कानून से नहीं होगा औरत का उत्थान

-शैलेन्द्र सहगल

सरकार और समाज यह कैसे जान पाएंगे कि हमारे देश की औरत को आख़िर चाहिए क्या जब स्वंय औरत ही आज तक यह जान नहीं पाई कि उसे क्या चाहिए? औरत कल कहां थी, आज कहां है और कल वो कहां पहुंच जाएगी, यह उसे खुद नहीं मालूम! वो कभी मुक्ति आंदोलन में उलझती दिखाई देती है तो कभी पुरुषों से बराबरी का अधिकार मांगती सुनाई देती है। देश की राजनीति में औरत को 33 फ़ीसदी आरक्षण दिए जाने का मामला कुछ नेताओं के हलक में फांस बना हुआ है। आख़िर औरत का उत्थान होगा कैसे? आज जागरूक और स्वतंत्र चिन्तन का ज्वलंत प्रश्न तो यही है कि आख़िर औरत का उत्थान होगा कैसे? क्या औरत के हक़ में नारे लगा कर? क्या महिला समितियों का गठन करके? क्या महिला अधिकारों के अधिनियम गठन बना कर? क्या महिलाओं को सम्पत्ति में समानाधिकार देकर? क्या दहेज़ विरोधी कानून बनाकर या नारी मुक्ति का आंदोलन चला कर? औरत को आज़ादी देकर? औरत की मुक्ति और आज़ादी की बातें तो बढ़-चढ़ कर की जाती हैं, मगर नारी  मुक्ति का आधार क्या है? नारी की स्वतंत्रता का स्वरूप क्या है? क्या पुरुष से नारी की मुक्ति संभव है? क्या शादी और परिवार के दायित्व से मुक्ति चाहती है औरत? दोराहे पर खड़ी औरत आज भी पूरी तरह से असमंजस में घिरी हुई है। औरत किचन से निकली है तो ब्यूटी पार्लर में घुस गई है। औरत पति के जाल से तो निकल सकती है मगर पुरुष के मोहपाश से कैसे निकलेगी। अपने ही देह जाल में फंसी औरत को जब तक इस जाल से मुक्ति नहीं मिलती तब तक उसका उत्थान असंभव है। समाज अगर उसको देह से आगे कुछ नहीं समझता तो औरत भी कहां स्वयं को इस दायरे से निकाल पाई है। पति की दास्ता की ज़ंजीरें काटने के लिए उसने किसी की दूसरी औरत होना भी क़बूल कर लिया है तो उसके दूसरी औरत के इस नए रूप को मुक्ति का प्रतीक मान लिया जाए? मुक्ति, स्वतंत्रता और औरत की समानता को आधुनिकता के नाम पर उस हश्र तक पहुंचाने का दायित्व किस का है? यह छूत रोग उच्च वर्ग को ही नहीं अपितु निम्न वर्ग को भी अपनी चपेट में ले चुका है। यह असामाजिक क्रान्ति निम्न वर्ग तक पहुंच चुकी है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर औरतें भी सुरक्षा के लिए पुरुष का सहारा ढूंढती हैं। निष्पक्ष और स्वतंत्र चिन्तन का निष्कर्ष तो यही है कि मर्द और औरत एक दूसरे के पूरक हैं इस लिए दोनों में बराबरी का एहसास ही दोनों के मध्य बेहतर तालमेल का आधार होना चाहिए। औरत को समानता का अहसास करवाने के लिए, सामाजिक परिवेश को बदलने के लिए कुछ धार्मिक निर्देशात्मक सिद्धान्तों में संशोधन करना होगा। धर्म संसद को शादी जैसी संस्था में से कन्यादान जैसे दास्तापूर्ण लफ़्ज़ों को सदा-सदा के लिए मिटाना होगा। शादी के दौरान भेद-भाव पूर्ण परम्पराओं को हटाए जाने का धार्मिक आदेश लागू करना होगा। भेद-भाव पूर्ण रस्मों को छोड़ कर समानता को जन्म देने वाली नई व स्वस्थ परम्पराओं को जन्म देना होगा। कन्यादान बेटी के दुर्भाग्य का आलेख बन चुका है इसलिए कन्यादान की रस्म को सर्वथा मिटा दिया जाना चाहिए। दान में पाई गई बहू को दासी नहीं तो ससुराल वाले और क्या समझेंगे?

