-पवन चौहान

नारी के बिना किसी समाज की परिकल्पना करना दुःस्वप्न मात्र है। उसे अपमानित, उपेक्षित व प्रताड़ित करना अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने जैसा यत्न है। वर्तमान की बात करें तो नारी अपने घर में ही महफ़ूज़ नहीं है। वह अपनों द्वारा ही हिंसा का शिकार हो रही है। हमारा सामाजिक परिवेश ही कुछ ऐसा है कि महिलाएं इस हिंसा के ख़िलाफ़ खुलकर सामने नहीं आ पातीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 16 से 52 प्रतिशत महिलाओं को अपने निकट संबंधियों की हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जो किसी अजनबी द्वारा किए गए बलात्कार से भी ज़्यादा असहनीय और भयानक है। इस तरह की हिंसा के 30 से 40 प्रतिशत मामले घर की चार-दीवारी में ही दबे रह जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष विश्व में 6 करोड़ महिलाएं अपने घर की हिंसा में ही मार दी जाती हैं या कहीं गुम हो जाती हैं या फिर वे उपेक्षा का शिकार होती हैं। क्या उनके साथ यह बर्ताव मात्र इस लिए है कि वे महिलाएं हैं? यह विचारने योग्य प्रश्न है। यदि यौन दुराचार की बात करें तो भारतीय समाज में ऐसे मामले बहुत ही कम सामने आते हैं। इनकी प्रतिशतता नाममात्र है। अभद्र व्यवहार के सबसे ज़्यादा (80 प्रतिशत) मामले सामने आते हैं।

हमारे समाज का ताना-बाना ही कुछ ऐसा है कि इसमें नारी आज भी पुरुष प्रधानता के बोझ तले दबी चीख-पुकार रही है। उसे आज भी बोझ समझा जाता है। वह आज भी समाज की नज़रों में कमज़ोर, बेबस, निर्बल, असहाय व ग़ुलाम है। उसे विभिन्न अलंकार देकर अपमानित किया जाता है। उसके साथ जन्म से पूर्व से ही अत्याचार शुरू हो जाते हैं। कन्या भ्रूण हत्या इसका पुख़्ता प्रमाण है। इस जघन्य अपराध को रोक पाने में नारी की भूमिका भी अहम स्थान रखती है लेकिन नारी ही कई-कई बार इस अपराध की भागीदार बन जाती है या फिर बना दी जाती है। पंजाब, हरियाणा तो इसमें अग्रणी हैं ही लेकिन राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल, चण्डीगढ़ भी इस पाप की ओर अपने क़दम बढ़ा रहे हैं। इस अमानवीय कृत्य को रोकना होगा। हिन्दू समाज में नारी को ‘देवी’ की संज्ञा से नवाज़ा जाता है लेकिन आज यही देवी अपने अस्तित्त्व के लिए संघर्षरत दर-दर भटक रही है। घरेलू उत्पीड़न की शिकार नारी जब अपने आप को घर में डरी-डरी व सहमी, असुरक्षित महसूस करती है तो वह इससे निजात पाने के लिए इस हिंसा के ख़िलाफ़ या तो खुलकर सामने आती है या चुपचाप घर छोड़ जाती है या फिर आत्महत्या में ही इस ज़ुल्म से छुटकारा पाने का विकल्प तलाशती है। पुरुष प्रधानता की मानसिकता वाले पुरुषों के लिए नारी की तरक्क़ी उनके अहम् को चोट पहुंचाने का कारण बनती है और यही चोट किसी न किसी रूप में नारी के लिए हिंसा, अपमान व उपेक्षा के रूप में सामने आती है। आज हम मंचों से महिला सशक्तिकरण की बात बड़े ज़ोर-ज़ोर से कहते हैं। इसके बारे में हम और हमारे नेता कितने प्रयत्नशील हैं यह बात यहीं से साबित हो जाती है कि आज तक महिलाओं को विनायिका में सही स्थान नहीं मिल पाया है। 1952 से लेकर आज तक लोकसभा में महिलाओं की संख्या का आंकड़ा 62 तक  पहुंच पाया है।

