वैलेन्टाइन डे मनाने दीजिए।

-राजेश मिश्रा कठुआ

वैलेन्टाइन डे से तात्पर्य ऐसे दिन से है जो प्रेमी-प्रेमिका के रूप में योरोप के कई देशों में बड़ी-धूम धाम से मनाया जाता है। प्रेमी और प्रेयसी एक दूसरे को उस दिन सुगन्धित फूल या भेंट स्वरूप कोई तोहफ़ा देकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं- अपने प्यार को मज़बूत और चिरगामी बनाने की कामनाएं करते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। इस दिन की शुरुआत पश्चिमी देशों से मानी जाती हैं क्योंकि हमारी संस्कृति में प्रेमी-प्रेमिका कहलाना अश्लीलता मानी जाती है। वैसे तो हमारा भारत मेले-त्योहारों और उत्सवों का देश हैं यहां सामाजिक-धार्मिक और राजनीतिक त्योहार खूब बढ़चढ़ कर मनाये जाते हैं। यहां प्रेमी-प्रेमिकाएं तो हो सकती हैं परन्तु वे गौण और मौन रह कर माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों से छिप-छिप कर प्रेम करते हैं। प्रेम करने का या उसे ज़ाहिर करने का कोई दिन निश्चित नहीं है- तोहफ़े भी दिए जाते हैं परन्तु किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होती। जबकि विदेशों में प्रेमी और प्रेयसी के दिन की निश्चित तिथि 14 फरवरी है और उस दिन वे खुलकर अपने प्रेम का प्रदर्शन करते हैं नाचते, झूमते, गाते – आलिंगित होते एक दूसरे का चुम्बन लेते दिखाई देते हैं। भारत चूंकि विभिन्नता भरा देश है- कई समुदाओं और धर्मों के कारण यहां पर भी वैलेन्टाइन डे मनाने का रिवाज़ चल पड़ा है। कुछ लोग इसके हक़ में भी हैं और कुछ इसके विरोध में हैं परन्तु इन सब आलोचनाओं के बावजूद हमारे देश की युवतियां और युवक इसकी ओर आकर्षित हैं और वे इस दिन को मनाने के लिए हर वर्ष 14 फरवरी का बेसब्री से इन्तज़ार करते हैं। वास्तव में कोई भी रीति रिवाज़ बुरा नहीं होता कट्टरता, संकीर्णता बुरी होती है।

अब सारा संसार अपने सम्बंधों में एक दूसरे के क़रीब आ रहा है तो बड़ी सीधी बात है कि एक दूसरे की संस्कृति का प्रभाव परस्पर अवश्य पड़ेगा। पर्दा, सती प्रथा यदि मिट गई है तो यह भी पश्चिमी सभ्यता की देन है। खाने में कांटे छुरी का प्रयोग, पहनने में पैंट कोट भी तो विदेशी हैं स्वदेशी तो सलवार भी नहीं क्योंकि यह अफ़गानों की पोशाक है। आज स्त्री बाल कटवाती है जीन्स पहनती है यह भी तो विदेशी है। दरअसल हमें अपनी सोच बदलनी होगी कभी हम अभिनेत्रियों के अंग प्रदर्शन को अश्लीलता कहते हैं कभी किसी गाने को लच्चर कह देते हैं। असल में हम पहले विरोध करते हैं फिर उसी प्रथा को स्वीकार भी कर लेते हैं उदाहरण के तौर पर पहले-पहले दाढ़ी वाले व्यक्ति को बुरी नज़र से देखा जाता था- कहीं यह बदमाश तो नहीं। सारांश में यदि यह कहा जाए कि समय के साथ-साथ नैतिक मूल्यों में परिवर्तन होता रहता है तो कुछ ग़लत नहीं है। कुछ लोग यदि मर्यादा में रहकर वैलेन्टाइन डे मनाना चाहते हैं तो उनकी इच्छाओं पर अंकुश लगाने वाले हम कौन होते हैं जो नहीं मनाना चाहते उनको मनाने के लिए विवश करने का हमें कोई अधिकार भी नहीं है।

“फ़ैशनों का दौर है आने जाने दीजिए’

मनाता है जो वैलेन्टाइन डे मनाने दीजिए।”

One comment

  1. Good thinking

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