कन्यादान के उपरान्त दहेज प्रथा को विवाह संस्कार में घोर अधर्म घोषित कर दिया जाना चाहिए। दहेज की लानत बेटी के लिए मौत का फ़रमान साबित हो सकती है। दहेज से बेटी के लिए मौत की उत्पन्न होने वाली चुनौती का सामना केवल धर्म संसद ही कर सकती है। कानून का सदैव अवमान करने वाले दुस्साहसी लोग भी धर्म के मामले में भीरु होते हैं। इसलिए औरत उत्थान के मार्ग की सामाजिक बाधाओं को केवल धर्म संसद ही दूर कर सकती है। शादी जैसी व्यवस्था वर-वधू को समानाधिकार दिलाने वाली होनी चाहिए। दहेज जैसी हत्यारी कुप्रथा का उन्मूलन करने में औरत स्वयं भी एक भूमिका निभा सकती है। दहेज की लालसा रखने वाले दूल्हे से विवाह करने से इन्कार करके औरत जब अपने पांव पर स्वयं कुल्हाड़ी मारना छोड़ देगी तब उसके दोनों हाथ अपनी सुरक्षा और समानता के लिए सक्रिय रहने योग्य हो जाएंगे। आन्दोलन नारी का कोई उत्थान नहीं कर सकते। उत्थान की मनोकामना रखने वाली औरत को स्वयं उत्थान का प्रण लेना होगा। इस प्रकार जो बेटी बहू बनकर ससुराल का स्वर्ग बसाने जाएगी वो न तो स्वयं नरक भोगेगी और न ही दहेज की आग में जलकर स्वर्गीय होगी। जब मां-बाप बेटी को बेटे से अधिक लाड़-प्यार देंगे और बेटे को वरीयता का पाठ नहीं पढ़ाएंगे और भाई, बहन के संग एक समान वातावरण में पलेगा तो उसकी मानसिकता में वरीयता घर नहीं कर पाएगी। जब बेटी को मां से, बहू को सास से, पत्नी को पति से और आगे चल कर मां को बेटों से प्यार और सत्कार मिलेगा तभी औरत को उसका अभीष्ट स्थान मिल सकेगा। कोई भी अच्छी शुरुआत जब हम अपने घर से करेंगे तो औरत को अधिकारों के लिए आन्दोलन चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। औरत आत्म उत्थान से ही समाज में समानता के अधिकार का गौरव हासिल कर सकती है। औरत का आत्म-संशोधन ही मर्द को आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित कर सकता है। अगर हम आत्म-संशोधन नहीं कर सकते तो समाज सुधार की बातें डींगे मारने तुल्य ही होंगी।

महिला और कानून

नारी अस्मिता की व स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्रयाप्त कानून हैं। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354 नारीत्व की शालीनता का उल्लंघन करने वाले दोषियों को नामज़द करने में सक्षम है। दण्ड संहिता की धारा 509 नारीत्व के अपमान कर्ताओं को दण्डित करने के लिए बनाई गई है। धारा 498-ए सन् 1983 में अस्तित्व में आई थी।

विवाह के बाद स्त्री पर अत्याचार करने वालों को शिकंजा इसी धारा के माध्यम से कसा जाता है। औरत को दहेज हत्या की लानत से निजात दिलाने के लिए दहेज हत्यारों को धारा 304 बी से ही जेल की सलाखों के पीछे धकेला जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की परिभाषा के अनुसार यौन उत्पीड़न का मामला तय करते समय चार वर्गों को ध्यान में रखा जाता है। शारीरिक सम्पर्क या संकेतों द्वारा यौन कार्य की मांग या अनुरोध करना, यौन सूचक टिप्पणियां करना अथवा अश्ललील साहित्य दिखलाने जैसी गतिविधियां यौन उत्पीड़न को तय करवाने में सक्षम होती हैं। भारतीय दंड संहिता की यह तमाम सक्षम धाराएं उस समय निस्तेज हो जाती हैं जब संदेह का लाभ लेकर अपराधी साफ़ बच निकलते हैं। बलात्कार व यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बने कानून इसीलिए अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे धकेलने में नाकाम रह जाते हैं। समस्त सक्षम कानूनों के होते हुए भी औरत की अस्मिता आज दांव पर लगी है तो भला इसका उत्थान कैसे होगा? कानून से औरत का उत्थान कभी नहीं हो सकता क्योंकि आपराधिक वृत्ति वाले लोगों के लिए कानून की कोई अहमियत ही नहीं है। अव्वल तो औरत बलात्कारी की हवस का शिकार होने के बाद मार डाली जाती है मगर बच जाने पर जब वो अदालत का द्वार इन्साफ़ की उम्मीद से खटखटाती है तो संदेह का लाभ लेकर बलात्कारियों के बरी हो जाने पर उसके दिल पर क्या गुज़रती होगी? महल कलां ज़िला संगरूर की एक छात्रा का दिन-दिहाड़े अपहरण हुआ। उसके साथ पाश्विकतापूूूूर्ण ढंग से बलात्कार करके बलात्कारियों ने उसकी नग्न लाश को अपने ही खेतों में गाढ़ दिया। जयपुर की एक छात्रा को भी कई-कई दरिन्दों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। उस युवती को बचाने की जगह कुछ युवक शर्मनाक ढंग से बलात्कारियों को उन्मादी बनाने के लिए अश्लील गाने गाते रहे। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 बलात्कारी को दण्डित करने के लिए बनाई गई है। अगर पीड़ित महिला 16 वर्ष से कम आयु की हो तो उसकी सहमति और असहमति का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। औरत की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाए रखने के लिए देश में प्रयाप्त कानून हैं मगर इन्साफ़ कानून की बारीकियों में गुम हो कर रह जाता है। जब कानून संदेह का लाभ बलात्कारी को दे डाले तो निश्चय ही अभागी पीड़ित महिला अदालत का द्वार खटखटाने के अपने साहस को पानी पी-पी कर कोसती होगी।

