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-बलदेव राज ‘भारतीय’

22 दिसम्बर की रात। सर्दी अपने पूरे यौवन पर थी। श्रीमती जी एवं बच्चे सो चुके थे। चूंकि आज मेरा जन्मदिन था और इस अवसर पर मैंने अपने कुछ साहित्यकार मित्रों को आमंत्रित किया हुआ था। उन सब के खान पान का रूखा सूखा इंतज़ाम श्रीमती जी के ज़िम्मे था। एक अच्छे पति की भांति मैं भी अपनी पत्नी के किसी काम में हाथ नहीं बंटाता। जिस कारण खान-पान की समस्त व्यवस्था का भार श्रीमती जी के कमज़ोर कन्धों पर आ पड़ा। बेचारी बहुत थक गई थी… च… च… च…। इसलिए जल्दी ही नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया। परन्तु मैं दिन भर के अपने क्रिया-कलापों की समीक्षा कर रहा था। अचानक किसी के आने की आहट से ध्यान भंग हो गया। उसने दरवाज़ा खटखटाया। मैं उठकर दरवाज़े तक गया। दरवाज़ा खोला तो सामने एक अजनबी को पाया।

“जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो, बलदेव जी।”

“जी धन्यवाद। पर मैंने आपको नहीं पहचाना।”

“पहचानोगे भी कैसे? अभी तो मैं आया ही नहीं। मैं ईस्वी सन् 2017 हूं।”

“2017 नया साल!” मेरा मुंह आश्चर्य से खुला ही रह गया।

“आइए, आइए 2017 जी, आपका स्वागत है” मैंने कहा।

“मैं अभी अंदर नहीं आ सकता, बलदेव जी। यह तो मैं सन् 2016 से कुछ अनुभव ग्रहण करने आया था। यहां से गुज़र रहा था तो सोचा कि आप जैसे लेखक से मिलता ही चलूं। आप मेरा भी साक्षात्कार किसी पत्र-पत्रिका में छपवा दें तो मुझे कुछ प्रचार मिल जाएगा।”

“देखिए 2017 जी, मैंने आज तक न तो किसी का साक्षात्कार लिया और न ही दिया। अगर आप कहते हैं तो ठीक है। आइए बैठकर बात करते हैं।” कहकर मैंने अपनी कुर्सी दरवाज़े के पास खिसका ली।

“अच्छा 2017 जी आप यह बताइए कि आप 2016 से मिलने क्यों आए थे?”

“बताया न आपको… मैं उनसे सीखने आया था कि मुझे यहां आकर क्या करना होगा?”

“तो उन्होंने क्या बताया?”

“उन्होंने बताया कि जो बेढंगी चाल वो चल रहा है, वही मैं चलूं।”

“मतलब… नए साल में कुछ भी नया नहीं होगा।”

“अरे, ऐसा कैसे हो सकता है? होगा न नया होगा। बहुत कुछ नया होगा। कैलेण्डर नया होगा। फिर हम 2016 से कम थोड़े ही हैं। हम 2016 से कुछ ज़्यादा ही करेंगे। तभी तो दुनियां हमें याद रखेगी।”

“मैं आपका मतलब नहीं समझा 2017 जी।”

“इसमें नासमझी वाली कौन सी बात आ गई, बलदेव जी? बात स्पष्ट है अगर 2016 ने एक महीने में एक सर्जीकल सट्राईक करवाई है तो मैं कम से कम दो या तीन तो करवा ही दूंगा। आख़िर मुझे 2016 सेे हर काम में ऊपर भी तो रहना है।”

“क्या हम भारत पाक विवाद सुलझने की आशा कर सकते हैं?”

“नहीं, सीमा पर युद्ध के बादल गरजते रहेंगे और आप अच्छी तरह जानते हैं जो गरजते हैं वो बरसते नहीं।”

“2017 जी, आप कुछ तो ऐसा कीजिए जो पिछले वर्षों से कुछ हटकर हो। उन्हीं की लीक पर तो मत चलें।”

“कर रहा हूं न हटकर। आपको इंटरव्यू दे रहा हूं। हां, इससे ज़्यादा हटकर करने के लिए मुझे न कहें। मैं अपने अंग्रेज़ों के दिखाए रास्ते पर ही चलूंगा। भई मैं अलग दिखने के लिए अलग से मेहनत क्यों करूं?” थोड़ा रुककर 2017 जी फिर बोले, “आप अपने चारों ओर देख रहे हैैं। कौन से विभाग में काम सही हो रहा है जो मैं करूं?”

