-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

जब मनुष्य आदिवासी के रूप में रहता था तो वह अपनी नग्नता को ढांपने के लिये वृक्ष की टहनियों, पत्तों और फूलों का प्रयोग करता था। वृक्षों की छाल, पत्तियां और नाज़ुक-नाज़ुक लताएं उसके शरीर को सिंगार प्रदान करती थी। यही वृक्षों के अंग-अवशेष उसकी सुन्दरता के प्रतीक थे। वृक्षों के फल और कन्दमूल उसको भोजन प्रदान तो करते ही थे इसके अतिरिक्त स्त्रियां फूलों के हार बनाकर गले में पहन लेती थी। बालों में खुशबूदार फूल लगाती थी और कानों में लताओं की टुुकड़ियां पहनती थी। उत्तर पाषाण काल हो या पूर्व पाषाण काल मनुष्य को जंगली जीवन से दो हाथ करना पड़ा था। भाषा, बोली और अभिव्यक्ति में वह किलकारियां मारता हूं, हां, हो की आवाज़ेें निकालकर गुज़ारा करता था। वह पशुओं की तरह रहता था और हिंसक पशुओं से बचने के लिये वृक्षों पर चढ़कर या गुफाओं में छिप जाया करता था।

आदियुग के बाद पत्थर युग आया। इस युग में उसने पत्थरों के औज़ार बनाए। पत्थर के औज़ारों से जंगली जानवरों का शिकार करके कच्चा मांस खाने लगा। स्त्रियों ने पत्थर के मनकों की माला पहनकर मर्दों को सम्मोहित करने का प्रयास किया। औरतों में यह फ़ैैशन चल पड़ा कि इन पत्थर के गहनों से उनकी सुन्दरता में निखार आता है। धीरे-धीरे विकास की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते मानव धातु युग में प्रवेश कर गया। धातुओं की पहचान होते ही उसने लोहे के औज़ार बनाने शुरू कर दिए।

उसने लोहे के नुकीले तीर बनाये इससे उसे शिकार करने में बहुत सुविधा होने लगी। इस समय तक उसे कृषि करने का ज्ञान भी प्राप्त हो गया था। लोहे की हल बनाकर पशुओं को प्रयोग करके उसने खेतीबाड़ी आरम्भ कर दी। इस काल में उसे बोली और स्थानिक भाषा का भी ज्ञान प्राप्त हो गया। धातु के प्रयोग से इस समाज में तांबे, पीतल, चांदी और सोने के गहने पहनने का रिवाज़ प्रचल्लित हो गया। खुशी और मेले, त्योहारों पर लोग गहने और सुन्दर वस्त्र पहनकर अपने आप को सजाने संवारने लगे। यह वह काल था जब मनुष्य ने प्रकृति से संघर्ष करके सभ्य जीवन में प्रवेश कर लिया था।

दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता सिन्धु घाटी की सभ्यता मानी जाती है। इस सभ्यता में ग्राम छोटी इकाई थी और नगरीय व्यवस्था बड़ी इकाई मानी जाती थी। नगर में पक्के मकान, गन्दे पानी का निकास, शौचालय तथा स्नानगृह स्थापित हो गये थे। गांव और नगर में रोशनी के लिए ख़ास प्रबन्ध थे। इस सभ्यता के लोग विभिन्न कलाओं, संगीत और शिक्षा के क्षेत्र में भी निपुण थे। मर्द और स्त्रियां गहने के शौक़ीन थे। इस सभ्यता में सुगन्धित प्रसाधनों और गहनों के विभिन्न नमूने भी मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि सिन्धु घाटी के लोग बड़े समृद्ध और खुशहाल थे इसलिये गहने पहनने की प्रथा भरपूर थी।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से यह पता चला है कि उस समय के लोग गहनों और कपड़ों के कितने शौक़ीन थे। स्वयं को सुन्दर और आकर्षक बनाने का रुझान उनमें विद्यमान था।

गहनों की बात करें तो प्राचीन राजे महाराजे, महारानियों और राजकुमारियों को क़ीमती हीरे, मोती, जवाहरात पहनने की बड़ी आदत थी। वे कपड़े कम और मोतियों, हीरों से जड़े हार ज़्यादा पहनते थे। सोने, चांदी और क़ीमती हीरों को लूटने के लिए वे एक राजा के भण्डार पर आक्रमण भी कर देते थे। इस होड़ में कई बार भयानक युद्ध भी हो जाते थे जिससे प्रजा का बहुत नुक़्सान होता था।

गहने त्रेता युग और द्वापर युग में भी पहने जाते थे। राम-कृष्ण भगवान भी गहनों से सुसज्जित थे। राजकुमारी हो या दासी हर महिला गहनों की अभिलाषी थी। रावण जब सीता को अपहरण करके विमान पर ले गया था तब सीता ने जाते-जाते अपने गहने गिराये थे ताकि पता चल सके कि वह किस ओर को जा चुकी हैं।