माना जाता है कि विवाह नारी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है लेकिन तलाक़, घरेलू हिंसा, अपमान व दहेज के ऐसे अनगिनत मामले हैं जो इस बात को झुठला देने में पूर्णतया सक्षम हैं। पुरुष प्रधानता की ज़ंजीरों में जकड़े समाज को इन ज़ंजीरों से मुक्त करने में महिलाओं को अभी बहुत संघर्ष करना शेष है। एड्स जैसी भयानक बीमारी की रोकथाम में महिलाओं की भागीदारी बहुत महत्त्व रखती है लेकिन स्थिति यहां भी गंभीर रूप धारण किए हुए है। उसका अपने शरीर के ऊपर भी अधिकार नहीं है। वह पुरुष को एड्स से बचने के सुरक्षित तरीक़ों के लिए भी तैयार नहीं कर पाती है।

महिलाओं के अधिकारों का किसी न किसी तरह से हनन होता आया है। यह बात भारतीय समाज तक ही सीमित नहीं है। फ्रांस जैसे विकसित देश में महिलाओं को वोट देने का अधिकार 120 वर्ष के लम्बे संघर्ष के पश्चात् 1945 को प्राप्त हुआ। जापान में महिलाओं को तो क़ब्र की भूमि पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। इन दिनों जापान में तलाक़ की घटनाओं में भारी वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। अमरीका व ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों में घरेलू हिंसा के नाम पर यौन दुराचार की घटनाएं होती हैं। अर्थात् हम कह सकते हैं कि विश्व के हर कोने में महिलाओं के साथ पक्षापात पूर्ण रवैया अपनाया जाता है। वे घर, गली, सड़क, चौराहे कहीं पर भी सुरक्षित नज़र नहीं आती। महिलाओं के साथ दुराचार करने वाले अपराधियों का बरी हो जाना इन अपराधों को और हवा देता है। पढ़ी-लिखी शिक्षित नारी के होते हुए भी आज समाज में नारी का अपना स्वतंत्र अस्तित्त्व नहीं है। बदले परिवेश में हम चाहे जितना भी चिल्ला-चिल्ला कर लड़का-लड़की के एक समान होने की बात करें। लेकिन सच्चाई तो यही है कि शारीरिक संरचना को छोड़ ऐसी बहुत-सी छोटी-छोटी बातें हैं जो आज भी बेटी को बेटे से जुदा करती है। ऐसे असंख्य घर हैं, जहां पुरुष प्रधानता लड़कियों के अधिकारों को अपने पैरों तले बेदर्दी से कुचल देती है। उसे आज भी पति का उपमान लेकर चलना पड़ता है।

हर वर्ष 8 मार्च का दिन महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन इस को भी मात्र एक दिन का प्रपंच ही कहा जा सकता है। ऐसे दिवस मायने नहीं रखते जब तक इनके प्रति हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं आ जाता। सिर्फ़ काग़ज़ और भाषण तक सीमित रह कर हम अपना निर्धारित लक्ष्य नहीं पा सकते। महिला सशक्तिकरण की सार्थकता मात्र मंचों से उभरने वाले जोशीले स्वर पूर्ण नहीं कर सकते। इन स्वरों को व्यवहारिकता की पृष्ठभूमि पर अपनी सत्यता साबित करनी होगी तभी सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी जा सकती है। और महिला तथा पुरुष साथ-साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने का सामर्थ्य हासिल कर सकते हैं।

इसके लिए नारी शिक्षा सबसे अहम रोल अदा कर सकती है क्योंकि शिक्षा ही वह ज़रिया है जिसके द्वारा नारी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो सकती है। आज मुफ़्त नारी शिक्षा की बहुत आवश्यकता है लेकिन यह शिक्षा मात्र प्राइमरी स्तर पर न होकर उच्च स्तर तक मुफ़्त होनी चाहिए। भ्रूण हत्या रोकने के लिए पी.एन.डी.टी. (प्री नेटल डायम्नोस्टिक एक्ट) तथा दहेज रोकने के लिए कानून को कड़ाई से लागू करने की ज़रूरत है। घरेलू हिंसा रोकने के लिए लड़की की मायके में संपत्ति सुनिश्चत होना भी सहायक सिद्ध होगा। इसके अलावा नुक्कड़ सभाएं, नाटक, टी.वी. और मीडिया इस कार्य में प्रमुख भूमिका अदा कर सकते हैं। तभी काफ़ी हद तक महिलाओं को हिंसा, अपमान, उपेक्षा व अत्याचार से बचाया जा सकता है। लेकिन सबसे अहम है पुरुष का नारी के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव, पुरुष प्रधानता की मानसिकता का त्याग क्योंकि आज समय हमसे परिवर्तन का आह्वान कर रहा है। नारी को समाज में उचित स्थान दिलवाने की मांग कर रहा है।

 

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