“2017 जी, आपकी कोई ख़ास योजना या कोई ख़ास कार्य जो आप हमारे भारतवासियों के लिए करना चाहते हो?”

“हां है, मेरा यह प्रयत्न रहेगा कि आपको नए वर्ष में अख़बार न ख़रीदने पड़ें। आप पुराने अख़बारों से ही काम चला सकें। सिर्फ़ उनकी तारीख़ मत पढ़ें। यह वादा रहा आपसे कि अख़बार आपको पुराना नहीं लगेगा।”

“सन् 2017 जी, आप यह बताइए कि बेरोज़गारों के लिए आप क्या करेंगे?”

“कमाल करते हैं आप भी। यह मेरा अधिकार क्षेत्र थोड़े ही है। यह क्षेत्र तो आज के सफ़ेदपोश बगुला-भगतों का है।”

“फिर भी यह तो बता दीजिए कि आप कितने लोगों को नौकरी दिलवाएंगे?”

“देखिए नौकरी दिलवाना अपने वश की बात नहीं। मुझे यह समझ नहीं आता कि आपने यह प्रश्न मुझसे क्यों पूछा? आपको तो यह प्रश्न पूछना चाहिए था कि मैं कितने लोगों की रोज़ी-रोटी छीनूंगा?”

“यह आप क्या कह रहे हैं? आप नौकरी छीनेंगे? फिर तो लोग अपको बददुआएं देंगे।”

“लोगों के पास और रहेगा भी क्या किसी को देने के लिए। वैसे भी बददुआएं मेरी ज़िन्दगी तो कम करने से रही। जीना तो मुझे 365 दिन ही है।”

“फिर तो मुझे भी आशा का दामन छोड़ देना चाहिए।”

“नहीं, नहीं आप दामन पकड़े रहिए, पकड़े रहिए। आप आशा का दामन बिल्कुल न छोड़िए। आप चाहें तो उसके साथ शादी करवा सकते हैं।”

“अरे 2017 जी, यह क्या बक रहे हैं आप? मरवाएंगे मुझे। अगर श्रीमती जी ने सुन लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा। आशा से मेरा मतलब उम्मीद से है।”

“क्या आशा उम्मीद से है? 2017 ने हैैरानी से मेरी ओर देखते हुए कहा। ज़रूर बेटा होगा, अपको अग्रिम शुभकामनाएं।”

“या तो आपको ऊंचा सुनता है या आपको नींद आने लगी है। अब आप यहां से जाने का क्या लेंगे?”

“नहीं। मैं सामान्य रूप से सुन सकता हूं। पर आपको इतना चिल्लाकर बात नहीं करनी चाहिए।”

“कमाल है, मेरे बड़बड़ाने को मेरा चिल्लाना कहते हैं। मुझे तो आप मरवा ही देते।”

“ठीक है, ठीक है। जाता हूं। पर अब नौ दिन बाद आऊंगा तो 365 दिन तक जाने का नाम नहीं लूंगा।”

“अरे तुम्हारे साथ तो एक घंटा काटना मुश्किल हो गया है। 365 दिन कैसे काटेंगे? कुछ अच्छी बातें सीखकर ज़रूर आना 2017 जी, केवल औपचारिकता पूरी करने मत आना। यह कहते हुए मैंने दरवाज़ा बन्द किया और बिस्तर पर आ गया।” 

“किसके साथ बड़बड़ा रहे थे? बीवी, जो शायद जाग गई थी, ने मुझसे पूछा।”

“2017 के साथ।”

“2017…।” श्रीमती जी ने हैरान होते हुए कहा।

“हां, इंटरव्यू देने के लिए आया था।”

“ए जी, … सुनो न। मेरी एक बात मान लो। आप किसी अच्छे से डॉक्टर से अपना इलाज करवा लो, प्लीज़।”

“यह दिन भी आना था। कम से कम आज तो यह बात न करनी थी।” कहकर मैं भी रज़ाई में मुंह ढांप कर सो गया।

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