धर्म एवं संस्कृति

ज़िन्दगी क्या है?

इस ब्राह्मांड में तीन लोक हैं, पृथ्वी लोक, जिस पर हम रह रहे हैं। स्वर्ग लोक, देव लोक, पाताल लोक। इन के परमात्मा ने अलग-अलग स्वामी नियत किये हैं।

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मज़ेे लूटो बरसात के

इन राड़ों को चित्रते हुए लड़कियां गीत भी गाती हैं- उड़ मर, कूंजड़ीए अड़ीए नी सौण आया। उत्तर में भी अपने आप ही गाती हैं - किवें उड़ां नी मड़ीए देस पराया।

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होली

श्री कृष्ण राधा जी से हार मान लेते हैं, इसके बाद उनका मधुर मिलन होता है। इसी आख्यान की कड़ी है लट्ठमार होली!

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मत हो ए दिल उदास

ग़ुुस्से में उठाया गया हर क़दम अधिकतर ग़लत ही साबित होता है। वो कहते है न ‘एक ग़लत क़दम उठा था राहे शौक़ में, मंज़िल तमाम उम्र हमें ढूंढती रही।’

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रावण खुश हुआ मित्र

‘बस एक ही! देश की तरह रावण बनाने वाले भी जल्दी में थे क्या? आग लगे ऐसी जल्दी को जो, नाश का सत्यानाश करके रख दें।’ ‘महाशय आप तो दशानन थे न? फिर अब के.....’

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धर्म और राजनीति

धर्म को अगर राजनीति से जोड़ कर देखा जाए तो चहूं ओर राजनीति का बोलबाला ही नज़र आता है और आज की राजनीति का कोई धर्म नज़र नहीं आता।

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श्ब्द की शक्ति

शब्दों के बग़ैर मनुष्य की ज़िंदगी गूंगे की ज़ुबान की तरह है। आध्यात्मिक लोग शब्दों की शक्ति समझने में समर्थ होते हैं। शब्द कभी मरते नहीं। इन के अर्थों का संदेश दिमाग़ में कीटाणुओं की तरह प्रवेश करके असर करता है।

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खुले मन से मनाएं दीपावली!

संसार के विशाल इतिहास में भारतवर्ष के समान विपुल जनसंख्या वाला कोई भी बड़ा देश अल्पसंख्यक आक्रमणकारियों से पराजित होकर इतने ज़्यादा समय तक ग़ुलाम नहीं रहा। दीपावली के इस अवसर पर ज्ञान के असंख्य दीपक भी हमें जलाने चाहिए और निर्भीक होकर यह अनुसंधान करना चाहिए

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