महाराष्ट्र के एक थाने के पिछवाड़े पुलिस कर्मियों ने 16 वर्षीय नाबालिगा की इज़्ज़त से खिलवाड़ किया। सेशन जज ने यह कह कर बलात्कारियों को छोड़ दिया कि जो कुछ हुआ युवती की सहमति से हुआ। हाई कोर्ट ने सेशन जज के निर्णय के उलट बलात्कारियों को 5-5 साल का कठोर कारावास का दण्ड दिया जब कि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निर्णय को उलटा कर सेशन के निर्णय को बहाल करके दोषियों को फिर से बरी कर दिया। अब इस मामले में किसको सज़ा मिली और किस को इन्साफ़ यह बात तो संबंधित पक्ष ही जानते होंगे। एक महिला सरपंच से मिली हार का बदला पराजित विरोधियों ने उसकी इज़्ज़त को लूट कर लिया। हरियाणा के शहर बहादुर गढ़ का बेबी किल्लर किसी फ़िल्म का खलनायक नहीं अपितु समाज में दनदनाता वो दरिन्दा था जो अनेक बालिकाओं को अपहरण करके उनसे अपनी हवस मिटाने का पाप करता रहा। मासूम पिंकी, कमसिन सलमा, कोमल करुणा और लाडली पूजा की चिताएं ठण्डी होने से पहले मंजु को भी बेबी किल्लर ने अपनी हवस का निशाना बना लिया था। इन कोमल कलियों को सोते में चारपाइयों से उठवा लिया गया था। हवस का शिकार बनाकर उनका गला भी दबा डाला गया। सिरसा ज़िले की दो बहनें वीना व शालू अचानक लापता हो गईं। फिर खून से लथपथ उनकी लाशें भी मिल गईं। पुलिस ने अभिभावकों से उनकी शिनाख़्त भी करवा ली मगर दोनों जब बाद में सकुशल घर वापिस लौट आईं तो पुलिस की हालत पतली हो गई। पुलिस की अपराध रोकने की ऐसी कार्य-शैली भी तो अपराधियों को प्रोत्साहित करती है। बलात्कार के जितने मामले पुलिस के रिकॉर्ड में आते हैं वही सरकारी आंकड़ों का रूप ले पाते हैं। ऐसे अनगिनत मामले तो प्रकाश में आने से पहले ही प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा दबा दिए जाते हैं।

बलात्कार के पुलिस रिकॉर्ड में पतियों द्वारा अपनी पत्नियों से किए गए अनगिनत बलात्कार के मामले तो दर्ज़ ही नहीं हो पाते हैं। उनका रिकॉर्ड दुनिया की किसी भी किताब में दर्ज़ नहीं हो पाता। महिलाओं पर अत्याचार बरपाने में दिल्ली सारे देश में आगे रहा है। दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश का नम्बर आता है जहां बलात्कारों, अपहरणों और हत्याओं द्वारा महिला जगत को आतंकित करके रखा जाता है। अत्याचारी पुरुष समाज अपने अनाचार की अनदेखी करके चरित्रहीनता का लांछन पीड़ित और शोषित महिला पर ही लगाने की धृष्टता भी करता है। चोरी और सीनाज़ोरी की इससे बड़ी उदाहरण और कहां मिलेगी?

