आप उससे तलाक लेकर छुटकारा पा सकती हैं।

“मेरे दोस्त, नारी के लिये आधुनिक युग में भी मुसीबतें ही मुसीबतें हैं, कहां जाऊं किसके सहारे जीऊं।”

राघव ने उत्तर दिया, “क्यूं खूबसूरत हो जवान हो व्यवसायी हो बीसियों हाथ थामने वाले मिल जायेंगे।”

मैंने उसकी बात को काटते हुये कहा, “आप अविवाहित है, क्या आप थामोगे मेरा हाथ।”

राघव का चेहरा देखने लायक़ था। वह कुछ देर ख़ामोश रहा फिर वह गर्म जोशी से बोला मैं तैयार हूं। सारे स्टाफ़ ने ताली बजाकर अभिवादन किया।

अब मैंने राजीव को तलाक दिया। अपना भगवान् बदल कर राघव से शादी कर ली। जिस दिन से मैंने अपना भगवान् बदला है बड़े इत्मिनान से ज़िन्दगी गुज़ार रही हूं। अपनी मां की भी आर्थिक सहायता कर रही हूं। मेरा नया भगवान मुझे पूर्ण सहयोग दे रहा है।

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