-गोपालशर्मा फिरोज़पुरी

भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण साधन है। भाषा के माध्यम से मौखिक या लिखित रूप में अपने विचारों की लड़ी को एक दूसरे से जोड़ा जा सकता है। यदि यह कहा जाए कि भाषा से समाज और राष्ट्र का उत्थान होता है तो अतिशयोक्ति नहीं। भाषा के अभाव में कोई देश समृद्ध नहीं हो सकता। भाषा सभी टेक्नोलॉजी, विज्ञान के अविष्कारों और नये अन्वेषणों और एनर्जी की जननी है। संसार में कितनी ही भाषाएं प्रयुक्त की जाती हैं वे सभी समाज के लिए हितकारी हैं। हमारे राष्ट्र के संविधान में 48 भाषाओं को मान्यता है जिनमें हिन्दी प्रमुख है। हिन्दी लगभग सारे राष्ट्र में बोली जाती है। भारत के विभिन्न प्रांतों में अपनी निजी भाषा भी प्रयुक्त होती है जैसे बंगाल में बंगाली, महाराष्ट्र में मराठी, आन्ध्र में तेलुगू और पंजाब में पंजाबी आदि। इन भाषाओं का अपने अपने प्रांत में विशेष महत्त्व है।

भारत में अग्रेज़ों ने लगभग 200 वर्ष राज किया। लार्ड मैकाले ने अंग्रेज़ी भाषा का प्रचलन भारत में इसलिए किया ताकि भारत के लोग अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग से अपने राज काज के कार्य सम्पूर्ण कर सकें। इसलिए उसने स्कूलों में अंग्रेज़ी विषय को लागू किया और पढ़े लिखे क्लर्क भर्ती किए। अब जबकि अग्रेज़ों की ग़ुलामी से हम मुक्त हो चुके हैं फिर भी अंग्रेज़ी हमारे साथ चिपकी हुई है तर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेज़ी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और यह संसार की लिंक लैंग्वेज है। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेज़ी साईंस और टेक्नोलॉजी की भाषा है, इसके बिना विकास और प्रगति असम्भव है। कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल सब अंग्रेज़ी के खिलौने हैं। इसी वजह से निजी स्कूलों में अंग्रेज़ी का बोल-बाला है। पंजाबी माध्यम स्कूलों में लोग बच्चों का एडमिशन नहीं करवाते। जिन लोगों ने कानून बनाने होते है, मंत्रीगण अपने बच्चों को विदेश में शिक्षा दिलवाते हैं या बड़े अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में दाख़िल करवाते हैं। कारण यह है कि अंग्रेज़ी जानने वाले ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट को नौकरी शीध्र मिल जाती है। जबकि पंजाबी पढ़े लिखे व्यक्ति को नौकरी के लिये ठोकरें खानी पड़ती हैंःः।

परन्तु प्रांतीय भाषा पंजाबी के बिना बच्चे का विकास अधूरा है। यह मातृ भाषा है जो बच्चे को मां के दूध से प्राप्त होती है। इस लिए यह बच्चे पर बोझ नहीं बनती बल्कि सहज भाव से बिना प्रयत्न के सीखी जा सकती है। पंजाब में पंजाबी बोल-चाल की भाषा है। यह बच्चे का सर्वांगीण विकास करती है। शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संतुष्टि होती है। पंजाबी के बिना पंजाब के लोगों का उत्थान नहीं हो सकता। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि पंजाबी भाषा का सरकारी प्रोत्साहन अवहेलित है। सरकार निजी स्कूलों में प्रथम श्रेणी से पंजाबी पढ़ाने का फरमान नहीं लगाती, इसके अतिरिक्त सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा से अंग्रेज़ी अनिवार्य करने का आदेश है यह नीति उचित नहीं है।

समझ से परे की बात है कि अंग्रेज़ी को इतना अधिमान क्यूं दिया जाता है। रूस जापान अंग्रेज़ी की बनिस्बत अपने देश की भाषा का प्रयोग करते हैं तो क्या वे विकसित देश नहीं हैं। अंग्रेेज़ी के बिना रामायण और महाभारत काल में साईंस और टेक्नोलॉजी क्या उन्नत नहीं थी। क्या गुुप्त काल अंग्रेज़ी के बिना स्वर्ण युग नहीं था ?