जहां महिलाएं अत्याचार, अनाचार, छेड़छाड़, अपहरण, बलात्कार व सामूहिक बलात्कारों जैसे जघन्य अपराधों का शिकार होती हैं वहीं महिलाओं की अपनी भी अपराधों में संलिप्तता बढ़ती जा रही है। किशोरियों और युवतियों द्वारा अपराध की दुनिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाने लगी है। नन्हीं और अबोध बालिकाओं को अगवा करके कोठों पर बेच दिया जाता है। समाज के कई सफ़ेदपोश भद्रपुरुष देह व्यापार से रातों-रात अमीर बनने में लगे हुए हैं। कई ज़रूरतमंद महिलाओं को नौकरियों का झांसा देकर फुसला लिया जाता है। उनके अश्लील चित्र खींच कर उन्हें देह व्यापार व अपराध की दुनिया में धकेल दिया जाता है। देह व्यापारियों का जाल पूरे विश्व में फैल चुका है यही नहीं यौनाचार को यौन उद्योग का दर्जा देने की मुहिम भी बाक़ायदा चलाई जा रही है। उपभोक्ता संस्कृति की छत्र छाया में एय्याशी खूब फल-फूल रही है। इसका कारण इनको मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण है।

दिल्ली जैसे शहर में कुछ सैंकड़े रुपए मात्र में एक बाल वेश्या सुलभ है। यौन उद्योग का नियंत्रण जहां क्रूर व पेशेवर अपराधियों के हाथ में है वहां इस धन्धे के धुरन्धरों और पुलिस के कारोबारी संबंध काफ़ी गहरे होते हैं जिन्हें ऊपर से राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त होता है। यही कारण है कि यह अवैध धन्धा फलते-फूलते तनिक देर नहीं लगती। महिला होने की यह घोर त्रासदी है कि एक बार ऐसे जाल में फंसने के बाद जीते जी उसमें से निकलना उसके लिए संभव ही नहीं है। भारत तो भारत, बाहर विदेशों में हालत और भी बदतर हैं। भारत, ताईवान, श्रीलंका जैसे देशों के वेश्यालयों में सक्रिय यौन कर्मियों की संख्या लाखों में होने का अनुमान है। औरत पर अत्याचार का घिनौना सिलसिला बदस्तूर जारी है। शासन, प्रशासन, राज और समाज की हर व्यवस्था विफल होकर रह गई है। देश की राजधानी में तो फोन पर बुकिंग करके लड़कियां सप्लाई करने वाले कुछ दलाल पुलिस की पकड़ में आए थे। कामपिपासुओं के लिए मोबाइल और पेजर वरदान साबित हुए हैं। अण्डरवर्ल्ड में आजकल औरतों का ख़ासा दबदबा है। अण्डरवर्ल्ड की राजकुमारी महक को अपने दिल की रानी बनाते-बनाते अनेक करोड़पति कंगाल हो गए। लूटने की ओट में लुटने की कला में पारंगत मनीषा ने अपने अपराधियों की सहायता से करोड़ों रुपया फिरौति उद्योग में से कमाया है। गोरी चिट्टी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाली आधुनिक तितली करोड़पति भंवरों को चूस कर कंगाल कर देती थी। फूलन देवी दस्यु क्यों बनी थी आज सारी दुनिया जानती है। कुसुमा नाइन, मीरा ठाकुर व हसीना जैसी सुन्दरियों को गृहस्थी बसाने का इरादा छोड़ कर चम्बल के बीहड़ों में क्यों शरण लेनी पड़ी – सारी व्यथा कथा रिकॉर्ड में दर्ज है। जिस मानव बम ने राजीव गान्धी के शरीर के चीथड़े उड़ा दिए वो मानव बम महिला ही थी। किस मजबूरी ने महिला को मानव बम बनने के लिए विवश किया? पुरुष की कामान्धता ही मुख्यत: महिलाओं को अपराध के मार्ग पर उतारने का कारण रही है। आज अवैध शराब, मादक पदार्थों के धन्धे में महिला अपराधियों का कोई सानी नहीं।

मानसिक रूप से पीड़ित और दैहिक शोषण से उत्पीड़ित महिलाएं जो आत्माहत्या नहीं करती वे अपराध की ओर मुड़ जाती हैं। महिलाओं का मान-सम्मान और स्वाभिमान का मर्दन ही उन्हें अपराध में झोंकता है अगर क़ानून महिला की अस्मिता की रक्षा करते हुए उसे स्वाभिमान से एक सहज जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान कर दे तो जहां औरत में मर्द के समान होने का अहसास जगेगा वहीं औरत अपराध को लगाम लगाने में भी सहायक साबित हो सकेगी।


 

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