कुछ भी हो ये गहने राजकुमारों और राजकुमारियों के लिए ही उपयोगी हो सकते हैं, आम जनता के लिये ये कष्ट का कारण भी बन सकते हैं। राजे महाराजे या धनाढ्य लोग बेटियों को गहनों की भेंट दे सकते हैं उनकी देखा-देखी जनसाधारण पर यह बड़ा भारी बोझ है। आधुनिक युग पुरातन युग से भिन्न है। यह समुद्रगुप्त का स्वर्ण युग नहीं है कि कोई अपराधी सिर नहीं उठा सकता। यह सम्राट अशोक का ज़माना नहीं है कि चोरों, डाकुओं और लुटेरों के पकड़े जाने पर हाथ-पैर काट दिए जाते थे। आधुनिक लोकतन्त्र में ऐसा सम्भव नहीं है। यह तो धनाढ्य लोगों का काम है कि वे राजाओं की तरह बेटियों के विवाह पर स्वर्ण और हीरे दहेज में देते हैं। इस लोकतन्त्र के युग में दहेज का लेना देना वर्जित है, फिर भी यहां डॉक्टर की विवाह के समय बोली एक करोड़, इंजीनियर की पचास लाख, सरकारी कर्मचारी की दस लाख, आई.ए.एस और पी.सी.एस को तो पैसों में तोला जाता है। यह रिवाज़ इतना गहरा और जड़ें पकड़ गया है कि ग़रीब लोग दहेज की चक्की में पिस रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या में बेरोज़गारी, ग़रीबी और भुुखमरी है फिर भी मरते जीते लोग दहेज में सोने के गहने देने की रस्म को निभा रहे हैं। गहनों में दिलतस्पी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोगों ने बच्चों केे नाम भी इन रत्नों के नाम पर रख लिये हैं, जैसे हीरा लाल, पन्ना लाल, मोती लाल, जवाहर लाल, नूर और कोहिनूर तथा लड़कियों के नाम सोना देवी, रत्नो देवी, नूरा तथा चांदनी आदि। भला सोचो नाम रखने से न कोई पारस बनता है न कोई सोना। दहेज की बीमारी दिनों दिन बढ़ रही है।

इन गहनों की भला महिलाओं की ज़िन्दगी में कितनी और क्या उपयोगिता हो सकती है। फ़िज़ूलख़र्ची के अलावा इनके ज़िन्दगी में क्या मायने हैं। मेरा तो मानना है कि स्त्रियों के लिए गहने पहनना क़तई उपयोगी नहीं हो सकता। नथ जो लड़की को विवाह के समय पहनाई जाती है वह क्या संकेत करती है। नथ तो अड़ियल गाय, भैंस, बैल या भैंसों को पहनाई जाती है। पांव की झांझर एक क़िस्म की बेड़ी है। जो अपराधी को पहनाई जाती है। गले की ज़ंजीरी एक फन्दा है, बाहों की चूड़ियां कायरता की निशानी हैं। जब कोई किसी को लड़ाई में ललकारता है तो उत्तर मिलता है कि मैंने कौन सी चूड़ियां पहनी हैं। इसलिये चूड़ियांं स्त्री को अबला बनाती हैं। कानों के झुमके और बाली भी स्त्री को नसीहत देते हैं। ये गहने परतन्त्रता की निशानी हैं। वह इन गहनों को सम्भाले या दुश्मन का मुक़ाबला करे। चोरों, लुटेरों की नज़र तो हमेशा स्त्री के गहनों पर रहती है। ज़िन्दगी का रिस्क है गहने। हत्या, अपहरण गहनों के कारण ही तो होता है। गहनों से सुन्दरता नहीं बढ़ती सिर्फ़ अपनी अमीरी को दर्शाने का तरीक़ा है। सुन्दरता तो प्रकृति प्रदत्त होती है। सुन्दरता को आभूषणों की ज़रूरत नहीं होती।

Beauty needs no ornaments  

शायद सुंदर आंखों वाली स्त्री को हिरणी सी आंखों वाली कहते हैं। पर कसी हिरणी की आंख में तो कोई काजल नहीं होता। स्त्री के लिए केवल एक विद्या का गहना काफ़ी है जिससे वह स्वावलम्बी हो सके। गहनों की बजाए उसे शस्त्र चलाने की शिक्षा देनी चाहिए ताकि वह रानी झांसी, रणचंडी, दुर्गा और वैष्णवी बन सके। ये गहने उसके लिये उपयोगी नहीं अनुपयोगी हैं। गहनों के कराण होने वाली कितनी ही वारदातें हम गाहे बगाहे सुनते रहते हैं। कितनी ही बार स्त्रियों पर केवल गहनों के कारण जानलेवा हमले हुए हैं। एक बार तो अपराधी एक स्त्री की सोने की चूड़ियों से भरपूर बाजूू को ही काट कर ले गये थे। उसे अबला से सबला बनने के लिये तीर, तलवार और बन्दूक चलानी होगी। एक कहावत है, “भट्ठी में पड़े सोना जिहड़ा नक, कन्न खाये।”

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