साहित्य सागर

बाकी सवाल

रात के इस पहर के बाद, रात और कितनी बाकी है। वक़्त के इस पड़ाव के बाद, ज़िदगी और कितनी बाकी है।

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वफ़ादार

“नहीं, नहीं सीमा नहीं, तुम्हें मैं कहीं भी लेकर नहीं जा रहा हूूं, तुम तो धोखेबाज़ हो, आज मैंनें तुम्हें अच्छी तरह से परख लिया है।” “क्या कहा, धोखेबाज़। और वो भी मैं?

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पुनर्स्थापना

खुजराहो के किसी मंदिर की भित्ति से चुरा कर एक ऋषि ने मंत्र-सिद्ध कर तुम्हें साकार कर दिया मेरे लिए

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औरत

बिख़र गई हूं पंक्ति बन कर मैं। अपने-अपने दृष्टिकोण पर, सबने परखा मुझको। मनचाहा अर्थ लगाया मेरा। कौन समझा सही अर्थ को ?

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नये अशआर

लांघ कर जिस दम रिवायत की हदों को आएगी देख लेना फिर वो बस्ती भर में पत्थर खाएगी चांद तारे मुंह छिपा लेंगे घटा की ओट में कोई गोरी अपनी छत पर ज़ुल्फ़ जब लहराएगी

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कौमी एकता

वो तवायफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसलिये दुनिया को ज़्यादा जानती है उसके कमरे में हर मज़हब के भगवान् की एक-एक तस्वीर लटकी है

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जोंक

सता की कुर्सी के पैरों में जनता का लहू बहता है उस पर सवार नेता उसे जोंक की तरह चूसता रहता है छुटभैये भी मच्छर की तरह भिनभिनाते रहते हैं मौक़ा लगते ही चूस कर उड़ जाते हैं

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