कहानियां

वफ़ादार

“नहीं, नहीं सीमा नहीं, तुम्हें मैं कहीं भी लेकर नहीं जा रहा हूूं, तुम तो धोखेबाज़ हो, आज मैंनें तुम्हें अच्छी तरह से परख लिया है।” “क्या कहा, धोखेबाज़। और वो भी मैं?

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यंत्र पुरुष

'क्योंकि वह शख़्स आपकी बिरादरी से है आप मेरे साथ चलकर देख लें एक बार’ तभी उसके पीछे एक साथ जनाना लिबास पहने हुए कई हिजड़े चलने लगे थे।

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बिखरी ज़िंदगी

सुलेख सोचता जा रहा था कि क्या शौक़ की भी कोई क़ीमत होती है? अब वो है नौकरी। सिर्फ़ 2000 रुपए हर महीने मिलेंगे। इसके लिए उसे अपना शौक़ बेचना पड़ेगा।

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सोचा न था

यह सुनते ही भड़क गई थी महक और तुम्हारे कमरे से जाते ही सोमेश पर बरस पड़ी “इतनी ही सुन्दर है वह तो उसी से कर देती न मां आपकी शादी, मुझसे क्यों की।”

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    वह एक दिन

‘ये कैसे हो सकता है?’ मनु ग़ुस्से से अपनी सफ़ाई पेश करता हुआ बोला  ‘मैंने अपने जिस्म का खून देकर ये नोट हासिल किये थे....मुझको खाना चाहिये मेरे बच्चे भूखे हैं।

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समर्पिता

लगा जैसे धरती हिली हो, कोई भूचाल आया हो। घिग्घी-सी बँध गई दोनों की क्योंकि दोनों ही बातों में से कुछ भी कर पाना, असंभव ही तो था।

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गृहस्थी

मैं चिन्ता में गहरे समा रहा था कि पत्नी बोल पड़ी, “सोच क्या रहे हो? उसे कोई पूछता भी था? कितनों को तो तुम दिखा चुके थे। कोई उसे छापने को तैयार था?”

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करवा चौथ

आंसुओं की अविरल धारा बह-बह कर अख़बार में छपी उसकी तस्वीर को भिगो रही है और वह दूर कहीं दूर अतीत की यादों में खो गई

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मातृत्व

यह बात सुनकर किरण भी ग़ुस्सा होते हुए बोली, 'आप यह क्यों नहीं कहते कि आप मुझे यहां पत्नी बनाकर नहीं नौकरानी बनाकर लाए हैं?'

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विश्वास का खून

‘राहुल...’, शब्द ही निकला था और मुन्नी की रूलाई फूट पड़ी थी। रुकी तो वह भरे स्वर में बोली थी- ‘कहां थे तुम? जानते नहीं तुम्हारी आवाज़ सुनने के लिए हम पल-पल तड़प रहे हैं।

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