अपने देश में अंग्रेज़ी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का इतना चलन है कि कई लोगों का मत है कि पंजाब में पंजाबी का भविष्य धुंधला है, और संस्कृत भाषा की तरह यह भी निम्न स्तर की न हो जाए। संस्कृत जो कभी भारत की उत्कृष्ट भाषा थी जिसमें विदेशी लोग पढ़ने के लिये नालन्दा और तक्षशिला के विश्वविद्यालयों में आया करते थे आधुनिक संदर्भ में फ़ीकी और कमज़ोर पड़ गई है, उसके स्थान पर संस्कृत की बेटी हिन्दी बहुत फली फूली है। हालांकि संस्कृत में लिखे नाट्य शास्त्र और कालीदास द्वारा लिखित नाटक मेघदूत और शकुन्तला बहुत चर्चित रहे हैं पर अब समय की गति के साथ संस्कृत पढ़ने का रुझान कम हो गया है। इसका प्रमुख कारण है कि संस्कृत कभी भी आम जन की भाषा नहीं रही है। यह विद्वान ब्राह्मणों की भाषा रही है। दूसरे शब्दों में यह जासूसी भाषा ही मानी जायेगी। जनसाधारण से इसका कोई लेना देना नहीं रहा है। आम लोग इसे पढ़ने से वंचित रहे हैं।यह गुप्तचरों की भाषा ही मानी जाएगी। इसके मन्त्रों, श्लोकों का आम लोगों से कोई सरोकार नहीं रहा वे इसे समझने में असमर्थ रहे हैं। इसलिए यह ज़्यादा प्रगति नहीं कर सकी फिर भी यदा-कदा इसका अस्तित्व बना हुआ है।

पंजाबी पंजाब के सभ्याचार की भाषा है हमेें अपने मां-बाप से विरासत में मिली हुई है। यह जन साधारण और लोक भाषा है। हम जितनी मर्ज़ी अंग्रेज़ी पढ़ लें परन्तु विचारों की अभिव्यक्ति में हम कहीं न कहीं अटक कर रह जायेंगे। हमारे मेले त्योहारों, विवाह शादियों पर घोड़ियां, सुहाग, छन्द और सीठणियां अंग्रेज़ी में व्यक्त नहीं की जा सकती। अपनी मां बोली में व्यक्ति के चरित्र निर्माण से लेकर उसकी सम्पूर्ण भलाई निहित है। इसलिये इसका भविष्य अंधकारमय नहीं उज्जवल है। पंजाबी के विद्वान अपने निजी हितों को छोड़कर इसके उत्थान में सैमीनार लगा रहे हैं।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला पंजाबी भाषा के उत्थान के लिये कार्यरत हैं। भाषा विभाग पंजाब जन साहित्य और अन्य पत्रिकाओं के माध्यम से पंजाबी भाषा को सींच रहा है।

पंजाबी केन्द्रीय लेखक सभा लगातार इसको समर्थन दे रही है। पंजाबी भाषा के प्रचार प्रसार के लिये धरने मुजाहरे और आंदोलन कर रही है। पंजाब जागृृति मंच भी पंजाबी के उत्थान के लिए लगातार कार्यशील हैैै।

अन्य प्रयत्नों के अलावा पंजाब जागृति मंच जालंधर द्वारा हर वर्ष बहुत ऊंचे स्तर पर पंजाबी जागृति मार्च का निकालना भी उल्लेखनीय है। पंजाब के हज़ारों लेखक पंजाबी साहित्य रचकर पंजाबी भाषा को चार चांद लगा रहे हैं। पंजाब में लाखों की संख्या में इस भाषा में पुस्तकें छप रही है। पंजाबी सभ्याचार के गीतों की कैसेट बसों, ट्रैक्टर, ट्रालियों में गूूंजती है। सबसे महत्वपूर्ण रोल पंजाबी फिल्में निभा रहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पंजाबी नाटक और फिल्में पंजाबी भाषा को ऊंचा उठा रही हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी के ज़्यादा प्रोग्राम पंजाबी भाषा से सम्बधित होते हैं। अब पंजाबी भाषा पंजाब तक ही सीमित नहीं रही है, विदेशों में बसने वाले पंजाबी भाई इसको विदेशों में भी फैला रहे हैं।

अतः कहा जा सकता है कि पंजाबी लिटरेचर दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्क़ी कर रहा है। पंजाब सरकार को चाहिये कि वे पंजाबी भाषा को राज्य में हर कार्य के लिए और दफ्तरों में अनिवार्य करे। पी.सी.एस एवं अन्य सिविल सर्विसिज़ की परीक्षा पंजाबी में ली जाए।

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